Author: Kishore Kumar

Spiritual journalist & Founding Editor of Ushakaal.com

आज पूरी दुनिया तनाव, मानसिक अशांति और दिशाहीनता की चुनौतियों से जूझ रही है। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, निरंतर आने वाली सूचनाओं की बाढ़ और गलाकाट प्रतिस्पर्धा के कारण मनुष्य का मन हर क्षण विचलित रहता है। इसी मानसिक चंचलता और भटकाव के कारण किसी एक विषय पर कुछ पलों से अधिक ध्यान केंद्रित रख पाना अत्यंत दुष्कर हो गया है। ऐसे अशांत समय में त्राटक जैसी प्राचीन यौगिक विधि केवल आध्यात्मिक साधकों के लिए ही नहीं, बल्कि सामान्य जनमानस के लिए भी एक संजीवनी की तरह उपयोगी है। योगियों का शाश्वत अनुभव है कि मन को जीतने का मार्ग…

Read More

कुरुक्षेत्र के मैदान में किसी बाह्य कारण से अर्जुन के हाथ से गांडीव नहीं फिसला था, बल्कि कारण मन में उपजा विषाद था। मौजूदा समय में छात्र-युवाओं की स्थिति भी कुछ वैसी ही है। प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव, भविष्य की अनिश्चितता, प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाओं के कारण ऐसे हालात बने हैं। ऐसे में, मानसिक यंत्रणा और टूटते मन को सहारा देने के लिए किसी बाहरी दिलासे की नहीं, बल्कि एक ऐसे आंतरिक मार्गदर्शक की आवश्यकता है, जो हमारी मानसिक अवस्था को बदल दे।वैदिक शास्त्र की घोषणा है कि मनुष्य केवल हाड़-मांस का शरीर या भावनाओं का पुंज नहीं है। उसके…

Read More

भागीरथी तपस्या और शिव की जटाओं से नियंत्रित होकर धरती पर उतरी गंगा महज एक नदी नहीं, बल्कि सनातन चेतना के अंतस में बहती जीवनदायिनी धारा है। यह भारतीय आध्यात्मिक यात्रा का दिव्य और जीवंत आख्यान है। जब महर्षि विश्वामित्र के साथ यज्ञ रक्षा के लिए वनगमन करते समय श्रीराम ने गंगा के दैवीय सौंदर्य को निहारा, तो उनके मन में कौतूहल और जिज्ञासाएं जाग्रत हुईं। उन जिज्ञासाओं के समाधान में महर्षि ने गंगा अवतरण का जो प्रसंग सुनाया, वह केवल एक ऐतिहासिक घटना का वृतांत भर नहीं था, बल्कि श्रीराम के भावी जीवन का एक आध्यात्मिक खाका भी था।…

Read More

संतों की जयंती मनाना केवल अतीत को याद करने जैसा नहीं, बल्कि वर्तमान को दिशा देना होता है। इसलिए, जब संतों के जीवन और उनके विचारों पर दृष्टि डालते हैं, तो स्पष्ट होता है कि उनकी शिक्षाएँ समय की सीमाओं से परे हैं। विज्ञान, तकनीक और सामाजिक संरचनाओं के क्षेत्र में हमने भले उल्लेखनीय प्रगति कर ली है। पर, खुद का रुपांतरण होना बाकी है। काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसे आंतरिक शत्रु आज भी प्रबल हैं। ऐसे में संत मलूकदास की 452वीं जयंती पर जब देश-विदेश में उन्हें विविध रूपों में स्मरण किया गया, और उनकी शिक्षाएं नईपीढ़ी के…

Read More

वैदिक परंपरा में गुरु और शिष्य का संबंध बीज और वृक्ष की तरह होता है, जहाँ बीज अपनी पूरी सामर्थ्य वृक्ष में समाहित कर देता है। श्रीश्री रविशंकर का जीवन और उनकी आध्यात्मिक उपलब्धियों पर गौर करें तो कहना होगा कि महर्षि महेश योगी की चेतना की छाया श्रीश्री के व्यक्तित्व और उनके वैश्विक मिशन में एक आधारशिला की तरह विद्यमान है।महर्षि महेश योगी की सबसे बड़ी खूबी ‘निंदा का पूर्ण अभाव’ थी। वे साधारण व्यक्ति को भी ‘गवर्नर’ या ‘राजा’ कहकर उसकी गरिमा को जगाते थे। श्रीश्री के व्यवहार में यही छाया ‘अपनत्व’ और ‘मुस्कुराहट’ के रूप में दिखती…

Read More

भारत का उत्थान केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उत्थान के लिए भी है। इस देश का राष्ट्रीय जीवन उसकी आध्यात्मिक चेतना से अलग नहीं किया जा सकता। इसी कारण जब सोमनाथ पुनर्निर्माण हुआ, तो इसे भारतीय आत्मा की वापसी के रूप में देखा। सोमनाथ का पुनर्निर्माण भारतीयो लिए केवल स्थापत्य पुनर्निर्माण नहीं था, बल्कि वह पराजय की मानसिकता से मुक्ति का प्रतीक था। जहां तक ज्योर्तिलिंग का सवाल है तो योगदर्शन के मुताबिक, शिव दैवीव चेतना, मौन, तप और रूपांतरण की दिव्य शक्ति के प्रतीक हैं। इस लिहाज से सोमनाथ का बार-बार विध्वंस और पुनर्जीवन से संदेश…

Read More

जय और पराजय जीवन की स्थायी अवस्थाएँ नहीं, बल्कि मन की क्षणिक तरंगें हैं। कोई भी हार अंतिम नहीं होती और कोई भी जीत शाश्वत नहीं होती। इसलिए हमारी वास्तविक सफलता इस बात में निहित नहीं कि हम कितनी बार जीते, बल्कि इस बात में है कि हार के क्षणों में स्वयं को किस तरह और कितना संभाला। जब ऐसी समझ विकसित होती है, तब जीवन केवल प्रतियोगिता नहीं रह जाता, बल्कि वह आत्मविकास की यात्रा बन जाता है।इस बात को सदैव याद रखा जाना चाहिए कि जय और पराजय का पहला आधार वह नहीं होता, जो मौजूद होता है…

Read More

बिहार में उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर बसे मुंगेर की पावन धरती ने कभी दानवीर कर्ण की अद्वितीय उदारता देखी थी। लेकिन नियति ने इस भूमि की कोख में चेतना के जागरण का एक और महायज्ञ सुरक्षित रखा था। बीसवीं सदी में इस महायज्ञ के सूत्रधार बने महायोगी परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती। उनके तप और सद्प्रयासों के कारण यह ऐतिहासिक शहर वैश्विक आध्यात्मिक घटनाओं का केंद्र बन गया। उनकी महासमाधि के कोई सत्रह साल बीत जाने के बाद अब उनकी सूक्ष्म ऊर्जा का प्रभाव पद्म समारोह के दौरान दिखेगा, जो भक्ति और योग का अद्भुत संगम होगा।स्वामी सत्यानंद सरस्वती जब…

Read More

“ये बाबा बहुत दिनों से नहीं आए। बाबा की बहुत याद आ रही है… भवन, इसका पेट भी फूला हुआ है, मुझे बड़ी चिंता हो रही है… ऐसी भी क्या नाराजगी थी महाराज? आपने दर्शन नहीं दिए…” भक्तों की यह आर्त पुकार अनसुनी नहीं रह पाती और तभी ममत्व से सराबोर एक वाणी गूंजती है, “ये देख मैं आ गया हूं तेरे लिए। इसी दिन का इंतजार था ना तुझे?” यह किसी साठ-सत्तर के दशक की चमत्कारिक घटना का वर्णन नहीं, बल्कि नीम करोली बाबा पर बनी फिल्म “श्री बाबा नीब करोली महाराज” के टीजर का एक अंश है। मराठी…

Read More

पृथ्वी की गोद में जीवन का स्पंदन अनादि काल से है। तभी जिस पारिस्थितिक संतुलन की बात दुनिया भर में की जा रही है, उसकी आधारशिला भारत के ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व वैदिक सूक्तों के रुप में रख दी थी। वैदिक काल में प्रकृति केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि वह हमारे लिए वंदनीय थी। अथर्ववेद के ‘पृथ्वी सूक्त’ में कहा गया हैं कि ‘माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः’ अर्थात् यह भूमि मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूँ। इस तरह, जब हम पृथ्वी को माता मानते हैं, तो उसका दोहन करना अकल्पनीय हो जाता है। यही वजह…

Read More