Author: Kishore Kumar

Spiritual journalist & Founding Editor of Ushakaal.com

नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की… गोकुल के भगवान की, जय कन्हैया लाल की… जन्माष्टमी के मौके पर ब्रज में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में और सरहद पार भी ये शब्द गुंजायमान हैं। पर उत्सव, उल्लास और उमंग के परे राधा, गोपियां, रासलीला और श्रीकृष्ण की बांसुरी की सुमधुर धुन… आदि के आध्यात्मिक संदेश भी कुछ कम नहीं।कृष्ण भक्ति आंदोलन के तमाम संत कहते रहे हैं कि श्रीकृष्ण को मायावादी दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। उनके नाम, उनके रूप, उनके गुणों और उनकी लीलाओं में अंतर नहीं है। वह परब्रह्म हैं। पर हम सब श्रीकृष्ण की…

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रासलीला, श्रीकृष्ण की बांसुरी, उसकी सुमधुर धुन और गोपियां…. इस प्रसंग में बीती शताब्दी के महानतम संत परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती की व्याख्या एक नई दृष्टि प्रदान करती है। यह शास्त्रसम्मत है, विज्ञानसम्मत भी है। जन्माष्टमी के मौके पर विशेष तौर से ज्ञान मार्ग के लोगों के लिए एक प्रेरक कथा। परमगुरू और कोई सौ से ज्यादा देशों में विशाल वृक्ष का रूप धारण कर चुकी बिहार योग पद्धति के जन्मदाता परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के श्रीमुख से सत्संग के दौरान अनेक भक्तों ने यह कथा सुनी होगी। फिर भी यह सर्वकालिक है। प्रासंगिक है।  श्रीकृष्ण को अपनी बांसुरी से…

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प्राण शक्ति और चित्त शक्ति, इन्हीं दो मूल सिद्धांतों पर ब्रह्मांड की रचना टिकी है। ये दोनों अलग-अलग भले दिखते हैं, परंतु वास्तव में ये एक ही सत्ता के दो विपरीत ध्रुव हैं। इसी कारण प्राण के स्तर को बदलकर चेतना की अवस्था बदली जा सकती है, और चेतना के परिवर्तन से प्राण में भी परिवर्तन संभव है।तंत्र विज्ञान में स्पष्ट कहा गया है कि चेतना का विस्तार तभी होता है, जब ऊर्जा मुक्त होती है। चाहे हज़ार वर्षों तक ध्यान किया जाए, यदि प्राण ऊर्जा जाग्रत न हो तो चेतना का विकास असंभव है। आधुनिक मनोविज्ञान इस रहस्य से…

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वैसे तो सावन का पूरा महीना ही भगवान शिव को समर्पित होता है। लोकमान्यता है कि इस महीने में भगवान शिव माता पार्वती के साथ धरती पर भ्रमण करने आते हैं और अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाते हैं। भक्तगण भोलेनाथ को प्रसन्न करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। माह की अंतिम सोमवारी के साथ ही धार्मिक कर्मकांडों का एक चक्र पूरा हो जाता है। पर, आध्यात्मिक दृष्टिकोण से सावन का अंतिम सोमवार विशिष्ट दिवस है। यह आंतरिक रूपांतरण के लिए संकल्प लेने का दिवस है। हम जलाभिषेक करके भोले बाबा को शीतलता प्रदान करते रहे। पर, अब वैसी ही…

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बीसवीं सदी के महान संत परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने कोई पांच दशक पहले कहा था कि 21वीं शताब्दी भक्ति की शताब्दी होगी। यह अवश्य घटित होगा, एक मान्यता के रूप में नहीं, बल्कि विज्ञान के रूप में। बच्चे माता-पिता से सवाल करेंगे कि मीराबाई जहर पी कर भी जीवित कैसे रह गई थीं? यानी, यह चेतना के विकास से जुड़ा मामला है। वे अक्सर कहते थे कि आध्यात्मिक चेतना का विकास ही मनुष्य की नियति है। निम्न वासनाओं और कामनाओं के दायरे में सीमित रहना मनुष्य की नियति नहीं है। महर्षि अरविंद का भी इस विषय पर सुंदर और…

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अद्भुत! जीव-जंतुओं में भी ईश्वर का प्रतिरूप और उसकी पूजा! इसका मर्म वे क्या जानेंगे, जो जड़ों से कट गए और भारत को सपेरों का देश मानने लगे थे। पर, भारत जैसा आध्यात्मिक देश तो अपनी जड़ों से मजबूती से जुड़ा हुआ है। वह जिस तरह राम और रावण में फर्क जानता है, उसी तरह नाग के गुण-दोष को भी समझता है। उसे मालूम है कि वासुकि नाग में विष भरा है तो अमृत निकालने के काम भी वही आता है। हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। त्रिगुणायत मानवों को ही देख लीजिए। उसमें एक तरफ शील है, मर्यादा…

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स्वाधीनता दिवस की शुभकामनाएं।

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स्वाधीनता दिवस तीन अनूठे योग लेकर आया है। संसद के दोनों सदनों ने राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम 1971 में संशोधन कर ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज के समकक्ष विधिक दर्जा दे दिया है। इसी अवधि में इस कालजयी रचना की 150वीं वर्षगाँठ का स्मृति-वर्ष चल रहा है, जो पिछले नवंबर आरंभ हुआ। इसके साथ ही 15 अगस्त को श्रीअरविंद का जन्मदिवस भी है, जिन्होंने ‘वंदे मातरम्’ की महत्ता को एक बड़े कैनवास पर समझा और उसके महात्म्य को पूरी प्रखरता के साथ प्रकट किया। इन तीन घटनाओं का संगम एक पुराने प्रश्न को फिर जीवंत बना दिया है कि “वंदे मातरम्” को…

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देश भर में फैले नीलकंठ महादेव मंदिरों में वैसे तो सालो भर भीड़ होती है। पर सावन महीने की बात ही अलग है। भक्तगण कई-कई घंटे मशक्कत करके नीलकंठ महादेव का जलाभिषेक करते हैं। लेकिन जिस घटना की स्मृति में ये मंदिर बने हैं, उसके सबसे बड़े संदेशवाहक वे लोग होते हैं, जो कठिन समय में विष वमण नहीं, बल्कि उसे धारण करके भी धर्मानुकूल कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं।इस विचार को पौराणिक कथा के संदेशों के जरिए समझिए। समुद्र-मंथन के समय सबसे पहले हालाहल विष निकला। उस विष की ज्वाला से तीनों लोक संकट में पड़ गए। न देव…

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महर्षि वेदव्यास ने वेदों का वर्गीकरण करके उसे लिपिबद्ध करा दिया था, अठारह पुराणों की रचना पूरी की जा चुकी थी। स्वीकृति और यश की कोई कमी न थी। फिर भी सरस्वती नदी के पावन तट पर बैठे व्यास के मन में एक अजीब बेचैनी थी। तभी वहां देवर्षि नारद का पदार्पण होता है। वे उन्हें उस कमी का अहसास कराते हैं, जो उनकी निराशा का कारण बनी थी। वे संकेत करते हैं कि रचनाओं में भगवत्-तत्त्व और भगवान के निर्मल यश का वैसा गान नहीं हुआ, जैसा होना चाहिए था और जो दर्शन हृदय को तृप्त न करे, वह…

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