Author: Kishore Kumar

Spiritual journalist & Founding Editor of Ushakaal.com

एक रोगी ऑपरेशन थिएटर में जाने से पहले आंखें बंद करता है। कुछ क्षण शांत बैठता है, धीमी श्वास लेता है और फिर गहरे, सहज स्वर में ‘ॐ’ का उच्चारण करता है। स्पेन के बार्सिलोना स्थित मुख्य अस्पताल का ऐसा दृश्य अब किसी को चौंकाता नहीं। रोमन कैथोलिक बहुल देश में शल्य-चिकित्सा से पहले श्वास-प्रश्वास के साथ मंत्रोच्चार की बात असामान्य लग सकती है। लेकिन उस अस्पताल को मरीजों का तनाव कम करने का मानो अचूक नुस्खा मिल चुका है। श्वास-प्रश्वास के साथ मंत्र साधना तन-मन को किस तरह प्रभावित करते हैं, इसके बारे में भारत के योगी सदियों से…

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शांत मन से देखा गया सपना भविष्य का रोडमैप बन जाता है, और आत्मविश्वास उस दिशा में उठाया गया पहला कदम। श्रीमद्भगवद्गीता में इसी ओर संकेत किया गया है। जब ध्येय स्पष्ट हो, बुद्धि स्थिर हो और कर्म के प्रति निष्ठा हो, तब भविष्य की चिंता नहीं, वर्तमान का कर्म ही केंद्र में आ जाता है। ऐसे में “योगः कर्मसु कौशलम्” का अर्थ केवल ध्यान या आसन नहीं रह जाता। वह कर्म को विवेक, संतुलन और कुशलता के साथ करने की सीख बन जाता है।पर, श्रीमद्भगवद्गीता की कुशलता का मर्म फल की दौड़ में नहीं, फल के प्रति समता में…

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कोई नया काम शुरू करना हो या यात्रा पर निकलना हो, मुख से अनायास निकल पड़ता है -“श्री गणेशाय नमः।” क्या यह केवल धार्मिक परंपरा है, या इसके पीछे जीवन और चेतना का कोई गहरा रहस्य भी छिपा है? गणेश चतुर्थी इसी गूढ़ार्थ को समझने का अवसर है।यह मंत्र ऐसा है, जिसे हम सोचकर नहीं, सहज भाव से बोलते हैं। कोई नया काम शुरू करना हो, किसी यात्रा पर निकलना हो, विवाह का शुभ मुहूर्त हो या साधना आरंभ करनी हो, मुख से अनायास निकल पड़ता है, “श्री गणेशाय नमः।” शास्त्रों के मुताबिक, गणेश प्रथम पूज्य हैं, इसलिए हर शुभ…

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ऋषि-परंपरा भारत के अतीत की कोई जड़ स्मृति नहीं, बल्कि ज्ञान, सत्य, आत्मानुशासन और लोकमंगल की एक निरंतर प्रवाहित होती जीवन-दृष्टि है। यह परंपरा कभी मंत्र और दर्शन के माध्यम से, कभी कृषि और चिकित्सा जैसे व्यावहारिक विज्ञानों के अनुसंधान के माध्यम से, तो कभी गुरु-शिष्य, गोत्र, संन्यास और मठ-परंपराओं के रूप में जीवंत रही है। ऋषि पंचमी इसी महान ऋषि परंपरा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर है।भारतीय परंपरा में ऋषियों की महानता इस बात में निहित थी कि उन्होंने स्वयं को जानने, प्रकृति के गूढ़ नियमों को समझने के लिए महलों के ऐश्वर्य और क्षणभंगुर सांसारिक सुखों…

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At Anandabodh Institute of Yoga, we believe Yoga Teacher Training should be much more than completing a syllabus and receiving a certificate. It should be a journey of deep learning, personal transformation and authentic teaching.✨ Classical Yoga & Philosophy✨ Yogic Lifestyle & Wellbeing✨ Teaching Methodology & Practical TeachingBut above all, our intention is to develop the understanding, clarity and confidence to share Yoga with others. Because knowing Yoga and teaching Yoga are not the same.🪷 LEARN → EXPERIENCE → UNDERSTAND → TEACHThe programme also provides a foundation for further professional development and prepares participants for the Yoga Certification Board (YCB)…

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“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”अर्थात्, तुम्हारा अधिकार कर्म करने में है, उसके परिणामों पर नहीं।समुद्र के क्षितिज को यदि कोई छूना चाहे, तो वह कभी संभव नहीं हो पाता। हम जितना आगे बढ़ते हैं, क्षितिज उतना ही आगे खिसक जाता है। हमारे जीवन की प्रकृति भी कुछ ऐसी ही है। हम लक्ष्यों को पूरा करने, जीवन को व्यवस्थित करने और भीतर-बाहर की अव्यवस्था को समेटने के लिए निरंतर दौड़ते रहते हैं। किंतु जैसे ही एक काम समाप्त होता है, दूसरा सामने खड़ा मिलता है। एक ज़िम्मेदारी पूरी होती है, तो अगली दस्तक दे देती है। जीवन में कभी ऐसा कोई अंतिम…

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बीसवीं सदी के महान संत स्वामी शिवानंद सरस्वती ऋषिकेश में पतित पावनी गंगा के तट पर अवस्थित अपनी कुटिया में शिष्यों को दर्शन दे रहे थे। तभी एक अमेरिकी शिष्य और अपने जमाने के प्रख्यात दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक डॉ. थॉम्पसन ने सवाल पूछ लिया – “स्वामीजी, क्या आपने ईश्वर को देखा है?” शायद उत्तर में किसी अलौकिक दर्शन, समाधि के किसी अद्भुत अनुभव या किसी चमत्कारिक क्षण की अपेक्षा थी। लेकिन स्वामी जी के उत्तर से प्रश्न की दिशा ही बदल गई। उन्होंने कहा, “मैं ईश्वर के सिवा कुछ देखता ही नहीं। भोजन में, जल में, मिलने आए लोगों में…

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नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की… गोकुल के भगवान की, जय कन्हैया लाल की… जन्माष्टमी के मौके पर ब्रज में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में और सरहद पार भी ये शब्द गुंजायमान हैं। पर उत्सव, उल्लास और उमंग के परे राधा, गोपियां, रासलीला और श्रीकृष्ण की बांसुरी की सुमधुर धुन… आदि के आध्यात्मिक संदेश भी कुछ कम नहीं।कृष्ण भक्ति आंदोलन के तमाम संत कहते रहे हैं कि श्रीकृष्ण को मायावादी दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। उनके नाम, उनके रूप, उनके गुणों और उनकी लीलाओं में अंतर नहीं है। वह परब्रह्म हैं। पर हम सब श्रीकृष्ण की…

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रासलीला, श्रीकृष्ण की बांसुरी, उसकी सुमधुर धुन और गोपियां…. इस प्रसंग में बीती शताब्दी के महानतम संत परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती की व्याख्या एक नई दृष्टि प्रदान करती है। यह शास्त्रसम्मत है, विज्ञानसम्मत भी है। जन्माष्टमी के मौके पर विशेष तौर से ज्ञान मार्ग के लोगों के लिए एक प्रेरक कथा। परमगुरू और कोई सौ से ज्यादा देशों में विशाल वृक्ष का रूप धारण कर चुकी बिहार योग पद्धति के जन्मदाता परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के श्रीमुख से सत्संग के दौरान अनेक भक्तों ने यह कथा सुनी होगी। फिर भी यह सर्वकालिक है। प्रासंगिक है।  श्रीकृष्ण को अपनी बांसुरी से…

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प्राण शक्ति और चित्त शक्ति, इन्हीं दो मूल सिद्धांतों पर ब्रह्मांड की रचना टिकी है। ये दोनों अलग-अलग भले दिखते हैं, परंतु वास्तव में ये एक ही सत्ता के दो विपरीत ध्रुव हैं। इसी कारण प्राण के स्तर को बदलकर चेतना की अवस्था बदली जा सकती है, और चेतना के परिवर्तन से प्राण में भी परिवर्तन संभव है।तंत्र विज्ञान में स्पष्ट कहा गया है कि चेतना का विस्तार तभी होता है, जब ऊर्जा मुक्त होती है। चाहे हज़ार वर्षों तक ध्यान किया जाए, यदि प्राण ऊर्जा जाग्रत न हो तो चेतना का विकास असंभव है। आधुनिक मनोविज्ञान इस रहस्य से…

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