Author: Kishore Kumar

Spiritual journalist & Founding Editor of Ushakaal.com

बीसवीं सदी के महान संत परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने कोई पांच दशक पहले कहा था कि 21वीं शताब्दी भक्ति की शताब्दी होगी। यह अवश्य घटित होगा, एक मान्यता के रूप में नहीं, बल्कि विज्ञान के रूप में। बच्चे माता-पिता से सवाल करेंगे कि मीराबाई जहर पी कर भी जीवित कैसे रह गई थीं? यानी, यह चेतना के विकास से जुड़ा मामला है। वे अक्सर कहते थे कि आध्यात्मिक चेतना का विकास ही मनुष्य की नियति है। निम्न वासनाओं और कामनाओं के दायरे में सीमित रहना मनुष्य की नियति नहीं है। महर्षि अरविंद का भी इस विषय पर सुंदर और…

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अद्भुत! जीव-जंतुओं में भी ईश्वर का प्रतिरूप और उसकी पूजा! इसका मर्म वे क्या जानेंगे, जो जड़ों से कट गए और भारत को सपेरों का देश मानने लगे थे। पर, भारत जैसा आध्यात्मिक देश तो अपनी जड़ों से मजबूती से जुड़ा हुआ है। वह जिस तरह राम और रावण में फर्क जानता है, उसी तरह नाग के गुण-दोष को भी समझता है। उसे मालूम है कि वासुकि नाग में विष भरा है तो अमृत निकालने के काम भी वही आता है। हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। त्रिगुणायत मानवों को ही देख लीजिए। उसमें एक तरफ शील है, मर्यादा…

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स्वाधीनता दिवस की शुभकामनाएं।

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स्वाधीनता दिवस तीन अनूठे योग लेकर आया है। संसद के दोनों सदनों ने राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम 1971 में संशोधन कर ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज के समकक्ष विधिक दर्जा दे दिया है। इसी अवधि में इस कालजयी रचना की 150वीं वर्षगाँठ का स्मृति-वर्ष चल रहा है, जो पिछले नवंबर आरंभ हुआ। इसके साथ ही 15 अगस्त को श्रीअरविंद का जन्मदिवस भी है, जिन्होंने ‘वंदे मातरम्’ की महत्ता को एक बड़े कैनवास पर समझा और उसके महात्म्य को पूरी प्रखरता के साथ प्रकट किया। इन तीन घटनाओं का संगम एक पुराने प्रश्न को फिर जीवंत बना दिया है कि “वंदे मातरम्” को…

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देश भर में फैले नीलकंठ महादेव मंदिरों में वैसे तो सालो भर भीड़ होती है। पर सावन महीने की बात ही अलग है। भक्तगण कई-कई घंटे मशक्कत करके नीलकंठ महादेव का जलाभिषेक करते हैं। लेकिन जिस घटना की स्मृति में ये मंदिर बने हैं, उसके सबसे बड़े संदेशवाहक वे लोग होते हैं, जो कठिन समय में विष वमण नहीं, बल्कि उसे धारण करके भी धर्मानुकूल कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं।इस विचार को पौराणिक कथा के संदेशों के जरिए समझिए। समुद्र-मंथन के समय सबसे पहले हालाहल विष निकला। उस विष की ज्वाला से तीनों लोक संकट में पड़ गए। न देव…

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महर्षि वेदव्यास ने वेदों का वर्गीकरण करके उसे लिपिबद्ध करा दिया था, अठारह पुराणों की रचना पूरी की जा चुकी थी। स्वीकृति और यश की कोई कमी न थी। फिर भी सरस्वती नदी के पावन तट पर बैठे व्यास के मन में एक अजीब बेचैनी थी। तभी वहां देवर्षि नारद का पदार्पण होता है। वे उन्हें उस कमी का अहसास कराते हैं, जो उनकी निराशा का कारण बनी थी। वे संकेत करते हैं कि रचनाओं में भगवत्-तत्त्व और भगवान के निर्मल यश का वैसा गान नहीं हुआ, जैसा होना चाहिए था और जो दर्शन हृदय को तृप्त न करे, वह…

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मेरुदंड हमारे शरीर की संरचना का केंद्रीय अक्ष है, मुख्य आधार। मेरुदंड अस्वस्थ हो तो न शरीर सीधा खड़ा रह सकता है, न ही तंत्रिका तंत्र ठीक से कार्य कर सकता है, क्योंकि इसी स्तंभ के भीतर से वह मेरुरज्जु गुजरती है, जिस पर पूरे शरीर का तंत्रिका-संचार टिका है। पर रीढ़ का महत्व यहीं समाप्त नहीं होता। यौगिक और आध्यात्मिक परंपराओं में इसका अर्थ शरीर से आगे, गहन आध्यात्मिक तलों तक जाता है। ऋषियों का अनुभव है कि सीधी और सशक्त रीढ़ ही वह आधार है, जो साधक को अपने आंतरिक केंद्र और आत्म-जागरूकता से गहरा संबंध जोड़ने में…

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आषाढ़ शुक्ल द्वितीया यानी आगामी 16 जुलाई को महाप्रभु जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने रथों पर सवार होकर मुख्य मंदिर से गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करेंगे और नवें दिन यानी 24 जुलाई को बाहुड़ा यात्रा के साथ लौट आएँगे। सामान्यतः देवता मंदिरों के गर्भगृह में प्रतिष्ठित होते हैं और भक्त वहाँ तक पहुँचते हैं। पर पुरी में हर साल भगवान अपने रत्नसिंहासन से उतरकर भक्तों के बीच सड़क पर आ जाते हैं। यह ईश्वर की लोक-सुलभता का अनुपम उदाहरण है। इसे केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, समानता और आध्यात्मिक समावेशन का सबसे बड़ा…

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भारतीय दर्शन में कहा गया है, “विद्यादानं महादानम्।” दूसरी ओर श्रीमद्भगवत गीता तथा चाणक्य नीति में पात्र व्यक्ति को विद्या देने पर जोर है। प्रथम दृष्टया तो इन बातों में विरोधाभास प्रतीत होता है। पर, वास्तव में वे एक दूसरे के पूरक हैं। भारतीय दर्शन का बारीकी से अध्ययन करें तो स्पष्ट संदेश मिलता है कि विद्या का दान अवश्य किया जाए, क्योंकि वह महादान है; परंतु ज्ञान किसी पर थोपा न जाए। इसलिए, कहा गया है कि जिज्ञासा जगाना शिक्षक का धर्म है, और जिज्ञासा जागने पर निस्संकोच ज्ञान देना भी उसका धर्म है। ऐसी विद्या का दान ही…

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पंडवानी की विश्वविख्यात गायिका, पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई सदा के लिए मौन हो गईं। वह स्मृति परंपरा की जीती-जागती मिसाल थीं। सन् 1987 में पद्मश्री, सन् 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, सन् 2003 में पद्म भूषण और सन् 2019 में पद्म विभूषण सम्मान मिलना इस बात का द्योतक है कि वह जिस परंपरा की संवाहक थीं, उसे कितना ऊंचा स्थान प्राप्त था। वह भारत की उस ज्ञान-परंपरा की सशक्त प्रतिनिधि थी, जिसे मनुष्य की स्मृति, वाणी और अनुभव को ज्ञान का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता रहा है। वे जीवन पर्यंत पंडवानी के माध्यम से महाभारत की कथाएँ…

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