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Author: Kishore Kumar
Spiritual journalist & Founding Editor of Ushakaal.com
लाइलाज नहीं है यह ‘व्याधिमंदिरम्’
प्राचीनकाल में ऋषि-मुनियों ने शरीर को ‘व्याधिमंदिरम्’ यानी रोगों का घर बताते हुए चेतावनी दी थी कि योग के जरिए उसे इस तरह साधो कि वही शरीर ‘धर्मसाधनम्’ बन जाए। इसलिए कि जीवन का अंतिम लक्ष्य यही है। पर, हमने क्या किया? अतर्यात्रा से मुख मोड़कर बर्हिर्यात्रा शुरु की और इंदियों के दास बन गए। नतीजतन, जिस शरीर को धर्मसाधनम् बनना था, वह व्याधिमंदिरम् बनकर रह गया है। पर, हमरा जीवन कैसा है? हमने भागदौड़ भरी जिंदगी में दवाओं को ‘शॉर्टकट’ मान लिया है। शरीर में जरा-सा दर्द हुआ नहीं कि हमने गोली निगल ली। संकट यही से शुरु होता…
चलो बुलावा आया है…और आशा भोंसले चल पड़ीं अनंत यात्रा पर
माता रानी का बुलावा आया और अनंत यात्रा पर निकल पड़ी आशा भोसले। वैसे तो उनकी पहचान भारतीय संगीत की बहुरंगी धारा में चुलबुले, रोमांटिक और प्रयोगधर्मी गीतों के साथ जुड़ी हुई थी। पर उनके सुरमयी संसार का एक ऐसा भी पक्ष था, जहाँ उनके स्वर अध्यात्म की गहराइयों को छू जाते थे। तभी कई अवसरों पर उनके गीत गहरे आध्यात्मिक अनुभव में रूपांतरित होते प्रतीत होते थे। उनकी टीम के सदस्य अक्सर कहा करते थे कि जब वे भजन रिकॉर्ड करती थीं, तो स्टूडियो का समूचा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत होता था।एक मर्मस्पर्शी घटना मराठी अभंग की रिकॉर्डिंग…
योग के मूल स्वरुप की पुनर्स्थापना के लिए योग-यात्रा
बीसवीं सदी के महान संत परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी तथा विश्व प्रसिद्ध बिहार योग विद्यालय के परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती की “भारत योग यात्रा – 2026” योग विद्या के वर्तमान व्यावसायिक स्वरूप से अलग प्राचीन विद्या के वास्तविक और शुद्ध रूप को पुनर्स्थापित करने का एक प्रयास है। इसे बिहार योग परंपरा या सत्यानंद योग परंपरा में “योग का द्वितीय अध्याय” के रुप में जाना जाता है।योग का द्वितीय अध्याय केवल एक नया चरण नहीं है; यह योग का पुनर्जनन है। हम जानते हैं कि बिहार योग विद्यालय बीसवीं सदी के महान संत परमहंस स्वामी सत्यानंद…
मेरुदंड : आध्यात्मिक उत्थान का आधार
किसी व्यक्ति के गुण या व्यवहार प्रतिकूल हो तो हम सब कहते हैं कि फलां रीढ़ विहीन है। इसके विपरीत रीढ़ का सीधा होना साहस, आत्मसम्मान और नैतिक दृढ़ता का प्रतीक बन जाता है। पर, इस मुहावरे से इतर रीढ़ का महत्व इतना है कि चिकित्सा विज्ञान से लेकर अध्यात्म विज्ञान तक में इसकी महत्ता पर काफी कुछ कहा गया है। चिकित्सा विज्ञान के दृष्टिकोण से मेरुदंड (रीढ़) हमारे शरीर की संरचना का केंद्रीय अक्ष है, मुख्य आधार है। मेरुदंड अस्वस्थ हो तो न शरीर सीधा खड़ा रह सकता है, न ही तंत्रिका तंत्र ठीक से कार्य कर सकता है।…
इसलिए ज्ञान के असीम सागर हैं श्री हनुमान
जय हनुमान ज्ञान-गुण सागर…. गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री हनुमान जी को “ज्ञान गुण सागर” क्यों कहा? इसलिए कि सूर्य भगवान से अपार ज्ञान प्राप्त करने के कारण ज्ञानियों में अग्रगण्य (सबसे आगे) हैं। ज्ञान के असीम सागर हैं। यह केवल स्तुति नहीं, बल्कि एक पूर्ण व्यक्तित्व का खाका है। श्री तुलसीदास जी जब उन्हें असीम ज्ञान का पुंज और दोषरहित बाताते हैं, तो इसका सीधा अर्थ यह है कि वास्तविक ज्ञान वही है जो अहंकार को समाप्त कर दे।प्रकृति का नियम है कि जहाँ गुण होते हैं, वहाँ कुछ न कुछ दोष भी होते हैं, लेकिन हनुमान जी दोषरहित…
हनुमान जयंती : आंतरिक समुद्र-लंघन का उत्सव
भारत भूमि पर शायद ही कोई ऐसा दिन हो, जब श्रीराम भक्त हनुमान जी की दिव्य कथा, उनके असीम बल, ज्ञान और निरभिमानी स्वरूप की महिमा न गाई जाती हो। सूर्य को निगलने की कथा, भूलोक में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की सेवा और पाताललोक में अहिरावण का वध करके राम – लक्ष्मण को वापस लाने संबंधी प्रसंग इस बात के प्रमाण हैं कि उनकी व्याप्ति तीनों लोकों में है। वे अतुलित बल के धाम होते हुए भी इतने अभिमान-शून्य हैं कि स्वयं को केवल राम जी के दूत से इतर कुछ भी मानने को तैयार नहीं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार…
जैसा भोजन, वैसा मन; जैसा मन, वैसा विचार; जैसा विचार, वैसा कर्म
वैदिक परंपरा में ‘आहार’ शब्द का अर्थ केवल वह भोजन नहीं है जो हम मुख से ग्रहण करते हैं। यह एक समग्र अवधारणा है जिसमें वह सब कुछ शामिल है जिसे हम अपनी इंद्रियों और मन के माध्यम से ‘ग्रहण’ करते हैं। जैसा कि छांदोग्य उपनिषद में कहा गया है – “आहार शुद्धौ सत्त्व शुद्धिः; सत्त्व शुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः; स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः।” मतलब यह कि जब आहार शुद्ध होता है, तो अंतःकरण शुद्ध होता है; अंतःकरण की शुद्धि से स्थिर स्मृति (आत्म-स्मरण) आती है; और स्मृति की प्राप्ति होने पर समस्त बंधनों से मुक्ति मिल जाती है।छांदोग्य उपनिषद का यह…
रामनवमी : राम से बड़ा राम का नाम
मनुष्य ने विकास के अनेक सोपान तय किए हैं। पर, आंतरिक शांति और आध्यात्मिक उत्थान चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। ऐसे में गोस्वामी तुलसीदास जी का कालजयी निष्कर्ष, ‘कलि केवल हरि नाम अधारा’ हर दृष्टिकोण से व्यावहारिक जान पड़ता है। रामनवमी के पावन अवसर पर जब हम मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के अवतरण का उत्सव मनाने वाले हैं, तब राम नाम की इस महिमा पर विचार करना और भी प्रासंगिक हो गया है। इसलिए कि यह नाम केवल एक शब्द नहीं, बल्कि चेतना को जागृत करने वाली एक दिव्य ध्वनि है।श्रीरामचरितमानस के बालकांड में राम नाम की महिमा का वर्णन अत्यंत गहन…
श्रीदुर्गासप्तशती : आध्यात्मिक चेतना का विज्ञान
भारतीय अध्यात्म की समृद्ध परंपरा में ऐसे ग्रंथ हैं, जिन्हें मनुष्य के भीतर छिपे रहस्यों की कुंजी कहा जाना चाहिए। मार्कंडेय पुराण का श्रीदुर्गासप्तशती उन्हीं में एक प्रमुख ग्रंथ है। अक्सर लोग इसमें वर्णित कथा को केवल देवी और असुरों के युद्ध की पौराणिक या ऐतिहासिक कथा मान लेते हैं। लेकिन गहराई से पड़ताल करें, तो पता चलता है कि यह मानव चेतना के तेरह चरणों का ब्रह्मांडीय आध्यात्मिक विज्ञान है। इसमें वर्णित सात सौ श्लोक असल में हमारे मन की परतों को खोलते हुए उसे ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जोड़ने का काम करते हैं। इस लिहाज से देवी और असुरों…
षट्कर्म बिना अधूरी है योग साधना
भारतीय परंपरा में योग आत्मानुशासन और आत्मबोध की साधना के रूप में पल्लवित-पुष्पित होता रहा है। पर, उसे सीमित स्वरूप देकर आज दुनिया भर के जिम और स्टूडियो में एक ग्लैमरस वर्कआउट के तौर पर प्रस्तुत किया जाने लगा है। नतीजतन, षट्कर्म रूपी मानव शरीर के आंतरिक शोधन का मूल विज्ञान हाशिए पर जा चुका है। भारतीय यौगिक दर्शन में इसे ‘घटाकाश’ के अद्भुत रूपक से समझाया गया है। घटाकाश का अर्थ है कि घड़े के भीतर भी वही अनंत आकाश है, जो बाहर व्याप्त है। यहाँ घड़ा हमारा शरीर है और उसके भीतर का आकाश हमारी जीवात्मा। जब मिट्टी…
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