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Author: Kishore Kumar
Spiritual journalist & Founding Editor of Ushakaal.com
पतित पावनी गंगा का आध्यात्मिक आख्यान
भागीरथी तपस्या और शिव की जटाओं से नियंत्रित होकर धरती पर उतरी गंगा महज एक नदी नहीं, बल्कि सनातन चेतना के अंतस में बहती जीवनदायिनी धारा है। यह भारतीय आध्यात्मिक यात्रा का दिव्य और जीवंत आख्यान है। जब महर्षि विश्वामित्र के साथ यज्ञ रक्षा के लिए वनगमन करते समय श्रीराम ने गंगा के दैवीय सौंदर्य को निहारा, तो उनके मन में कौतूहल और जिज्ञासाएं जाग्रत हुईं। उन जिज्ञासाओं के समाधान में महर्षि ने गंगा अवतरण का जो प्रसंग सुनाया, वह केवल एक ऐतिहासिक घटना का वृतांत भर नहीं था, बल्कि श्रीराम के भावी जीवन का एक आध्यात्मिक खाका भी था।…
संत मलूकदास : दास मलूका कह गए सबके दाता राम
संतों की जयंती मनाना केवल अतीत को याद करने जैसा नहीं, बल्कि वर्तमान को दिशा देना होता है। इसलिए, जब संतों के जीवन और उनके विचारों पर दृष्टि डालते हैं, तो स्पष्ट होता है कि उनकी शिक्षाएँ समय की सीमाओं से परे हैं। विज्ञान, तकनीक और सामाजिक संरचनाओं के क्षेत्र में हमने भले उल्लेखनीय प्रगति कर ली है। पर, खुद का रुपांतरण होना बाकी है। काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसे आंतरिक शत्रु आज भी प्रबल हैं। ऐसे में संत मलूकदास की 452वीं जयंती पर जब देश-विदेश में उन्हें विविध रूपों में स्मरण किया गया, और उनकी शिक्षाएं नईपीढ़ी के…
गुरु की चेतना की छाया में सबका कल्याण करते श्रीश्री
वैदिक परंपरा में गुरु और शिष्य का संबंध बीज और वृक्ष की तरह होता है, जहाँ बीज अपनी पूरी सामर्थ्य वृक्ष में समाहित कर देता है। श्रीश्री रविशंकर का जीवन और उनकी आध्यात्मिक उपलब्धियों पर गौर करें तो कहना होगा कि महर्षि महेश योगी की चेतना की छाया श्रीश्री के व्यक्तित्व और उनके वैश्विक मिशन में एक आधारशिला की तरह विद्यमान है।महर्षि महेश योगी की सबसे बड़ी खूबी ‘निंदा का पूर्ण अभाव’ थी। वे साधारण व्यक्ति को भी ‘गवर्नर’ या ‘राजा’ कहकर उसकी गरिमा को जगाते थे। श्रीश्री के व्यवहार में यही छाया ‘अपनत्व’ और ‘मुस्कुराहट’ के रूप में दिखती…
अजेय चेतना का प्रतीक है सोमनाथ
भारत का उत्थान केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उत्थान के लिए भी है। इस देश का राष्ट्रीय जीवन उसकी आध्यात्मिक चेतना से अलग नहीं किया जा सकता। इसी कारण जब सोमनाथ पुनर्निर्माण हुआ, तो इसे भारतीय आत्मा की वापसी के रूप में देखा। सोमनाथ का पुनर्निर्माण भारतीयो लिए केवल स्थापत्य पुनर्निर्माण नहीं था, बल्कि वह पराजय की मानसिकता से मुक्ति का प्रतीक था। जहां तक ज्योर्तिलिंग का सवाल है तो योगदर्शन के मुताबिक, शिव दैवीव चेतना, मौन, तप और रूपांतरण की दिव्य शक्ति के प्रतीक हैं। इस लिहाज से सोमनाथ का बार-बार विध्वंस और पुनर्जीवन से संदेश…
देखकर बाधा विविध बहु विघ्न घबराते नहीं…
जय और पराजय जीवन की स्थायी अवस्थाएँ नहीं, बल्कि मन की क्षणिक तरंगें हैं। कोई भी हार अंतिम नहीं होती और कोई भी जीत शाश्वत नहीं होती। इसलिए हमारी वास्तविक सफलता इस बात में निहित नहीं कि हम कितनी बार जीते, बल्कि इस बात में है कि हार के क्षणों में स्वयं को किस तरह और कितना संभाला। जब ऐसी समझ विकसित होती है, तब जीवन केवल प्रतियोगिता नहीं रह जाता, बल्कि वह आत्मविकास की यात्रा बन जाता है।इस बात को सदैव याद रखा जाना चाहिए कि जय और पराजय का पहला आधार वह नहीं होता, जो मौजूद होता है…
योग विद्या के महान योगी का पदार्पणोत्सव
बिहार में उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर बसे मुंगेर की पावन धरती ने कभी दानवीर कर्ण की अद्वितीय उदारता देखी थी। लेकिन नियति ने इस भूमि की कोख में चेतना के जागरण का एक और महायज्ञ सुरक्षित रखा था। बीसवीं सदी में इस महायज्ञ के सूत्रधार बने महायोगी परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती। उनके तप और सद्प्रयासों के कारण यह ऐतिहासिक शहर वैश्विक आध्यात्मिक घटनाओं का केंद्र बन गया। उनकी महासमाधि के कोई सत्रह साल बीत जाने के बाद अब उनकी सूक्ष्म ऊर्जा का प्रभाव पद्म समारोह के दौरान दिखेगा, जो भक्ति और योग का अद्भुत संगम होगा।स्वामी सत्यानंद सरस्वती जब…
आ गए श्री बाबा नीब करोली महाराज!
“ये बाबा बहुत दिनों से नहीं आए। बाबा की बहुत याद आ रही है… भवन, इसका पेट भी फूला हुआ है, मुझे बड़ी चिंता हो रही है… ऐसी भी क्या नाराजगी थी महाराज? आपने दर्शन नहीं दिए…” भक्तों की यह आर्त पुकार अनसुनी नहीं रह पाती और तभी ममत्व से सराबोर एक वाणी गूंजती है, “ये देख मैं आ गया हूं तेरे लिए। इसी दिन का इंतजार था ना तुझे?” यह किसी साठ-सत्तर के दशक की चमत्कारिक घटना का वर्णन नहीं, बल्कि नीम करोली बाबा पर बनी फिल्म “श्री बाबा नीब करोली महाराज” के टीजर का एक अंश है। मराठी…
पृथ्वी दिवस : पृथ्वी संरक्षण का वैदिक दृष्टिकोण
पृथ्वी की गोद में जीवन का स्पंदन अनादि काल से है। तभी जिस पारिस्थितिक संतुलन की बात दुनिया भर में की जा रही है, उसकी आधारशिला भारत के ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व वैदिक सूक्तों के रुप में रख दी थी। वैदिक काल में प्रकृति केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि वह हमारे लिए वंदनीय थी। अथर्ववेद के ‘पृथ्वी सूक्त’ में कहा गया हैं कि ‘माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः’ अर्थात् यह भूमि मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूँ। इस तरह, जब हम पृथ्वी को माता मानते हैं, तो उसका दोहन करना अकल्पनीय हो जाता है। यही वजह…
हृदय का अदृश्य शत्रु और उसका यौगिक समाधान
हृदय रोग के प्रति हमारी पारंपरिक समझ नए-नए वैज्ञानिक शोधो के कारण तेजी से बदल रहे हैं। अब तक हम मानते थे कि धमनियों में कोलेस्ट्रॉल समय के साथ ठीक वैसे जमा होते जाता है, जैसे पाइपों में कचरा। यह जमाव तय मानकों से ज्यादा होता है तो खतरा उत्पन्न होता है। पर, आधुनिक विज्ञान ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। नए अनुसंधानों से पता चला है कि हृदयाघात या ब्रेन हैंमरेज के कारण काल के गाल में समां जाने वाले लगभग पच्चीस फीसदी लोगों की कोई मेडिकल हिस्ट्री नहीं होती है। सवाल वाजिब है कि पैथोल़ॉजिकल…
लाइलाज नहीं है यह ‘व्याधिमंदिरम्’
प्राचीनकाल में ऋषि-मुनियों ने शरीर को ‘व्याधिमंदिरम्’ यानी रोगों का घर बताते हुए चेतावनी दी थी कि योग के जरिए उसे इस तरह साधो कि वही शरीर ‘धर्मसाधनम्’ बन जाए। इसलिए कि जीवन का अंतिम लक्ष्य यही है। पर, हमने क्या किया? अतर्यात्रा से मुख मोड़कर बर्हिर्यात्रा शुरु की और इंदियों के दास बन गए। नतीजतन, जिस शरीर को धर्मसाधनम् बनना था, वह व्याधिमंदिरम् बनकर रह गया है। पर, हमरा जीवन कैसा है? हमने भागदौड़ भरी जिंदगी में दवाओं को ‘शॉर्टकट’ मान लिया है। शरीर में जरा-सा दर्द हुआ नहीं कि हमने गोली निगल ली। संकट यही से शुरु होता…
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