Author: Kishore Kumar

Spiritual journalist & Founding Editor of Ushakaal.com

जय और पराजय जीवन की स्थायी अवस्थाएँ नहीं, बल्कि मन की क्षणिक तरंगें हैं। कोई भी हार अंतिम नहीं होती और कोई भी जीत शाश्वत नहीं होती। इसलिए हमारी वास्तविक सफलता इस बात में निहित नहीं कि हम कितनी बार जीते, बल्कि इस बात में है कि हार के क्षणों में स्वयं को किस तरह और कितना संभाला। जब ऐसी समझ विकसित होती है, तब जीवन केवल प्रतियोगिता नहीं रह जाता, बल्कि वह आत्मविकास की यात्रा बन जाता है।इस बात को सदैव याद रखा जाना चाहिए कि जय और पराजय का पहला आधार वह नहीं होता, जो मौजूद होता है…

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बिहार में उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर बसे मुंगेर की पावन धरती ने कभी दानवीर कर्ण की अद्वितीय उदारता देखी थी। लेकिन नियति ने इस भूमि की कोख में चेतना के जागरण का एक और महायज्ञ सुरक्षित रखा था। बीसवीं सदी में इस महायज्ञ के सूत्रधार बने महायोगी परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती। उनके तप और सद्प्रयासों के कारण यह ऐतिहासिक शहर वैश्विक आध्यात्मिक घटनाओं का केंद्र बन गया। उनकी महासमाधि के कोई सत्रह साल बीत जाने के बाद अब उनकी सूक्ष्म ऊर्जा का प्रभाव पद्म समारोह के दौरान दिखेगा, जो भक्ति और योग का अद्भुत संगम होगा।स्वामी सत्यानंद सरस्वती जब…

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“ये बाबा बहुत दिनों से नहीं आए। बाबा की बहुत याद आ रही है… भवन, इसका पेट भी फूला हुआ है, मुझे बड़ी चिंता हो रही है… ऐसी भी क्या नाराजगी थी महाराज? आपने दर्शन नहीं दिए…” भक्तों की यह आर्त पुकार अनसुनी नहीं रह पाती और तभी ममत्व से सराबोर एक वाणी गूंजती है, “ये देख मैं आ गया हूं तेरे लिए। इसी दिन का इंतजार था ना तुझे?” यह किसी साठ-सत्तर के दशक की चमत्कारिक घटना का वर्णन नहीं, बल्कि नीम करोली बाबा पर बनी फिल्म “श्री बाबा नीब करोली महाराज” के टीजर का एक अंश है। मराठी…

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पृथ्वी की गोद में जीवन का स्पंदन अनादि काल से है। तभी जिस पारिस्थितिक संतुलन की बात दुनिया भर में की जा रही है, उसकी आधारशिला भारत के ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व वैदिक सूक्तों के रुप में रख दी थी। वैदिक काल में प्रकृति केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि वह हमारे लिए वंदनीय थी। अथर्ववेद के ‘पृथ्वी सूक्त’ में कहा गया हैं कि ‘माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः’ अर्थात् यह भूमि मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूँ। इस तरह, जब हम पृथ्वी को माता मानते हैं, तो उसका दोहन करना अकल्पनीय हो जाता है। यही वजह…

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हृदय रोग के प्रति हमारी पारंपरिक समझ नए-नए वैज्ञानिक शोधो के कारण तेजी से बदल रहे हैं। अब तक हम मानते थे कि धमनियों में कोलेस्ट्रॉल समय के साथ ठीक वैसे जमा होते जाता है, जैसे पाइपों में कचरा। यह जमाव तय मानकों से ज्यादा होता है तो खतरा उत्पन्न होता है। पर, आधुनिक विज्ञान ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। नए अनुसंधानों से पता चला है कि हृदयाघात या ब्रेन हैंमरेज के कारण काल के गाल में समां जाने वाले लगभग पच्चीस फीसदी लोगों की कोई मेडिकल हिस्ट्री नहीं होती है। सवाल वाजिब है कि पैथोल़ॉजिकल…

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प्राचीनकाल में ऋषि-मुनियों ने शरीर को ‘व्याधिमंदिरम्’ यानी रोगों का घर बताते हुए चेतावनी दी थी कि योग के जरिए उसे इस तरह साधो कि वही शरीर ‘धर्मसाधनम्’ बन जाए। इसलिए कि जीवन का अंतिम लक्ष्य यही है। पर, हमने क्या किया? अतर्यात्रा से मुख मोड़कर बर्हिर्यात्रा शुरु की और इंदियों के दास बन गए। नतीजतन, जिस शरीर को धर्मसाधनम् बनना था, वह व्याधिमंदिरम् बनकर रह गया है। पर, हमरा जीवन कैसा है? हमने भागदौड़ भरी जिंदगी में दवाओं को ‘शॉर्टकट’ मान लिया है। शरीर में जरा-सा दर्द हुआ नहीं कि हमने गोली निगल ली। संकट यही से शुरु होता…

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माता रानी का बुलावा आया और अनंत यात्रा पर निकल पड़ी आशा भोसले। वैसे तो उनकी पहचान भारतीय संगीत की बहुरंगी धारा में चुलबुले, रोमांटिक और प्रयोगधर्मी गीतों के साथ जुड़ी हुई थी। पर उनके सुरमयी संसार का एक ऐसा भी पक्ष था, जहाँ उनके स्वर अध्यात्म की गहराइयों को छू जाते थे। तभी कई अवसरों पर उनके गीत गहरे आध्यात्मिक अनुभव में रूपांतरित होते प्रतीत होते थे। उनकी टीम के सदस्य अक्सर कहा करते थे कि जब वे भजन रिकॉर्ड करती थीं, तो स्टूडियो का समूचा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत होता था।एक मर्मस्पर्शी घटना मराठी अभंग की रिकॉर्डिंग…

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बीसवीं सदी के महान संत परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी तथा विश्व प्रसिद्ध बिहार योग विद्यालय के परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती की “भारत योग यात्रा – 2026” योग विद्या के वर्तमान व्यावसायिक स्वरूप से अलग प्राचीन विद्या के वास्तविक और शुद्ध रूप को पुनर्स्थापित करने का एक प्रयास है। इसे बिहार योग परंपरा या सत्यानंद योग परंपरा में “योग का द्वितीय अध्याय” के रुप में जाना जाता है।योग का द्वितीय अध्याय केवल एक नया चरण नहीं है; यह योग का पुनर्जनन है। हम जानते हैं कि बिहार योग विद्यालय बीसवीं सदी के महान संत परमहंस स्वामी सत्यानंद…

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किसी व्यक्ति के गुण या व्यवहार प्रतिकूल हो तो हम सब कहते हैं कि फलां रीढ़ विहीन है। इसके विपरीत रीढ़ का सीधा होना साहस, आत्मसम्मान और नैतिक दृढ़ता का प्रतीक बन जाता है। पर, इस मुहावरे से इतर रीढ़ का महत्व इतना है कि चिकित्सा विज्ञान से लेकर अध्यात्म विज्ञान तक में इसकी महत्ता पर काफी कुछ कहा गया है। चिकित्सा विज्ञान के दृष्टिकोण से मेरुदंड (रीढ़) हमारे शरीर की संरचना का केंद्रीय अक्ष है, मुख्य आधार है। मेरुदंड अस्वस्थ हो तो न शरीर सीधा खड़ा रह सकता है, न ही तंत्रिका तंत्र ठीक से कार्य कर सकता है।…

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जय हनुमान ज्ञान-गुण सागर…. गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री हनुमान जी को “ज्ञान गुण सागर” क्यों कहा? इसलिए कि सूर्य भगवान से अपार ज्ञान प्राप्त करने के कारण ज्ञानियों में अग्रगण्य (सबसे आगे) हैं। ज्ञान के असीम सागर हैं। यह केवल स्तुति नहीं, बल्कि एक पूर्ण व्यक्तित्व का खाका है। श्री तुलसीदास जी जब उन्हें असीम ज्ञान का पुंज और दोषरहित बाताते हैं, तो इसका सीधा अर्थ यह है कि वास्तविक ज्ञान वही है जो अहंकार को समाप्त कर दे।प्रकृति का नियम है कि जहाँ गुण होते हैं, वहाँ कुछ न कुछ दोष भी होते हैं, लेकिन हनुमान जी दोषरहित…

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