मेरुदंड हमारे शरीर की संरचना का केंद्रीय अक्ष है, मुख्य आधार। मेरुदंड अस्वस्थ हो तो न शरीर सीधा खड़ा रह सकता है, न ही तंत्रिका तंत्र ठीक से कार्य कर सकता है, क्योंकि इसी स्तंभ के भीतर से वह मेरुरज्जु गुजरती है, जिस पर पूरे शरीर का तंत्रिका-संचार टिका है। पर रीढ़ का महत्व यहीं समाप्त नहीं होता। यौगिक और आध्यात्मिक परंपराओं में इसका अर्थ शरीर से आगे, गहन आध्यात्मिक तलों तक जाता है। ऋषियों का अनुभव है कि सीधी और सशक्त रीढ़ ही वह आधार है, जो साधक को अपने आंतरिक केंद्र और आत्म-जागरूकता से गहरा संबंध जोड़ने में सहायता प्रदान करती है।
सवाल है कि शरीर के इतने महत्वपूर्ण मेरुदंड यानी स्पाइन को स्वस्थ किस तरह रखा जाए कि शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उत्थान में बाधा न हो। इसके लिए यौगिक परंपरा और आधुनिक विज्ञान दोनों एक व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रदान करते हैं। यह लेख कोई दार्शनिक विचार बनकर न रह जाए, इसके लिए मैंने दिल्ली एनसीआर के प्रसिद्ध योगाचार्य और आनंदबोध संस्थान के प्रमुख शिवचित्तम से रीढ़ और उससे जुड़ी बीमारियों पर विस्तार से बात की और जाना कि उसे किस तरह स्वस्थ रखा जा सकता है। लिहाजा, यह पूरा लेख उनकी योग साधना के व्यावहारिक अनुभवों पर आधारित है।

पर, पहले तीन व्यक्तिगत अनुभवों पर एक नजर डालिए। दो दृष्टांत तो आनंदबोध की वेबसाइट पर विस्तार से हैं। तीसरा प्रसंग भारतीय विदेश सेवा की 1974 बैच की अधिकारी, पूर्व राजनयिक, अंतरराष्ट्रीय मामलों की विश्लेषक और केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री श्री हरदीप सिंह पुरी की पत्नी श्रीमती लक्ष्मी एम. पुरी से जुड़ा है। उनका अनुभव भी कम प्रेरक नहीं है। वे कहती हैं – “मैं स्लिप्ड डिस्क की गंभीर समस्या से पीड़ित हो गई थी। चिकित्सकों ने चेतावनी दी थी कि अब मेरा सक्रिय जीवन सीमित हो सकता है। मेरी जैसी सक्रिय जीवन-शैली वाली महिला के लिए यह विचार बेहद डरावना था। लेकिन अपने वर्तमान योगगुरु शिवचित्तम जी के मार्गदर्शन और अनुशासित योगाभ्यास के बल पर मैं फिर से स्वस्थ जीवन की ओर लौट सकी। केवल दस दिनों के भीतर मुझे दर्दनिवारक दवाओं की आवश्यकता समाप्त हो गई और मैं पुनः पूरी सक्रियता के साथ अपने जीवन में लौट आई। इस अनुभव के लिए मैं स्वयं को अत्यंत कृतज्ञ महसूस करती हूँ।”
श्रीमती राम्याश्री स्लिप्ड डिस्क और साइटिका के भयंकर दर्द से जूझ रही थीं। रीढ़ की सर्जरी तक करानी पड़ी। पर, समस्या बनी रह गई थी। शिवचित्तम के मार्गदर्शन में पांच स्तरीय समन्वित योग के अभ्यास के बाद ही समस्या से पूर्णतः निजात मिली थी। दूसरा प्रसंग है गर्विता चावला का। उनका मामला ज्यादा गंभीर था। वे सिस्टमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस (एसएलई) से पीड़ित थीं। इस क्रोनिक सिस्टेमिक रूमैटिक रोग के कारण तेरह-चौदह वर्षों के अंतराल में उनकी हड्डियां कमजोर हो गईं और रीढ़ में फ्रैक्चर हो गया था। ढाई वर्षों के निरंतर यौगिक अभ्यास से रिकवरी को गति मिल गई। अब वे स्वस्थ हैं।
मेरुदंड से जुड़े स्लिप्ड डिस्क और साइटिका पहली नजर में अलग-अलग बीमारी होते हुए भी एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए हैं। स्लिप्ड डिस्क कारण है, तो साइटिका उसका सबसे सामान्य परिणाम। यद्यपि हर साइटिका डिस्क से नहीं होती। कभी नितंब की पिरिफॉर्मिस मांसपेशी भी तंत्रिका को दबा सकती है। पर अधिकांश मामलों में जड़ रीढ़ में ही होती है। पहले इन्हें बढ़ती उम्र की बीमारियां समझा जाता था। पर, आधुनिक युग में शरीर की गलत मुद्राएं, निष्क्रियता, मानसिक तनाव आदि का मिलाजुला असर है कि युवा भी इन रोगों के शिकार हो रहे हैं। अब आइए, मुख्य विषय पर कि मेरुदंड को स्वस्थ किस तरह रखा जाए और उससे जुड़ी बीमारियों से निजात किस तरह पाया जाए।
शिवचित्तम इन बीमारियों के यौगिक उपचार के लिए पाँच स्तरीय योग चिकित्सा समन्वित पद्धति को उपयोग में लाते हैं। यह पद्धति केवल शारीरिक आसनों तक सीमित नहीं है। बल्कि, शरीर की आंतरिक ऊर्जा को क्रमशः जागृत करने वाली एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। इसमें श्वास, मन, सात्विक आहार और प्राकृतिक उपचारों का समन्वय होने के कारण शरीर की अपनी हीलिंग क्षमता सक्रिय हो जाती है। प्रारंभिक चरण का एकमात्र लक्ष्य प्रभावित हिस्से को पूर्ण विश्राम देकर मांसपेशियों को शिथिलता प्रदान करना होता है। चूंकि जहाँ दर्द होता है, वहाँ ऊर्जा का अवरोध या सूजन होती है, इसलिए अद्वासन और मकरासन जैसी आरामदायक मुद्राओं में श्वास की सजगता का अभ्यास कराया जाता है। ‘ॐ’ मंत्र के जप से मानसिक व भावनात्मक शुद्धि होती है तो इससे बहुस्तरीय लाभ होता है। आवश्यकतानुसार गर्म पानी की सिकाई करने से दर्द कम करने की प्रक्रिया तेज होती है। इस तरह, दर्द और मांसपेशियों की जकड़न कुछ कम होती है, तब दूसरे चरण का उपचार प्रारंभ किया जाता है।
इस चरण का मुख्य उद्देश्य रीढ़ के भीतर ऊर्जा के प्रवाह को पुनर्जीवित करना होता है। इस अवस्था में श्वास के समन्वय के साथ अत्यंत सरल मेरुदण्डीय गतियां कराई जाती हैं। मानसिक अवलोकन, मंत्र जप, सोऽहम् अजपा जप और योग निद्रा के माध्यम से रोगी को अपनी रीढ़ के भीतर एक सकारात्मक ऊर्जा का अहसास कराया जाता है। यह चरण इस गहरे सत्य पर आधारित है कि जहां हमारी सजगता जाती है, वहीं ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है और वहीं से वास्तविक हीलिंग यानी उपचार की शुरुआत होती है।
इस संबंध में एक चर्चित दृष्टिकोण गौरतलब है। न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के रस्क इंस्टीट्यूट ऑफ रिहैबिलिटेशन मेडिसिन के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. जॉन ई. सार्नो ने हजारों ऐसे रोगियों का उपचार किया, जो वर्षों से कमर, गर्दन और मांसपेशियों के पुराने दर्द से पीड़ित थे, लेकिन जिनकी एमआरआई, एक्स-रे या अन्य जाँचों में दर्द की तीव्रता के अनुरूप कोई गंभीर संरचनात्मक क्षति दिखाई नहीं देती थी। उनके लिए यह शोध का विषय हो गया। अंततः वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अनेक मामलों में पुराने दर्द का संबंध मन में दबे हुए तनाव, भय, क्रोध, चिंता और भावनात्मक संघर्षों से भी होता है। इसलिए रोगी को मानसिक तनाव से बाहर लाकर दर्द के चक्र को तोड़ा जा सकता है। उनकी यह खोज टेंशन मायोसाइटिस सिंड्रोम सिद्धांत के रूप में प्रसिद्ध हुई।

खैर, तीसरे चरण में कदम रखते ही रीढ़ को सहारा देने वाली मांसपेशियों को मजबूत करने का काम शुरू होता है। हमारी पीठ, पेट और पेल्विक क्षेत्र की मांसपेशियाँ ही रीढ़ का असली सुरक्षा कवच हैं। नियंत्रित श्वास के साथ सर्पासन, भुजंगासन, शलभासन और कंधरासन का धीमा अभ्यास शुरू कराया जाता है। इससे रीढ़ को लचीला, मजबूत और संरेखित रखने में मदद मिलती है, कशेरुकाओं के बीच की डिस्क को पोषण मिलता है। रीढ़ के चारों ओर की मांसपेशियां मजबूत होती हैं, रक्त संचार में सुधार होता है और तंत्रिका तंत्र शांत होता है। चौथे चरण का पूरा ध्यान रीढ़ की स्वाभाविक लचक और गतिशीलता को वापस लाने पर होता है। अक्सर दर्द ठीक होने के बाद भी रीढ़ में एक अकड़न बनी रह जाती है, जो भविष्य में दोबारा दर्द का कारण बनती है। इस अवस्था में उष्ट्रासन, मार्जरी आसन और अर्धमत्स्येन्द्रासन जैसे सुरक्षित अभ्यास कराए जाते हैं। ये आसन रीढ़ को सुरक्षित ढंग से मोड़ने और लचीला बनाने में सहायक होते हैं।
जब शरीर पूरी तरह सक्षम और रोगमुक्त हो जाता है, तब अंतिम चरण की शुरुआत होती है। अब रोगी को एक संतुलित और दीर्घकालिक योग दिनचर्या की ओर ले जाया जाता है। इसमें सूर्य नमस्कार, प्राणायाम और ध्यान को जीवन का स्थाई हिस्सा बनाया जाता है। इस अंतिम चरण का उद्देश्य केवल दर्द से मुक्ति नहीं है, बल्कि रीढ़ को इतना सुदृढ़ बनाना होता है कि व्यक्ति दैनिक जीवन के तनावों का सहजता से सामना कर सके।
श्री शिवचित्तम के यौगिक उपचार से मिल रहे परिणाम दुनिया भर में हुए या हो रहे अनुसंधानों के अनुरूप हैं। उदाहरण के लिए, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ने भी शोध किया है और पता चला कि जिन मरीजों को दवाओं के साथ ही योगाभ्यास भी कराया गया, उन्हें बीमारी को नियंत्रित करने में ज्यादा सफलता मिली। यह शोध 25 से 55 साल के 64 मरीजों पर किया गया था। शोध परिणामों को नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित किया गया है। अमेरिका के अर्थराइटिस फाउंडेशन के परिणाम भी कुछ ऐसे ही रहे। इस संस्थान ने आयंगार योग संस्थान के सहयोग से शोध किया तो मरीजों को इतनी राहत मिली कि अब बड़े पैमाने पर शोध किया जा रहा है।
इसी तरह, मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान और स्वामी विवेकानंद योग अनुसंधान संस्थान ने बेंगलुरु में संयुक्त रूप से कमर दर्द से पीड़ित महिला और पुरुषों को मिलाकर 35 मरीजों पर योगाभ्यासों के प्रभाव का अध्ययन किया। इस काम के लिए ऐसे मरीजों को शामिल नहीं किया गया था, जिन्हें किसी बीमारी की वजह से दर्द था या वे गंभीर रूप से बीमार थे। 35 मरीजों में 22 महिलाएं और 13 पुरुष थे। अध्ययन के लिए कराए गए आसन, प्राणायाम और ध्यान संबंधी योगाभ्यासों का नतीजा हुआ कि कमर दर्द से वर्षों से परेशान मरीजों को सात दिनों के भीतर काफी राहत मिल गई थी।
स्वामी विवेकानंद योग अनुसंधान संस्थान के योग तथा मैनेजमेंट स्टडीज विभाग ने पीठ दर्द से परेशान सूचना प्रौद्योगिकी पेशे से जुड़े 46 युवाओं पर योग के प्रभावों का अध्ययन किया। देखा गया कि योगाभ्यास न करने वाले मरीजों की तुलना में योगाभ्यास करने वाले मरीजों को दस दिनों के अभ्यास से अस्सी फीसदी तक राहत मिल गई थी। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की रिपोर्ट के मुताबिक बोस्टन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन और बोस्टन मेडिकल सेंटर की ओर से भी ऐसा ही अध्ययन कराया गया था, जिसकी अगुआई डॉ. रॉबर्ट सापर की टीम ने की थी। अध्ययन के दौरान देखा गया कि कमर दर्द पुराना हो या नया, आसन, प्राणायाम और ध्यान की कुछ विधियां बेहद कारगर होती हैं। अध्ययन के लिए कम आय समूह वाले 320 मरीजों का चयन किया गया था। शोधकर्ता जानना चाहते थे कि ऐसे मरीजों को योग से कितना लाभ मिल सकता है। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि योगाभ्यास से आश्चर्यजनक परिणाम मिलते हैं। सार यह कि प्रशिक्षित योगाचार्यों की निगरानी में योगाभ्यास करने से अस्थि रोगों से छुटकारा मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

