शांत मन से देखा गया सपना भविष्य का रोडमैप बन जाता है, और आत्मविश्वास उस दिशा में उठाया गया पहला कदम। श्रीमद्भगवद्गीता में इसी ओर संकेत किया गया है। जब ध्येय स्पष्ट हो, बुद्धि स्थिर हो और कर्म के प्रति निष्ठा हो, तब भविष्य की चिंता नहीं, वर्तमान का कर्म ही केंद्र में आ जाता है। ऐसे में “योगः कर्मसु कौशलम्” का अर्थ केवल ध्यान या आसन नहीं रह जाता। वह कर्म को विवेक, संतुलन और कुशलता के साथ करने की सीख बन जाता है।
पर, श्रीमद्भगवद्गीता की कुशलता का मर्म फल की दौड़ में नहीं, फल के प्रति समता में है। “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” का संदेश है कि कर्म हमारे हाथ में है, परिणाम नहीं। इसलिए सपना बड़ा हो, पर उसकी पकड़ मन पर इतनी न हो कि हार या जीत उसे डिगा दे। यही स्थिरता असली कौशल है। इस संदर्भ में वेदांता समूह के अध्यक्ष अनिल अग्रवाल का एक प्रसंग गौरतलब है, जिसे उन्होंने स्वयं सोशल मीडिया पर साझा किया है।
अग्रवाल 1975 में उन्नीस बरस की उम्र में पटना से मुंबई गए थे। शुरुआती दिन कालबादेवी के पास, कॉटन एक्सचेंज के इलाके में बीते, जहाँ उनके पहले कारोबारी साथी का एक छोटा-सा दफ्तर था। जीवन साधारण था, पर सपने असाधारण। वर्षों की मेहनत और जुगाड़ के बाद जब उन्होंने अपना घर लेने की सोची, तब बैंक खाते में मुश्किल से पचहत्तर हज़ार रुपये थे। लोगों ने व्यावहारिक सलाह दी कि उपनगरों में मकान देखो। वहां सस्ता मिल जाएगा। पर उनका मन तो दूसरे ही तल पर काम कर रहा था। वे वहीं रहना चाहते थे, जहाँ शहर के शीर्ष लोग रहते थे।
लिहाज़ा, उन्होंने जोखिम उठाया और नवरंगा अपार्टमेंट में महज़ 330 वर्ग फुट का एक छोटा-सा फ्लैट खरीद लिया। वह चार दीवारों का घर भर नहीं था। वह इस भरोसे का प्रतीक था कि वे सही दिशा में बढ़ रहे हैं। तभी उन्होंने अंतर्रात्मा की आवाज सुनी – “अगर मुंबई जैसे शहर में अपना ठिकाना बना सकते हो, तो दुनिया में कहीं भी अपनी जगह बना सकते हो।“
यही इस प्रसंग का मर्म है। बड़े सपनो का आधार हमेशा बड़ा संसाधन नहीं होता। कई बार उनके पीछे गिने-चुने साधन होते हैं और सावधान करने वाले कई लोग होते हैं। पर, कर्मयोगी केवल यह नहीं देखता कि आज उसके पास क्या है, बल्कि वह अपने संकल्प पर भी उतना ही भरोसा रखता है। इसीलिए किसी बड़े निर्णय के लिए साहस ज़रूरी है, पर अकेला साहस पर्याप्त नहीं होता। साहस के साथ विवेक हो, ध्येय स्पष्ट हो और परिणाम पर मानसिक पकड़ ढीली हो, तभी वह निर्णय राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियां, “मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है” के रुप में चरितार्थ होता है।
मतलब यह कि सपनों को पूरा करने के लिए हमेशा बड़ा घर या बड़ा बैंक बैलेंस ज़रूरी नहीं। ज़रूरी होता है एक अदम्य विश्वास और उस विश्वास के साथ मन की वह अवस्था, जो परिणाम की आँधी में भी मन को स्थिर रखे। श्रीमद्भगवद्गीता में इसे ही कौशल कहा गया है।

