ऋषि-परंपरा भारत के अतीत की कोई जड़ स्मृति नहीं, बल्कि ज्ञान, सत्य, आत्मानुशासन और लोकमंगल की एक निरंतर प्रवाहित होती जीवन-दृष्टि है। यह परंपरा कभी मंत्र और दर्शन के माध्यम से, कभी कृषि और चिकित्सा जैसे व्यावहारिक विज्ञानों के अनुसंधान के माध्यम से, तो कभी गुरु-शिष्य, गोत्र, संन्यास और मठ-परंपराओं के रूप में जीवंत रही है। ऋषि पंचमी इसी महान ऋषि परंपरा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर है।
भारतीय परंपरा में ऋषियों की महानता इस बात में निहित थी कि उन्होंने स्वयं को जानने, प्रकृति के गूढ़ नियमों को समझने के लिए महलों के ऐश्वर्य और क्षणभंगुर सांसारिक सुखों का परित्याग कर दिया था। ताकि तप से अर्जित सामर्थ्य आत्मसंयम और ज्ञान का उपयोग लोक मंगल के लिए किया जा सके। नतीजतन, उनकी तपस्या संसार को संतुलित रखने साधन बन गई। यही दृष्टि आधुनिक युग में हमें ऋषि पंचमी के पावन पर्व के मर्म से जोड़ती है। भाद्रपद शुक्ल पंचमी को मनाया जाने वाला ऋषि पंचमी पर्व सामान्य रूप से केवल उपवास और व्रत का दिन मान लिया जाता है, परंतु इसका आंतरिक भाव इससे कहीं अधिक उदात्त है।
तेरहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध धर्मशास्त्री हेमाद्रि के प्रामाणिक ग्रंथ ‘चतुर्वर्ग-चिंतामणि’ में ऋषि पंचमी के विधान का विस्तार से वर्णन है। उसके मुताबिक, सभी वर्गों के स्त्री और पुरुष दोनों समान रूप से ऋषि परंपरा के सम्मान में उपासना करते थे। कालांतर में सामाजिक संकीर्णताओं के चलते इसे मुख्यतः स्त्रियों के मासिक धर्म से जुड़े अशुद्धि निवारण के विचार से जोड़ दिया गया, जबकि ऐसी धारणा ऋषि पंचमी के मूल स्वरूप के अनुरुप नहीं थी। ऋषि पंचमी के मूल में तो वह विचार है, जिससे हमें सत्य को जानकर जीवन को रुपांतरित करने की प्रेरणा मिलती है। ताकि लोक मंगल हो सके।
इस परंपरा के मूल में कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भरद्वाज ऋषि के नाम आते हैं। शास्त्रों में ऋषियों को मंत्र-द्रष्टा माना गया है। जैसे, विश्वामित्र गायत्री मंत्र के द्रष्टा थे। ऋषियों की यह अंतर्दृष्टि केवल आध्यात्मिक विषयों तक सीमित नहीं थी। वे अपने समय के व्यावहारिक और भौतिक विज्ञानों के भी उतने ही बड़े अन्वेषक थे। कृषि जैसे मूलभूत लौकिक विषय पर प्राचीन काल में गंभीर वैज्ञानिक अनुसंधान हुआ था। महर्षि पराशर से जुड़ा ‘कृषि-पराशर’ ग्रंथ इसका ज्वलंत उदाहरण है। इन बातों से सिद्ध होता है कि भारतीय ऋषि-परंपरा में परा और अपरा विद्या, अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान और व्यावहारिक विज्ञान, कभी एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहे।
सप्तर्षियों के काल के उपरांत यह ज्ञान-परंपरा अनेक दिशाओं में प्रवाहित हुई। एक धारा वंश और रक्त-स्मृति से जुड़ी गोत्र एवं प्रवर व्यवस्था थी। आज भी करोड़ों परिवार अपने गोत्र के माध्यम से स्वयं को प्राचीन ऋषियों की संतति मानते हैं। दूसरी धारा विद्या और साधना की थी, जिसे हम गुरु-शिष्य परंपरा कहते हैं। एक अन्य धारा ऋषियों के गुणात्मक वर्गीकरण की थी। जैसे, ब्रह्मर्षि, राजर्षि, देवर्षि आदि। ब्रह्मर्षि ब्रह्मज्ञान की सर्वोच्च अवस्था है। राजर्षि उन्हें कहा गया, जिन्होंने राजा जनक की तरह शासन और राजधर्म का निर्वाह करते हुए आत्मज्ञान प्राप्त किया और देवर्षि नारद मुनि की तरह ज्ञान और संवाद के दिव्य संदेशवाहक बने।
ऋषियों की यह श्रेणियाँ साधना के क्रमिक विकास का प्रतिफल थीं। इसके सबसे जीवंत और प्रेरणादायी उदाहरण विश्वामित्र का हैं। वे जन्म से क्षत्रिय राजा थे, किंतु अपनी असीम तपस्या, संकल्प और आंतरिक रूपांतरण के बल पर पहले राजर्षि और अंततः सर्वोच्च ब्रह्मर्षि के पद पर प्रतिष्ठित हुए। इस कथा से स्पष्ट है कि सर्वोच्च आध्यात्मिक उपलब्धि का निर्धारण जन्म से नहीं, बल्कि कर्म हो होता था। यह परंपरा केवल पुरुषों तक सीमित नहीं थी। लोपामुद्रा, घोषा और अपाला जैसी ऋषिकाओं की वाणी ऋग्वेद के सूक्तों में सुनाई देती है। इससे स्पष्ट होता है कि ज्ञान और आध्यात्मिक अनुभूति की यह यात्रा स्त्री-स्वर से भी समृद्ध हुई थी। इस तरह, सप्तऋषियों ने जिस ज्ञान-ज्योति की अनुभूति की थी, ऋषि-परंपरा में श्रुति और स्मृति के आधार पर न केवल उसे बचाकर रखा, बल्कि वेद, उपनिषद, दर्शन, विज्ञान, शिक्षा, साहित्य, योग, साधना और लोकजीवन की असंख्य धाराओं में प्रवाहित कर दिया।
समय बीतने के साथ जब समाज में वैचारिक मतभेद, विखंडन और दार्शनिक भटकाव बढ़ने लगा, तब ऋषि-परंपरा की इस अमूल्य ज्ञान-धारा को बिखरने से बचाने के लिए एक सुदृढ़ संस्थागत व्यवस्था की आवश्यकता महसूस की गई। प्राचीन काल में ऋषि अपने-अपने आश्रमों में स्वतंत्र रहकर साधना और शोध करते थे, लेकिन बदलते समय के साथ इस ज्ञान को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए एक संगठित राष्ट्रीय ढांचे की जरूरत थी। आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने इसी आवश्यकता को पूरा करते हुए बिखरे हुए संन्यासियों को एक अनुशासित सूत्र में पिरोया। उन्होंने पूरे भारत के एकदंडी संन्यासियों को दस विशिष्ट संप्रदायों यथा गिरि, पुरी, भारती, सरस्वती, तीर्थ, आश्रम, वन, अरण्य, पर्वत और सागर में संगठित किया, जिसे दशनामी संन्यास परंपरा के रूप में ख्याति मिली। साथ ही देश के चारों कोनों में चार मठों की स्थापना कर प्रत्येक मठ को एक वेद, एक महावाक्य और विशिष्ट ऋषि-परंपरा का संरक्षक बना दिया। संन्यास की इस व्यवस्था से समाज को यह संदेश गया कि व्यक्तिगत पहचान और जाति से ऊपर उठकर ज्ञान और साधना ही जीवन का वास्तविक ध्येय है।
ऋषि-परंपरा का यह प्रवाह केवल अतीत के इतिहास, पांडुलिपियों या मठों की चहारदीवारी तक सीमित होकर नहीं रुका। मठों और आश्रमों ने प्राचीन ग्रंथों की रक्षा तो की ही, उन पर आधारित साधनाओं और जीवन-मूल्यों को हर युग के अनुकूल बनाकर जनसामान्य के दैनिक जीवन को उन्नत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही कारण है कि यह धारा आज भी केवल पूजा-अर्चना का विषय नहीं है, बल्कि आधुनिक योग केंद्रों, वैज्ञानिक शोधों और वैश्विक मंचों पर मानवीय चेतना को परिष्कृत करने वाली एक जीवंत जीवन-शैली के रूप में धड़क रही है। इसका एक अत्यंत सजीव और वैज्ञानिक स्वरूप बिहार के ऐतिहासिक मुंगेर नगर में बिहार योग विद्यालय के रुप में दिखता है। इसकी स्थापना सन् 1963 में आदि शकराचार्य की दशनामी संन्यास परंपरा में दीक्षित संन्यासी परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने की थी। उनका स्वप्न था कि नालंदा और विक्रमशिला की जिस ज्ञान-भूमि ने कभी पूरे विश्व को दिशा दी थी, उसी भूमि से प्राचीन योग-विज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक संदर्भों के साथ पुनर्जीवित किया जाए। अपने गुरु और बीसवीं सदी के महान संत स्वामी शिवानंद सरस्वती की कृपा और दिव्य शक्तियों की बदौलत उनका सपना पूरा हुआ। आज इस परंपरा को वैश्विक स्तर पर गति देने का कार्य दशनामी संन्यास परंपरा में दीक्षित संन्यासी और परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के पट्ट शिष्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती कर रहे हैं।
उनके जीवन की एक घटना प्राचीन ऋषि-दृष्टि और आधुनिक विज्ञान के मिलन का अद्भुत दस्तावेज बन चुका है। मात्र बारह वर्ष की आयु में इस बालक संन्यासी ने इंग्लैंड के प्रतिष्ठित कैंब्रिज विश्वविद्यालय में आधुनिक चिकित्सकों और वैज्ञानिकों के समक्ष ‘बायोफीडबैक’ और योग-विज्ञान पर ऐसा व्याख्यान दिया कि पूरा चिकित्सा जगत स्तब्ध रह गया था। जाहिर है कि स्वामी निरंजनानंद सरस्वती के दर्शन में ऋषि-परंपरा कोई पोथी-पत्रा या शुष्क कर्मकांड नहीं है। बल्कि, वह मानवीय मन, भावनाओं और चेतना के वैज्ञानिक अनुसंधान की एक अनवरत यात्रा है। इसलिए, जब वे वैदिक जीवनशैली की बात करते हैं, तो उनका आशय प्राचीन काल में लौट जाना नहीं होता, बल्कि, मन, हृदय और कर्म के बीच पूर्ण संतुलन स्थापित करना होता है। ताकि विचार, भावनाएँ और क्रियाएँ एक लय में रहें।
मुंगेर के इस प्रयोग से हम उस निर्णायक बिंदु पर पहुंचते है, जहाँ से ऋषि-परंपरा की भविष्योन्मुखी प्रासंगिकता स्पष्ट होती है। यूनेस्को द्वारा योग और वैदिक पाठ की अमूर्त वाचिक परंपरा को ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ घोषित किया जाना इस बात का प्रमाण है कि भारत के ऋषियों द्वारा खोजा गया सत्य किसी एक संप्रदाय का न होकर समूची मानवता की साझी धरोहर है। आज जब हम देश को विश्वगुरु बनने की आकांक्षा रखते हैं, तब यह जरूरी हो गया है कि हम ऋषि-परंपरा की वास्तविक शक्ति को पहचानें। उसकी मूल वैज्ञानिक, समन्वयी और लोककल्याणकारी दृष्टि को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के साथ जोड़कर मानवता के लिए उपयोगी बनाएं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

