एक रोगी ऑपरेशन थिएटर में जाने से पहले आंखें बंद करता है। कुछ क्षण शांत बैठता है, धीमी श्वास लेता है और फिर गहरे, सहज स्वर में ‘ॐ’ का उच्चारण करता है। स्पेन के बार्सिलोना स्थित मुख्य अस्पताल का ऐसा दृश्य अब किसी को चौंकाता नहीं। रोमन कैथोलिक बहुल देश में शल्य-चिकित्सा से पहले श्वास-प्रश्वास के साथ मंत्रोच्चार की बात असामान्य लग सकती है। लेकिन उस अस्पताल को मरीजों का तनाव कम करने का मानो अचूक नुस्खा मिल चुका है। श्वास-प्रश्वास के साथ मंत्र साधना तन-मन को किस तरह प्रभावित करते हैं, इसके बारे में भारत के योगी सदियों से बताते आ रहे हैं। वे अपने अनुभवों के आधार पर कहते आए हैं कि मंत्रों की ध्वनि शरीर और मस्तिष्क को प्रभावित करती है। अब विज्ञान को भी इस बात की झलक मिलने लगी है।
मंत्र और प्राणायाम का प्रश्न कोरोना महामारी के दौर में अधिक प्रासंगिक हो गया था। वह दौर तो गुजर गया। पर, नाना कारणों से लोगों की मानसिक स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। इसलिए तो बिहार योग विद्यालय के परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती लोगों को सलाह देते हैं कि नींद खुलते ही तीन-तीन बार महामृत्युंजय मंत्र, गायत्री मंत्र और दुर्गा जी के बत्तीस नामों के जप किए जाने चाहिए। इसलिए कि इससे चित्त शांत होता है, चेतना निर्मल होती है और मन की एकाग्रता का मार्ग प्रशस्त होता है। मंत्रों के मामले में भारतीय परंपरा में अन्य योगियों का भी ऐसा ही अनुभव रहा है। वैज्ञानिक भी मंत्रों के प्रभाव से शरीर और मस्तिष्क में होने वाले परिवर्तनों को समझने की चेष्टा करते रहते हैं।
योगशास्त्र के मुताबिक, जब मंत्र को सहज और नियमित श्वास के साथ लयबद्ध ढंग से दोहराया जाता है, तो ध्यान बाहरी विक्षेपों से हटकर एक बिंदु पर टिकने लगता है और श्वास भी अधिक व्यवस्थित हो जाता है। पर, इस सामान्य विधि को हम सब आत्मसात क्यों नहीं कर पाते हैं कि समस्याएं बनी रहती हैं? इस संदर्भ में स्वामी रामतीर्थ से जुड़ा एक सुंदर प्रसंग उल्लेखनीय है। जापान-प्रवास के दौरान वे राजमहल में ठहरे थे। वहां उनकी नजर एक गमले में लगे चिनार के छोटे-से पेड़ पर पड़ी। चिनार सामान्यतः पचास-साठ फीट तक ऊंचा हो सकता है, लेकिन वह पेड़ मुश्किल से एक फुट का था। पूछने पर पता चला कि वह लगभग दो सौ वर्ष पुराना है। उसकी कुछ जड़ें काट दी गई थीं, इसलिए वह बड़ा नहीं पाया। स्वामी रामतीर्थ के मुख से स्वर फूट पड़ा, “विचार, आचरण और व्यक्तित्व के रूप में मनुष्य की भी जड़ें होती हैं। जब ये कट जाती हैं, तो मनुष्य जीवित तो रहता है, लेकिन उसका विकास रुक जाता है।”
रामतीर्थ का यह दृष्टांत मंत्र की अवधारणा को समझने के लिए भी एक सुंदर रूपक है। जैसे पेड़ का विकास उसकी जड़ों की स्थिति से जुड़ा है, वैसे ही मनुष्य का बाहरी जीवन उसकी भीतर की अवस्था से अलग नहीं है। विचार, भावनाएं, श्वास और तंत्रिका-तंत्र लगातार एक-दूसरे से संवाद करते हैं। जब भीतर की लय तनाव और बेचैनी से प्रभावित होती है तो उसका असर शरीर पर भी पड़ता है। इसके विपरीत, सहज श्वास के साथ मंत्रोच्चार से शरीर और मन संतुलित होता है। भारतीय नाद-दृष्टि में ध्वनि वही नहीं है, जिसे हम सुनते हैं, बल्कि अनुभव और स्पंदन भी ध्वनि है। वैदिक परंपरा में नाद को अस्तित्व की मूल अभिव्यक्ति माना गया और ‘ॐ’ को उस मूल चेतना का बीजस्वर। तभी कहा गया है, “मननात् त्रायते इति मन्त्रः।” अर्थात जो मनन करने वाले की रक्षा करे, उसे मुक्त करे, वह मंत्र है। पिछले कुछ दशकों में विज्ञान ने इसी बात को अपनी भाषा में समझने की कोशिश की है।
‘ॐ’ का उच्चारण करते समय मानव मस्तिष्क में क्या बदलाव होता है? इस सवाल को लेकर बेंगलुरु स्थित राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान (निमहांस) में अध्ययन किया गया। बारह प्रतिभागियों को एमआरआई के दौरान ‘ॐ’ का उच्चारण कराया गया। नतीजतन, मस्तिष्क के कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में गतिविधि कम पाई गई। ये वे क्षेत्र थे, जिनका संबंध भावनात्मक और तनाव-संबंधी प्रतिक्रियाओं से है। इनमें अमिगडला भी शामिल था, जो भय और संभावित खतरे से जुड़ी प्रतिक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इससे संकेत मिला कि ‘ॐ’ जैसी लयबद्ध ध्वनि और उससे जुड़ी ध्यान-सदृश अवस्था का मस्तिष्कीय गतिविधि से संबंध है।
मंत्र और धीमी श्वास के संबंध को समझने में इटली के चिकित्सक लुसियानो बर्नार्डी और उनके सहयोगियों का अध्ययन भी महत्वपूर्ण है, जो 2001 में ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुआ था। तेइस स्वस्थ लोगों पर किए गए प्रयोग में यौगिक मंत्रोच्चार के प्रभावों का अध्ययन किया गया। देखा गया कि श्वास की गति घटकर लगभग छह श्वास प्रति मिनट रह गई थी। इसी धीमी लय पर हृदय और श्वसन की आंतरिक तरंगों के बीच बेहतर तालमेल दिखाई दिया और रक्तचाप को नियंत्रित करने वाली प्रणाली की संवेदनशीलता में सुधार दर्ज किया गया।
महर्षि पतंजलि के योगसूत्र का एक महत्वपूर्ण सूत्र है, “हेयं दुःखमनागतम्।” अर्थात जो दुःख अभी आया नहीं है, उसके कारणों को पहचानकर उससे बचने का प्रयास किया जा सकता है। यानी, मनुष्य ऐसी जीवन-पद्धति विकसित कर सकता है, जो असंतुलन के कारणों को पहचानने और उनसे बचने में सहायता करे। यहीं स्वामी रामतीर्थ का छोटा-सा चिनार वाला प्रसंग फिर अर्थपूर्ण हो जाता है। पेड़ जीवित था, लेकिन उसकी जड़ों को क्षति पहुंचने के कारण उसका विकास रुक गया था। मनुष्य भी बाहर से सामान्य दिखाई देते हुए भीतर से तनाव और असंतुलन में जी रहा है। इसलिए कि जीवन योगमय नहीं है।
इसलिए मंत्र की सार्थकता इस बात में निहित है कि उसे अपनी लय को संतुलित करने वाली साधना बना लिया जाए। विज्ञान अभी मंत्र का आध्यात्मिक अर्थ पूरी तरह समझने की स्थिति में नहीं है, लेकिन वह इस निष्कर्ष पर पहुंच चुका है कि ध्वनि, श्वास, लय, ध्यान और तंत्रिका-तंत्र के बीच एक जैविक संवाद मौजूद है। शायद आने वाले वर्षों में विज्ञान इस संवाद की और परतें खोलेगा। तब संभव है कि आधुनिक विज्ञान यह समझ सके कि हजारों वर्षों से योगी जिसे ‘चित्त वृत्तियों का निरोध’ कहते आए हैं, उस अवस्था में शरीर और मस्तिष्क में कौन-सी प्रक्रियाएँ होती हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

