कोई नया काम शुरू करना हो या यात्रा पर निकलना हो, मुख से अनायास निकल पड़ता है -“श्री गणेशाय नमः।” क्या यह केवल धार्मिक परंपरा है, या इसके पीछे जीवन और चेतना का कोई गहरा रहस्य भी छिपा है? गणेश चतुर्थी इसी गूढ़ार्थ को समझने का अवसर है।
यह मंत्र ऐसा है, जिसे हम सोचकर नहीं, सहज भाव से बोलते हैं। कोई नया काम शुरू करना हो, किसी यात्रा पर निकलना हो, विवाह का शुभ मुहूर्त हो या साधना आरंभ करनी हो, मुख से अनायास निकल पड़ता है, “श्री गणेशाय नमः।” शास्त्रों के मुताबिक, गणेश प्रथम पूज्य हैं, इसलिए हर शुभ कार्य से पहले उनकी पूजा होती है। लेकिन योग और तंत्र की दृष्टि से गणेश-वंदना का फलक इससे कहीं व्यापक है। वहाँ श्री गणेश केवल भौतिक जगत के विघ्नों को दूर करने वाले देवता नहीं रह जाते, बल्कि वे हमारे भीतर उस आधार के प्रतीक बन जाते हैं, जिस पर किसी भी कर्म की सफलता टिकी होती है।
ऋषियों, संतों और योगियों की अनुभूतियों और शास्त्रीय विवेचनाओं से यह स्पष्ट है कि केवल साधनों और अनुकूल संयोगों से सफलता नहीं मिलती। उसका असली आधार हमारी मनोदशा है। जब हममें विवेक, बुद्धि और सर्वकल्याण का भाव प्रबल होता है, तब सीमित संसाधनों के बावजूद असाधारण परिणाम मिल जाते हैं। इसके विपरीत, मन संशय, भय और अहंकार से घिरा हो, तो अनुकूल अवसर भी निष्फल हो जाता है। महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में मन की इस निर्मल व स्थिर अवस्था को ‘चित्तप्रसादन’ कहा है। इसका सीधा अर्थ है कि किसी भी कर्म से पहले अपने मन को शांत और अविचल बना लेना चाहिए। यह संभव है। इसलिए कि बाहरी परिस्थितियाँ अक्सर हमारे वश में नहीं होतीं। पर, आंतरिक संतुलन होना, न होना हमारा चुनाव है। यही संतुलन वह अदृश्य नींव है, जिस पर हर सार्थक उपलब्धि की इमारत खड़ी होती है।
श्रीमद्भगवद्गीता में इसे कर्मयोग का मूल मंत्र बताया गया है। श्रीकृष्ण कहते हैं – योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥ यानी, आसक्ति छोड़कर, पहले योग में स्थित हो जाओ, फिर कर्म करो। सफलता-असफलता में समान भाव रखना ही योग है। जब मन इस द्वंद्व से ऊपर उठकर समत्व पा लेता है, तब कर्म बोझ नहीं रह जाता। कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन.. के जरिए भी प्रकारांतर से यही शिक्षा दी गई है कि अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं। परिणाम की व्यर्थ चिंता में अपने प्रयास को शिथिल मत करो। इस दृष्टि से देखें तो श्री गणेश जी की वंदना स्वयं को समत्व और चित्तप्रसादन की अवस्था तक पहुँचाने वाली, मन को साधने की एक सार्थक प्रार्थना बन जाती है।
अक्सर हम मान लेते हैं कि जीवन की बाधाएँ केवल बाहरी कारणों का प्रतिफल हैं। पर यौगिक दृष्टि से देखें तो अस्थिरता, व्याकुलता, दिशाहीन इच्छा और अधीरता के रूप में कई बाधाएँ हमारे भीतर ही मौजूद रहती हैं। योग-विज्ञान के अनुसार मनुष्य के शरीर और चेतना की नींव सबसे निचले ऊर्जा-केंद्र में मानी गई है, जिसे मूलाधार चक्र कहते हैं। यह पृथ्वी तत्व का केंद्र है और स्थिरता, धैर्य और सुदृढ़ आधार का प्रतीक। गणपति अथर्वशीर्ष का मंत्र है – त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम्। अर्थात्, श्री गणेश सदा मूलाधार में, जीवन की जड़ में, आधार में स्थित हैं। गुरुजन इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि जैसे किसी भव्य भवन की मजबूती उसकी अदृश्य नींव पर टिकी होती है, वैसे ही हमारे बाहरी कर्मों की स्थिरता भीतर के इस मूलाधार पर निर्भर करती है। इसलिए किसी भी काम के आरंभ में श्री गणेश जी को याद करना दरअसल इसी अदृश्य नींव को सँभालने का उपक्रम है।
श्री गणेश जी का स्वरूप मनुष्य की आंतरिक क्षमताओं का अद्भुत रूपक है। विशाल गजमुख से दूरदर्शिता की प्रेरणा मिलती है। बड़े कान इस बात का संकेत है कि बोलने से पहले ध्यान से सुनना और समझना चाहिए, जबकि सूक्ष्म आँखों से बारीकी से देखने और लक्ष्य पर एकाग्र रहने का संदेश मिलता है। लचीली सूँड से जीवन में संतुलन शिक्षा मिलती है। इसलिए कि वही सूँड एक ओर तिनके जैसी छोटी वस्तु उठा लेती है, तो दूसरी ओर भारी शहतीर को भी सहजता से उठाती है। एकदंत इस बात का प्रतीक है कि हममें सार और असार में भेद करने का विवेक हो, ताकि जो व्यर्थ है उसे छोड़ सकें। लंबोदर यह याद दिलाता है कि जीवन में सुख-दुख साथ चलते हैं, और समझदारी दोनों को सहजता से पचा लेने में है। हाथों का पाश भटकती वृत्तियों को बाँधने वाला संयम है, तो अंकुश उन्हें सही दिशा देने वाला अनुशासन।
रिद्धि और सिद्धि के साथ से भी इसी संतुलन का संकेत मिलता है। विवेक के बिना मिली समृद्धि और सिद्धि अहंकार को जन्म देती है, और सत्कर्म के बिना उनका कोई सार नहीं रहता। विवेक के बिना मिली सिद्धि अहंकार को जन्म देती है, और कर्म के बिना केवल बुद्धि का कोई सार नहीं रहता। आज जीवन भौतिक दृष्टि से जितना सुगम है, मन के स्तर पर उतना ही अशांत। ऐसे में विघ्नरहित परिस्थितियों से अधिक जरूरत उस मनोदशा की है, जो प्रतिकूल क्षणों में भी डगमगाए नहीं। गणेश चतुर्थी हमें इसी मनोदशा की ओर कदम बढ़ाने का स्मरण कराती है। इसलिए जब भी हम ‘श्री गणेशाय नमः’ उच्चारित करें, कोशिश हो कि यह केवल बाहरी कर्मकांड बनकर न रह जाए, बल्कि भीतर टिकने, मन को साधने और विवेक जगाने का एक क्षण बने। तभी इस मंत्र की सार्थकता है।
जिस मिट्टी की मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा करके पूजन करते हैं, उसे कुछ दिनों बाद ही जल में विसर्जित कर देते हैं। अर्थ स्पष्ट है कि हर आरंभ का एक अंत है, और हर अंत के बाद किसी नए आरंभ का सूत्रपात होता है। जो हमारे जड़ में, आधार में स्थित है, वही हर शुरुआत का अधिपति है। उसे बाहर पूजने के साथ ही उसके गुणों को भीतर जागृत करना इस पर्व का गहरा संदेश है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

