पंडवानी की विश्वविख्यात गायिका, पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई सदा के लिए मौन हो गईं। वह स्मृति परंपरा की जीती-जागती मिसाल थीं। सन् 1987 में पद्मश्री, सन् 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, सन् 2003 में पद्म भूषण और सन् 2019 में पद्म विभूषण सम्मान मिलना इस बात का द्योतक है कि वह जिस परंपरा की संवाहक थीं, उसे कितना ऊंचा स्थान प्राप्त था। वह भारत की उस ज्ञान-परंपरा की सशक्त प्रतिनिधि थी, जिसे मनुष्य की स्मृति, वाणी और अनुभव को ज्ञान का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता रहा है। वे जीवन पर्यंत पंडवानी के माध्यम से महाभारत की कथाएँ सुदूर गांवों के आम लोगों तक निरंतर पहुंचाती रहीं। उनका यह योगदान पौराणिक ज्ञान के लोकतंत्रीकरण की अनूठी मिसाल थी, जो अपने देश की स्मृति परंपरा की सबसे बड़ी शक्ति रही है।
तीजन बाई हाथ में तंबूरा लिए जब मंच पर आती थीं, तो वह तंबूरा सिर्फ एक वाद्य यंत्र नहीं रह जाता था। देखते ही देखते वह कभी दुःशासन की शक्तिशाली बांह बन जाता, कभी अर्जुन का दौड़ता हुआ रथ, कभी भीम की भारी-भरकम गदा, तो कभी द्रौपदी के बिखरे हुए बाल। उनकी आवाज़ और अभिनय का जादू ऐसा था कि सामने बैठे लोग सदियों पुरानी पौराणिक कथा के प्रत्यक्षदर्शी की तरह जोश, गुस्सा, दर्द और उत्साह को अपने भीतर महसूस करने लगते थे। खास बात यह है कि वह सिर्फ पाँचवीं कक्षा तक पढ़ी थीं। पर ताउम्र महाभारत की उस विशाल गाथा को पूरी शिद्दत और अधिकार के साथ जीती रहीं। यह हमारी उसी पुरानी श्रुति-स्मृति परंपरा की देन थी।
भारतीय वाङ्मय में कहा गया है कि श्रुति और स्मृति ज्ञानी की दो आंखें हैं। एक के बिना वह काना है, दोनों के बिना अंधा। तभी, हमारी परंपरा में ज्ञान कभी किताबों तक सीमित नहीं रहा। वरना आक्रांताओं द्वारा नालंदा विश्व विद्यालय के पुस्तकालय को जलाए जाने के साथ ही भारतीय ज्ञान-परंपरा का हमेशा के लिए अंत हो गया होता। इस चमत्कार का कारण हमारी अद्भुत मौखिक परंपरा थी। इसके लिए अक्षर-ज्ञान नहीं, बल्कि खुला मन और संवेदनशील कान ही पर्याप्त होता है। संत कबीरदास इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। उन्होंने तो खुद ही घोषणा की थी – “मसि कागद छूवों नहीं, कलम गहो नहिं हाथ… ।“ उन्हें न अक्षर ज्ञान था और न किसी पाठशाला का मुंह देखा था। लेकिन उनकी साखियां आज भी लोकमानस का कंठहार बनी हुई हैं। तीजन बाई इसी परंपरा की विलक्षण उदाहरण थीं। छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गांव में जन्मी इस लोक कलाकार ने अपने नाना से महाभारत की कथाएं सुनते-सुनते उन्हें स्मृति में ऐसे उतारा कि पूरा महाभारत उनके भीतर जीवंत हो उठा था।
तीजन बाई की संवाद अदायगी में सामाजिक सरोकारों के गहरे संदेश छिपे होते थे। वे गंभीर से गंभीर बात को भी बड़ी सहजता और चुटीले हास्य के साथ कह देती थीं। महाभारत के किरदारों, खासकर भीम, द्रौपदी और पांडवों के प्रसंगों को जीते हुए दर्शकों को शारीरिक शक्ति और संस्कृति के महत्व के बारे में समझातीं थीं। वे डिब्बाबंद दूध के बजाय मातृशक्ति और पारंपरिक पोषण पर बल देते हुए कहती थीं कि जिस बच्चे ने अपनी मां का दूध पिया है, वही भीम जैसा वीर और बलवान बनता है। वे इस प्रसंग के माध्यम से माताओं से अपील करती थीं कि वे अपने बच्चों को बोतल का दूध न पिलाएं, बल्कि अपना दूध पिलाकर उन्हें भीम की तरह पराक्रमी पहलवान और वीर बनाएं।
पंडवानी मूलतः अविभाजित मध्यप्रदेश की लोकगायन परंपरा है। इसके तहत एकल कलाकार महाभारत के प्रसंगों को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत करते हैं। इस परंपरा में दो प्रमुख शैलियाँ विकसित हुईं। एक है वेदमती और दूसरी कापालिक। वेदमती शैली में कलाकार प्रायः बैठकर शांत भाव से कथा का गायन करते हैं। दूसरी तरफ कापालिक शैली में खड़ा होकर अभिनय करते हुए संवाद या गायन प्रस्तुत करना होता है। तीजन बाई संभवत: पहली महिला कालाकार थीं, जिन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाली कापालिक शैली को अपनाया था। पर, प्रस्तुतियां इतनी प्रभावी बन पड़ती थीं कि दर्शक हैरान रह जाते थे। तीजन बाई विस्तृत मंच-सज्जा, आधुनिक तकनीक और किसी बड़े नाट्य-दल के बिना ही केवल अपनी आवाज़, अभिनय और तंबूरे के सहारे हजारों दर्शकों को लंबे समय तक मंत्रमुग्ध किए रहती थीं। वे कहती थीं कि जब प्रस्तुति देने मंच पर जाती हैं तो ऐसा लगता है कि उनके भीतर कोई दैवी शक्ति प्रविष्ट कर गई है।
बाल पुस्तकों की प्रसिद्ध लेखिका और चित्रकार लावण्या कार्तिक की एक पुस्तक है – ‘तीजन बाई: द गर्ल हू लव्ड टू सिंग।’ उन्होंने अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में दूरदर्शन पर तीजन बाई को पहली बार गाते हुए देखा था। उनकी बुलंद आवाज, चेहरे के जीवंत भाव और अद्भुत अभिनय क्षमता ने उन्हें गहरे तक प्रभावित किया और पुस्तक लिखने की प्रेरणा मिली। वे कहती हैं – “तीजन बाई मंच पर केवल कहानी नहीं सुनाती थीं, बल्कि वे खुद उन पात्रों में बदल जाती थीं। एक क्षण में भीम तो दूसरे ही क्षण में द्रौपदी। तीजन बाई का जीवन केवल एक कलाकार की यात्रा नहीं है, बल्कि यह विपरीत और कठिन परिस्थितियों के बीच अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प की एक मिसाल है।“
इतिहास गवाह है कि कई कलाएं महान कलाकारों के साथ ही क्षीण हो गईं। इस मामले में तीजन बाई अपवाद थीं। उन्होंने अपने जीवनकाल में उसके भविष्य की मजबूत नींव रख दी। अपने पुत्र सहित सैकड़ो शिष्यों को पंडवानी की कापालिक शैली की शिक्षा दी। इस वजह से यह लोकपरंपरा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सुरक्षित पहुंच पाई है। तीजन बाई का जीवन हमें याद दिलाता है कि सच्चा ज्ञान वह नहीं है जो पुस्तकों या डिजिटल माध्यमों में सुरक्षित हो, बल्कि वह है जो हमारी स्मृति, हमारी संवेदना और हमारे जीवन का हिस्सा बन जाए। यही संदेश उनकी सबसे बड़ी विरासत है, जो हमारे लिए छोड़ गई हैं। आज हमने न केवल एक महान कलाकार को खोया है, बल्कि भारत की जीवित स्मृति परंपरा के एक अनमोल प्रहरी को खो दिया है। महान विभूति को भावभीनी श्रद्धांजलि।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

