गर्मियों के मौसम में फिटनेस जगत में एक नया चलन तेजी से लोकप्रिय हो रहा है और वह है – वाटर योगा या जल-योग। इसमें स्विमिंग पूल में कमर तक पानी में खड़े होकर योगासन किए जाते हैं। पानी शरीर का भार कम महसूस कराता है, जिससे जोड़ों और मांसपेशियों पर दबाव घटता है। यही कारण है कि इसे विशेष रूप से बुज़ुर्गों, गर्भवती महिलाओं, अधिक वज़न वाले लोगों और जोड़ों के दर्द से पीड़ित व्यक्तियों के लिए उपयुक्त माना जा रहा है।
उत्तर प्रदेश में प्रयाग आरोग्यम् केंद्र के प्रमोटर व योगाचार्य प्रशांत शुक्ल की व्यक्तिगत पहल के कारण गर्मियों में यह योग काफी लोकप्रिय हो रहा है। इस योग का कोई शास्त्रीय आधार हो तो इसके बारे में मुझे नहीं पता। वैसे, भारतीय परंपरा में जल का धार्मिक और आरोग्यकारी महत्व सदा से रहा है। पिछले कुछ दशकों में विकसित हुआ वाटर योगा का प्रयोग है विशेष रूप से चिकित्सकीय और पुनर्वास संबंधी आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर अपनाया गया। इस तरह इसे योगासन का एक संशोधित या सहायक रूप कहा जा सकता है, जो शारीरिक अभ्यास को अधिक सुलभ बनाता है।
विज्ञान की दृष्टि से जल योग पर शोध उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन जल-व्यायाम और जल-चिकित्सा पर पर्याप्त अध्ययन हुए हैं। विभिन्न नियंत्रित परीक्षणों और समीक्षाओं से संकेत मिलता है कि पानी में किया गया व्यायाम कमर-दर्द, गठिया और अन्य मस्कुलोस्केलेटल समस्याओं में दर्द कम करने, संतुलन सुधारने और गतिशीलता बढ़ाने में सहायक हो सकता है। कुछ अध्ययनों में नींद और जीवन-गुणवत्ता में भी सुधार देखा गया है। हालांकि अधिकांश शोधों के नमूने छोटे रहे हैं, इसलिए परिणामों को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। कुल मिलाकर जल-योग गर्मियों में एक सुरक्षित, कम-आघात वाला और उपयोगी विकल्प है। विशेषकर उन लोगों के लिए जिनके लिए सामान्य योगाभ्यास कठिन है।
अब जरा इस प्रयोगधर्मी योगाचार्य को भी जान लीजिए तो पता चलेगा कि किस तरह संघर्ष और कठिनाइयाँ जीवन की दिशा बदल देती हैं। एक समय था जब योगाचार्य प्रशांत शुक्ल इलेक्ट्रिकल इंजीनियर के रूप में अपना करियर बना रहे थे, लेकिन तभी सेहत से जुड़ी गंभीर समस्याओं ने उनके सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी। इस मुश्किल दौर ने उन्हें अपनी जीवनशैली के बारे में नए सिरे से सोचने पर मजबूर किया। इसी मोड़ पर उनका परिचय योग से हुआ, जिससे न केवल उनकी सेहत सुधारी, बल्कि जीवन का नजरिया भी हमेशा के लिए बदल गया।
प्रशांत शुक्ल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे योग को आधुनिक समय के अनुसार बेहद सरल और व्यावहारिक बना देते हैं। वे योग में नए-नए प्रयोग करने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने महिलाओं को योग से सहजता से जोड़ने के लिए ‘साड़ी योग’ की शुरुआत की और गर्मियों में शरीर को शीतलता देने के लिए ‘जल-योग’ जैसे अनूठे अभियानों को लोकप्रिय बनाया। इन सब प्रयोगों का मकसद योग को तमाशा बनाना नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग के लिए इसे आसान और सुलभ बनाना है।
इन तमाम आधुनिक प्रयोगों के बाद भी प्रशांत शुक्ल योग के मूल सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं करते। वे आज भी परंपरागत योग पद्धतियों का पूरा सम्मान करते हैं। उनके सिखाने के तौर-तरीकों का मुख्य आधार आज भी ‘सूर्य नमस्कार’ जैसी प्राचीन और शास्त्रीय क्रियाएँ ही हैं, जो शरीर, मन और हमारी आंतरिक ऊर्जा को संतुलित रखने का सबसे उत्तम माध्यम हैं।
योग से मिले चमत्कारी लाभ के बाद उन्होंने इस ज्ञान को सिर्फ अपने तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने योग को गहराई से समझने के लिए इसमें पोस्ट ग्रेजुएशन किया और अपना पूरा जीवन योग को ही समर्पित कर दिया। इस तरह वे इंजीनियर से देश और समाज की सेवा करने वाले एक योगाचार्य के रूप में बदल गया।
लखनऊ की छोटी सी शुरुआत आज एक बड़े अभियान का रूप ले चुकी है। प्रशांत शुक्ल के नेतृत्व में काम कर रहे प्रयाग आरोग्यम् केंद्र ने पिछले दस सालों में बहुत तेजी से प्रगति की है। उत्तर प्रदेश से शुरू हुआ यह संस्थान आज देश के कई राज्यों में अपनी पहचान बना चुका है। इंटरनेट और ऑनलाइन क्लासेस की मदद से अब इसकी गूंज विदेशों तक पहुँच चुकी है, जहाँ हजारों लोग उनके मार्गदर्शन में योग को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना रहे हैं।
प्रशांत शुक्ल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे योग को आधुनिक समय के अनुसार बेहद सरल और व्यावहारिक बना देते हैं। वे योग में नए-नए प्रयोग करने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने महिलाओं को योग से सहजता से जोड़ने के लिए ‘साड़ी योग’ की शुरुआत की और गर्मियों में शरीर को शीतलता देने के लिए ‘जल-योग’ जैसे अनूठे अभियानों को लोकप्रिय बनाया। इन सब प्रयोगों का मकसद योग को दिखावा बनाना नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग के लिए इसे आसान और सुलभ बनाना है।
इन तमाम आधुनिक प्रयोगों के बाद भी प्रशांत शुक्ल योग के मूल सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं करते। वे आज भी परंपरागत योग पद्धतियों का पूरा सम्मान करते हैं। उनके सिखाने के तौर-तरीकों का मुख्य आधार आज भी ‘सूर्य नमस्कार’ जैसी प्राचीन और शास्त्रीय क्रियाएँ ही हैं, जो शरीर, मन और हमारी आंतरिक ऊर्जा को संतुलित रखने का सबसे उत्तम माध्यम हैं।
प्रशांत शुक्ल की यात्रा केवल व्यक्तिगत सफलता का आख्यान नहीं, बल्कि भारतीय योग परंपरा के उस शाश्वत सिद्धांत की जीवंत अभिव्यक्ति है, जिसमें व्यक्ति का आत्मकल्याण अंततः लोककल्याण का माध्यम बन जाता है। अपने स्वयं के कष्टों और स्वास्थ्य-संघर्षों को उन्होंने बाधा नहीं, बल्कि आत्मबोध का अवसर बनाया। योग के माध्यम से प्राप्त अनुभव को उन्होंने शास्त्रीय अध्ययन की दृढ़ भूमि पर स्थापित किया और फिर उसे समाज के हित में समर्पित कर दिया।

