महर्षि वेदव्यास ने वेदों का वर्गीकरण करके उसे लिपिबद्ध करा दिया था, अठारह पुराणों की रचना पूरी की जा चुकी थी। स्वीकृति और यश की कोई कमी न थी। फिर भी सरस्वती नदी के पावन तट पर बैठे व्यास के मन में एक अजीब बेचैनी थी। तभी वहां देवर्षि नारद का पदार्पण होता है। वे उन्हें उस कमी का अहसास कराते हैं, जो उनकी निराशा का कारण बनी थी। वे संकेत करते हैं कि रचनाओं में भगवत्-तत्त्व और भगवान के निर्मल यश का वैसा गान नहीं हुआ, जैसा होना चाहिए था और जो दर्शन हृदय को तृप्त न करे, वह अधूरा है।
महाज्ञानी वेदव्यास में भी पूर्णता का अभाव! बात चौंकाने वाली थी। वे महाज्ञानी और आत्मज्ञानी समृद्ध ऋषि परंपरा से ताल्लुकात रखते थे। वसिष्ठ मुनि के प्रपौत्र, शक्ति मुनि के पौत्र, महर्षि पराशर के पुत्र थे। उनके पुत्र शुकदेव भी उच्चकोटि के ऋषि थे। उनका जन्म कोई संयोग नहीं, बल्कि दुर्लभ खगोलीय मुहूर्त का परिणाम था। इस संबंध में एक रोचक कथा है। महर्षि पराशर निषादराज की पुत्री मत्स्यगंधा उर्फ सत्यवती की नौका से नदी पार जा रहे थे। नदी के बीचो-बीच पहुंचतो ही उन्हें बोध हुआ कि यह दुर्लभ मुहूर्त है। इस समय गर्भाधान हो तो विद्वान और महान पुण्यात्मा का जन्म होगा। लिहाजा सत्यवती के समक्ष शारीरिक संबंध बनाने का प्रस्ताव रखा। लंबे तर्क-वितर्क के बाद सत्यवती तैयार हो गई। इसी संयोग से कृष्ण द्वैपायन उर्फ वेदव्यास का जन्म हुआ।

पर, बुद्धि होने भर से कोई भ्रम से मुक्त नहीं हो जाता। बड़े-बड़े बुद्धिमान भी अहं (मैं कर्ता हूँ) और ममत्व (मेरा) के बंधन में बंधे रहते हैं। आदि शंकराचार्य की अमर कृति ‘विवेकचूड़ामणि’ में इसी शाश्वत सत्य का बोध कराते हुए कहा गया है कि बुद्धि मात्र परम यात्रा का एक साधन है, मंज़िल नहीं। विवेक के सांचे में ढलकर मुक्ति की तीव्र पिपासा बन जाए, उसी में इसकी सार्थकता है। तभी तो श्रीराम और श्रीकृष्ण भी गुरु के पास गए थे। प्रज्ञावान ऋषि वेदव्यास ने हिमालय में साधना की। यह कोई पारलौकिक कथा नहीं। इसके साक्ष्य हैं। हिमालय में वेदव्यास गुफा है। श्रुति के मुताबिक, पास ही गणेश गुफा भी है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक, वेदव्यास ने अपनी साधना स्थली पर ही गणेश जी के सहयोग से वेद को लिपिबद्ध कराया था और पुराणों की रचना की थी। पूर्व आईपीएस अधिकारी और कई आध्यात्मिक पुस्तकों के रचयिता उदय सहाय ने अपनी यात्रा-वृतांत में उस गुफा का विस्तार से वर्णन किया है। उनके मुताबिक, “मैंने ओम् पर्वत से लौटने के मार्ग में अवस्थित आईटीबीपी कैंप से दूरबीन के जरिए उस गुफा के दर्शन किए। उसकी ऊंचाई अत्यधिक है, जहां पहुँचना लगभग असंभव है। मेरी इस धारणा की पुष्टि आईटीबीपी के जवानों ने की। उन्होंने बताया कि वे उस गुफा तक पहुँचने के कई प्रयास किए, पर असफल रहे।“
खैर, अब लौटते हैं देवर्षि नारद वाले प्रसंग की ओर। महाज्ञानी ऋषि वेदव्यास देवर्षि नारद के सुझाव की अनदेखी नहीं की। वे तो फलदार वृक्ष की तरह झुके हुए और विनयशील थे। लिहाजा, उन्होंने देवर्षि की बातों को अपने अंत:करण में उतरने दिया और अपने ज्ञान को पूर्णता प्रदान किया। वैसे तो गुरु पूर्णिमा का पर्व वेदव्यास के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। पर, वेदव्यास के जीवन से साबित होता है कि गुरु पूर्णिमा का महत्व शिष्य के लिए ज्यादा है। बीसवीं सदी के महानतम संत परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती कहते थे, “गुरु की तो पूर्णिमा हो गई होती है, तभी वे गुरू होते हैं। पूर्णिमा तो शिष्य की होनी है। गुरू इस मौके पर हमारी आसक्ति की जंजीर को तोड़कर संसार के बंधन से मुक्त कराने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इसलिए यह दिन शिष्यों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है।“
इस लिहाज से गुरु पूर्णिमा गुरु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर तो है ही, शिष्यत्व की पात्रता हासिल करने के लिए संकल्प लेने और उसके अनुरुप आगे बढ़ जाने का भी दिन है। लेकिन व्यवहार रुप में होता क्या है? व्यास-पीठ सजती है। गुरु का पूजन होता है। ज्ञान और कृपा के लिए प्रार्थना की जाती है। लेकिन ऐसी प्रार्थना फलीभूत शायद ही हो पाती है। क्योंकि हमारी पात्रता नहीं होती। पूज्य गुरुदेव और बिहार योग विद्यालय के संस्थापक परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती कहते हैं – “समाज में चार प्रकार के मनुष्य हैं। पहला है आर्त। जीवन में कष्ट भोगने वाले ऐसे लोग अपनी दशा सुधारने के लिए निरंतर संघर्ष करते रहते हैं। अर्थार्थी स्वभाव के लोग आत्म-केंद्रित होते हैं। उनके लिए अपनी इच्छाओं और भौतिक चाहतों की पूर्ति ही सर्वोपरि होती है। तीसरी श्रेणी में जिज्ञासु आते हैं। वे सत्य की खोज में निरंतर लगे रहते हैं। चौथी और अंतिम श्रेणी मुमुक्षु वर्ग की है। उसका मन, ध्यान और रुझान पूरी तरह से परम मुक्ति और अध्यात्म की ओर केंद्रित रहता है।“
जिज्ञासुओं और मुमुक्षुओं का गुरु के साथ सम्बन्ध का आधार किसी भौतिक वस्तु की प्राप्ति नहीं, बल्कि जीवन में आध्यात्मिक विकास होता है। वे गुरु से यह नहीं कहते कि तुम्हीं माता हो, तुम्हीं पिता हो, तुम्हीं मेरी विद्या और सम्पत्ति हो, बल्कि वे तो कहते हैं – गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परंब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥ इस तरह वे पारलौकिक गुरु तत्त्व से सम्बन्ध जोड़ते हैं। वे हमेशा इस बात को याद रखते हैं कि गुरु उनके मार्गदर्शक हैं, इसलिए इस सम्बन्ध में कोई भौतिक निर्भरता नहीं होती। उनमें आध्यात्मिक पिपासा होती है, उनका एक प्रयोजन और लक्ष्य रहता है। हालांकि ग्रहणशीलता का स्तर सब में समान नहीं होता। महान संत स्वामी शिवानंद सरस्वती शिष्यों की ग्रहणशीलता समझाने के लिए पेट्रोल, कपूर, कोयला और केले के तने जैसी उपमाएं देते थे। संकेत सरल था। किसी के लिए छोटी-सी चिंगारी पर्याप्त होती है, किसी को बार-बार ताप देना पड़ता है। अंतर गुरु के प्रकाश में नहीं, ग्रहण करने वाले की तैयारी में होती है। सार यह कि गुरु का न मिलना दुर्भाग्य हो सकता है; पर पात्र न होना हमारा चुनाव है। इतना तय है कि शिष्यत्व की पात्रता हासिल होते ही परिस्थितियां निर्मित होती है और गुरु कसौटी बनने के लिए उपस्थित हो जाते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

