दीर्घायु होना मानव जीवन की सबसे बड़ी आकांक्षाओं में से एक है। नित नए अनुसंधान किए जा रहे हैं कि मानव जीवन को किस विधि से लंबा किया जाए। चीन के पेइचिंग विश्वविद्यालय और कुनमिंग विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के मुताबिक, यदि मानव कोशिकाओं के प्राकृतिक कचरा निपटान तंत्र यानी लाइसोसोम को सक्रिय कर दिया जाए, तो असमय बुढ़ापे पर लगाम लगाई जा सकती है। लाइसोसोम के सक्रिय होने से शरीर में जमा होने वाले प्रोजेरिन जैसे जहरीले प्रोटीन और हानिकारक तत्वों की सफाई हो जाती है। इससे कोशिकाएं स्वस्थ, सक्रिय और पुनः युवावस्था की ओर लौट आती हैं। दुनिया के अन्य देशों में भी जीवनकाल के विस्तार और उसे स्वस्थ रखने के उद्देश्य से शोध-कार्य किए जा रहे हैं।
वैसे, स्वस्थ एवं दीर्घायु जीवन की आकांक्षा कोई नई नहीं है। पश्येम शरदः शतम्। जीवेम शरदः शतम्….प्रसिद्ध वैदिक का मंत्र है। इसमें ‘जीवेम शरदः शतम्’ यानी सौ वर्षों तक जीने की कामना के साथ ‘अदीनाः स्याम शरदः शतम्’ भी कहा गया है। अर्थ यह कि हम सौ वर्षों तक बिना किसी दीनता यानी परावलंबी बने बिना गरिमा के साथ जिएं। आखिर में प्रार्थना हैं कि अगर हमें सौ साल से भी ज्यादा की उम्र मिले, तो वह जीवन भी इसी तरह सेहत, होश और सम्मान के साथ बीतता रहे। योग शास्त्र में इस पूरी प्रक्रिया को वैज्ञानिक और व्यावहारिक धरातल मिल जाता है। महर्षि पतंजलि के योग दर्शन के मुताबिक, बुढ़ापे और बीमारी का मूल कारण ‘क्लेश’ हैं, जिनमें अविद्या और अभिनिवेश यानी मृत्यु का भय सबसे प्रमुख हैं। शरीर का वृद्धावस्था प्राप्त करना प्राकृतिक क्रिया है। पर, मानसिक और भावनात्मक दुर्दशा जीवनशैली और विचारों पर निर्भर है। इसलिए योगी केवल आसन और प्राणायाम की बात नहीं करते, प्रत्याहार और धारणा पर भी जोर देते हैं। ताकि आंतरिक ऊर्जा को संचित ऱखा जा सके।
सवाल है कि जीवन में यौगिक बीजारोपण कब किया जाना चाहिए? बीसवीं सदी के महान संत परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती तो आठ साल की उम्र को ही यौगिक जीवन प्रारंभ करने के लिए आदर्श मानते रहे हैं। पर वृद्धावस्था की समस्याओं को ही ध्यान में रखा जाए तो भी युवावस्था में हर हाल में योग जीवन का हिस्सा बन जाना चाहिए। यह ऐसी अवस्था होती है, जब शरीर में ऊर्जा का प्रवाह अपने चरम पर होता है और मन नए विचारों को ग्रहण करने के लिए सबसे अधिक उर्वर होता है। जब युवावस्था में ही आसन, प्राणायाम और यम-नियम के संस्कार चित्त पर अंकित हो जाते हैं, तो वे समय के साथ व्यक्ति के स्वभाव का हिस्सा बन जाते हैं। युवावस्था में बोया गया यह बीज मध्य आयु के झंझावातों, तनाव और सांसारिक जिम्मेदारियों के बीच एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। यह शरीर की कोशिकाओं को असमय बूढ़ा होने से बचाता है और रीढ़ की हड्डी तथा जोड़ों को उस लचीलेपन से समृद्ध रखता है, जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत जीवन के उत्तरार्ध में होती है। जो व्यक्ति इस उम्र से ही अपनी चेतना को थोड़ा अंतर्मुखी करने की कला जान जाता है, उसे बढ़ती उम्र की अनेक मानसिक व भावनात्मक समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है।
इक्कीस जून को जब अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाएगा, तब इसका मुख्य स्वर ‘स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग’ होगा। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए भी पूर्व की तरह आसन, प्राणायाम और ध्यान पर ज्यादा जोर होगा। पर, विश्व प्रसिद्ध बिहार योग विद्यालय के परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की थीम को व्यापक दृष्टिकोण से देखने की कोशिश की है। उनके मुताबिक, आसन, प्राणायाम और ध्यान से समन्वित यौगिक जीवनशैली शरीर और मन को स्वस्थ, संतुलित और स्थिर बनाती है। जब इस आंतरिक संतुलन के आधार पर व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से दया और करुणा का व्यवहार करता है, तो उसका प्रभाव केवल उसके अपने जीवन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवार और समाज में भी सद्भाव, सहयोग और विश्वास का वातावरण निर्मित करता है।
इसी प्रकार, जब मनुष्य जीवन को अभाव की दृष्टि से नहीं, बल्कि उपलब्धियों और पूर्णता के बोध के साथ देखता है, तब उसके भीतर संतोष का विकास होता है। यही संतोष उसका वास्तविक धन बन जाता है, क्योंकि यह परिस्थितियों पर नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक अवस्था पर आधारित होता है। दया और करुणा जैसे यम तथा संतोष जैसे नियम को जीवन में उतार लेने पर व्यक्ति चुनौतियों और परिवर्तनों का सामना अधिक धैर्य, विवेक और शांति के साथ कर पाता है। तब योग केवल आसनों या ध्यान तक सीमित अभ्यास नहीं रह जाता, बल्कि जीवन जीने की ऐसी कला बन जाता है, जो स्वस्थ शरीर, शांत मन और मधुर मानवीय संबंधों का आधार तैयार करती है।
ऐसी वृद्धावस्था की ऐसी उपलब्धियों के लिए युवावस्था से ही किया क्या जाए? बिहार योग विद्यालय का उत्तर बेहद वैज्ञानिक और जीवन को रुपांतरित कर देने वाला है। उसके मुताबिक, स्वस्थ और संतुलित जीवन के लिए दिन की शुरुआत नाश्ते से पहले एक संक्षिप्त आसन कैप्सूल से की जा सकती है। इसमें आकर्ण धनुरासन, समकोणासन, द्विकोणासन, एक पाद प्रणामासन, अर्ध उष्ट्रासन, शशांकासन, मार्जारी आसन, सर्पासन, कन्धरासन, विपरीत करणी आसन तथा सरल मत्स्यासन जैसे अभ्यास शामिल किए जाने चाहिए। आवश्यकता अनुसार अंत में कुछ समय शवासन किया जाता है, जिससे शरीर पूर्णतः विश्राम की अवस्था में पहुँच सके।
आसनों के बाद प्राणायाम कैप्सूल का क्रम आता है। इसमें जालन्धर और मूल बन्ध के साथ अनुपातिक विधि से नाड़ी शोधन प्राणायाम का अभ्यास और हृदय क्षेत्र पर सजगता रखते हुए भ्रामरी प्राणायाम का अभ्यास किया जान चाहिए। इससे मन को गहरी शांति, स्थिरता और प्रसन्नता का अनुभव होगा। दिन के मध्य या शाम के समय शिथिलीकरण कैप्सूल के रूप में योग निद्रा का अभ्यास विशेष लाभकारी होता है। इससे ऊर्जा का पुनर्संचार होता है।
दिन का समापन ध्यान कैप्सूल से किया जाना चाहिए। इसके तहत सोने से पहले कुछ समय शांत बैठकर पूरे दिन की घटनाओं का तटस्थ भाव से अवलोकन किया जाना चाहिए। इस आत्मचिंतन की प्रक्रिया में अपनी शक्तियों, कमजोरियों, महत्वाकांक्षाओं और आवश्यकताओं की पहचान कर लेने से जीवन में स्पष्टता आती है। मानसिक बोझ से मुक्ति मिल जाती है। स्पष्ट है कि वृद्धावस्था कैसी होगी, यह युवावस्था की जीवन-शैली पर निर्भर है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

