बीसवीं सदी के महान संत स्वामी शिवानंद सरस्वती ऋषिकेश में पतित पावनी गंगा के तट पर अवस्थित अपनी कुटिया में शिष्यों को दर्शन दे रहे थे। तभी एक अमेरिकी शिष्य और अपने जमाने के प्रख्यात दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक डॉ. थॉम्पसन ने सवाल पूछ लिया – “स्वामीजी, क्या आपने ईश्वर को देखा है?” शायद उत्तर में किसी अलौकिक दर्शन, समाधि के किसी अद्भुत अनुभव या किसी चमत्कारिक क्षण की अपेक्षा थी। लेकिन स्वामी जी के उत्तर से प्रश्न की दिशा ही बदल गई। उन्होंने कहा, “मैं ईश्वर के सिवा कुछ देखता ही नहीं। भोजन में, जल में, मिलने आए लोगों में और यहां तक कि आपमें भी मुझे ईश्वर ही दिखाई देते हैं।”
यह जबाव जितना सहजता था, उस गूढार्थ उतना सहज न था। इसमें वैदिक ज्ञान की गहरी धारा प्रवाहित हो रही थी। ईशावास्य उपनिषद के पहले ही मंत्र में कहा गया है कि इस चराचर जगत में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से आच्छादित है। यानी, ईश्वर कहीं दूर बैठा शासक नहीं, बल्कि हर वस्तु में व्याप्त तत्व है। श्रीमद्भगवतगीता छठे अध्याय में जिस समदर्शन की बात की गई है, उसका भाव भी यही है कि आत्मज्ञानी योगी संसार की विविधता में भी आत्मतत्त्व का दर्शन करता है। स्वामी जी का उत्तर इसी समदर्शन का जीवन्त रूप था। वे यह नहीं कह रहे थे कि ध्यान में उन्हें किसी विशेष क्षण ईश्वर का दृश्य दिखाई दिया। वे कह रहे थे कि उनकी दृष्टि ही ऐसी हो गई है कि जीवन की विविधताओं के पीछे एक ही चेतना दिखाई देती है।
यह बात व्यवहार रुप में भी दिखाई देती थी। उनके जीवन में समदर्शन प्रेम, सेवा और दान के रूप में उसका व्यावहारिक विस्तार बन गया था। तभी, गिरे हुए को उठाना, अंधे को रास्ता दिखाना, जो पास में है, उसको दूसरों में बाँटना, दीन-दुःखियों को सांत्वना और उत्साह दिलाना, पड़ोसियों को आत्म-भाव से प्रेम करना, गायों, पशु-पक्षियों, माताओं और बच्चों की रक्षा करना उस महोयोगी के जीवन का मुख्य उद्देश्य और यही उनकी महान शिक्षा भी थी। यह किसी सामान्य सामाजिक सहायता, दया और उदारता की बात नहीं थी, बल्कि समदर्शन की आध्यात्मिक परिणति की बात थी।
तमिलनाडु के गांव में 8 सितंबर 1887 को जन्मे कुप्पुस्वामी जन्मजात योगी थे। उनकी जीवन-यात्रा किसी मठ से नहीं, बल्कि एक पत्रिका के दफ़्तर से शुरू हुई। सन् 1909 की बात है। वे चिकित्सा-शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, तभी पिता जी की मृत्यु हो गई। परिवार घोर आर्थिक संकट में फंस गया। पर, कुप्पुस्वामी विचलित नहीं हुए। चिकित्सा-शिक्षा जारी रखते हुए “अंब्रोसिया” नाम की एक स्वास्थ्य-पत्रिका निकाली। वे उसमें अलग-अलग नामों से लेख लिखते और बीमारी के इलाज से अधिक उसकी रोकथाम पर बल देते। चिकित्सा-शिक्षा पूरी होने के बाद उन्हें पता चला कि मलाया (मलेशिया) के रबर बागानों में काम करने वाले हजारों भारतीय मजदूर चिकित्सा-सुविधाओं के अभाव में कठिन परिस्थितियों में जीवन बिता रहे हैं। वे समुद्र मार्ग से वहाँ पहुँचे और मजदूरों की सेवा में जुट गए।
डॉक्टर कुप्पुस्वामी की यह सेवा-भावना अहंकार नष्ट करने का साधन बन गई। तब ईश्वरीय प्रेरणा से सन् 1924 में ऋषिकेश आए और 1 जून को गंगा के तट पर संन्यास दीक्षा ली। इस तरह वे डाक्टर कुप्पुस्वामी से स्वामी विश्वानंद सरस्वती बन गए। इस अनुशासनप्रिय संत से यदि कोई शिष्य कहता कि फलां काम कल करूँगा तो वे तुरंत टोकते, “ऐसा मत कहो। कल मूर्खों के लिए है। वह कभी नहीं आता।” लेकिन उनका अनुशासन हर किसी को एक ही साँचे में ढालने वाला नहीं था। वे चिकित्सक के रुप में जिस तरह हर रोगी को एक ही औषधि नहीं देते थे, उसी तरह हर साधक के लिए उसके गुण-धर्म के आधार पर अलग-अलग मार्ग सुझाते थे। यह दृष्टि उनके “योग ऑफ सिंथेसिस यानी समन्वित योग का आधार बनी। उनके प्रमुख शिष्यों स्वामी चिन्मायानंद सरस्वती, स्वामी सत्यानंद सरस्वती, स्वामी चिदानंद सरस्वती, स्वामी कृष्णानंद सरस्वती, स्वामी विष्णुदेवानंद सरस्वती आदि की विविधता इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।
इस बात को चंद प्रमाणों से समझिए। केरल में जन्मे बालकृष्ण मेनन पहले पत्रकार थे और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे। इसी दौरान आध्यात्मिक उपलब्धियों को लेकर संदेह हुआ तो उसे मिटाने के इरादे से शिवानंद के आश्रम पहुँच गए। वहीं उनका आध्यात्मिक रूपांतरण हो गया। स्वामी शिवानंद ने 1949 में उन्हें संन्यास-दीक्षा दी और नाम दिया – स्वामी चिन्मायानंद सरस्वती। पर वेदांत की गहन शिक्षा के लिए उन्हें उत्तरकाशी में स्वामी तपोवनम् के पास भेज दिया। उन्होंने आगे चलकर चिन्मय मिशन की स्थापना की और दुनिया भर में ज्ञाप के दीप जलाए। स्वामी सत्यानंद सरस्वती (1923–2009) का मार्ग इससे सर्वथा भिन्न था। वे लगभग बीस वर्ष की अवस्था में सन् 1943 में धर्मेंद्र सिंह तायल के रुप में स्वामी शिवानंद की शरण में पहुंचे थे तो उनमें तंत्र विद्या के प्रति झुकाव था।
स्वामी सत्यानंद सरस्वती दीक्षा प्राप्त कर लगभग बारह वर्षों तक गुरु-सेवा में रहे। फिर एक दिन पूज्य गुरु ने यह कहते हुए आश्रम से विदा कर दिया – “जाओ सत्यानंद, योग का प्रचार करो।“ वर्षों की पदयात्रा और साधना के बाद, उन्होंने सन् 1963–64 में बिहार के मुंगेर में बिहार योग विद्यालय की स्थापना की। सत्यानंद का काम इसलिए क्रांतिकारी माना जाता है कि उन्होंने योग और तंत्र को गोपनीयता और अंधविश्वास के आवरण से निकालकर एक व्यवस्थित, लगभग वैज्ञानिक अनुशासन के रूप में प्रस्तुत किया। उनकी विकसित की हुई “योग-निद्रा” पद्धति आज दुनिया भर में चिकित्सा और मनोविज्ञान के क्षेत्रों में अध्ययन का विषय है।
किसी भी सच्चे गुरु की कसौटी उसकी अपनी ख्याति नहीं, बल्कि उसके द्वारा तैयार किए गए शिष्यों का सामर्थ्य होती है। स्वामी शिवानंद ने ऐसे शिष्य तैयार किए, जो उनकी छाया बनकर नहीं रहे, बल्कि अपनी-अपनी प्रकृति और क्षमता के अनुसार स्वतंत्र रूप से आगे बढ़े और दूर-दूर तक उनके संदेश को पहुँचाया। योगियों ने ठीक ही कहा है कि जो दीपक स्वयं जलकर रह जाए, वह केवल एक कमरे को रोशन करता है। पर, जो दीपक अनगिनत नए दीपकों को प्रज्वलित कर दे, उसकी रोशनी कभी मद्धम नहीं पड़ती। स्वामी शिवानंद सरस्वती ऐसे ही अक्षय प्रकाश थे, जो सेवा, प्रेम और आत्मज्ञान की राह पर चलने का साहस करने वालों के भीतर आज भी जल रहे है। स्वामी जी को उनकी 139वीं जयंती पर शत्-शत् नमन।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

