आषाढ़ शुक्ल द्वितीया यानी आगामी 16 जुलाई को महाप्रभु जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने रथों पर सवार होकर मुख्य मंदिर से गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करेंगे और नवें दिन यानी 24 जुलाई को बाहुड़ा यात्रा के साथ लौट आएँगे। सामान्यतः देवता मंदिरों के गर्भगृह में प्रतिष्ठित होते हैं और भक्त वहाँ तक पहुँचते हैं। पर पुरी में हर साल भगवान अपने रत्नसिंहासन से उतरकर भक्तों के बीच सड़क पर आ जाते हैं। यह ईश्वर की लोक-सुलभता का अनुपम उदाहरण है। इसे केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, समानता और आध्यात्मिक समावेशन का सबसे बड़ा सार्वजनिक अनुष्ठान कहा जा सकता है।
क्यों निकलते हैं प्रभु मंदिर से बाहर? इस पर कई मान्यताएँ हैं, और हर मान्यता अपने आप में सुंदर है। एक लोकप्रिय कथा के अनुसार, बहन सुभद्रा की मामा-घर जाने की इच्छा पूरी करने के लिए दोनों भाई उन्हें रथ पर बिठाकर यात्रा पर निकलते हैं। एक दूसरी, अत्यंत मानवीय व्याख्या यह है कि ज्येष्ठ पूर्णिमा को 108 घड़े जल से स्नान के बाद प्रभु अस्वस्थ हो जाते हैं। पंद्रह दिन के इस ‘अणसर’ काल में वे एकांतवास में रहते हैं। फिर स्वस्थ होकर प्रभु मौसी के घर के लिए निकलते हैं तो पहले भक्तों के बीच जाते हैं और फिर भक्तों के साथ ही प्रस्थान करते हैं। भागवत परंपरा यही तो कहा गया है कि भक्त की आर्त पुकार सुनकर भगवान स्वयं चलकर उस तक पहुँच जाते हैं। रथयात्रा उसी करुणा का प्रस्फुटन है।
चैतन्य महाप्रभु ने अपने जीवन का लंबा काल जगन्नाथपुरी में बिताया था और इस यात्रा को लेकर गौड़ीय वैष्णव परंपरा में अलग दृष्टिकोण है। उसके मुताबिक, गुंडिचा मंदिर को वृन्दावन का प्रतीक माना गया है। मान्यता है कि सूर्यग्रहण के अवसर पर द्वारका के राजा बने श्रीकृष्ण जब कुरुक्षेत्र में राधा और ब्रजवासियों से मिलते हैं, तब सौ वर्ष के विरह के बाद हुए इस मिलन में भी राधा को वह वृन्दावन-रस नहीं मिल पाता, क्योंकि यहाँ कृष्ण ऐश्वर्यशाली राजा के रूप में हैं। तब गोपियाँ रथ खींचकर उन्हें फिर से सरल, प्रेममय वृन्दावन ले जाना चाहती हैं। इसलिए तो चैतन्य महाप्रभु विरह-भाव में डूबकर रथ के आगे नृत्य करते थे, मानो राधा स्वयं कृष्ण को अपने धाम की ओर ले जा रही हों। पर यह अनेक व्याख्याओं में से एक है, और रथयात्रा की असली महिमा शायद इसी में है कि वह एक साथ इतनी मान्यताओं को अपने में समेट लेती है।
श्रीजगन्नाथ परंपरा की जड़ें भारत के गहरे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक चिंतन से जुड़ी हैं। प्राचीन कथाओं के अनुसार, शबर जनजाति मूल रूप से नीलमणि-सदृश पत्थर से निर्मित नीलमाधव की सुंदर मूर्ति की पूजा करती थी। मालवा के राजा इंद्रद्युम्न जब उस दिव्य प्रतिमा के दर्शन के लिए वहां पहुँचे, तब तक वह प्रतिमा अंतर्धान हो चुकी थी। कालांतर में प्रभु समुद्र में तैरती एक विशाल लकड़ी (दारु) के रूप में प्रकट हुए। तब राजा इंद्रद्युम्न, शबर प्रमुख विश्वावसु और ब्राह्मण विद्यापति मिलकर उस दारु को नीलाचल ले आए। पर इसके बाद कथा का सबसे रहस्यमय मोड़ आता है। कथा के मुताबिक, लकड़ी से विग्रह गढ़ने के लिए स्वयं विश्वकर्मा एक वृद्ध बढ़ई के रूप में प्रकट हुए। उनकी शर्त थी कि इक्कीस दिनों तक कक्ष का द्वार नहीं खोला जाएगा। किंतु उत्सुकतावश द्वार समय से पहले ही खुलवा दिया गया। परिणामतः तीनों विग्रह सदा के लिए अधूरे रह गए। कुछ आख्यानों में यह उतावलापन रानी गुंडिचा से भी जोड़ा जाता है।
कथा चाहे जो हो, ये अधूरे विग्रह इस शाश्वत सत्य के प्रतीक हैं कि पूर्णता स्थूल शरीर में नहीं, बल्कि सूक्ष्म चेतना में होती है। श्वेताश्वतर उपनिषद के अनुसार, परमात्मा के भौतिक हाथ-पाँव नहीं हैं, फिर भी वह सब कुछ ग्रहण करता है। उसकी भौतिक आँखें और कान नहीं हैं, फिर भी वह सब कुछ देखता और सुनता है। श्रीजगन्नाथ का अपूर्ण विग्रह इसी सत्य का मूर्त रूप है। इस कथा का ऐतिहासिक पक्ष भी कम प्रेरक नहीं। हरमन कुल्के, अंचार्लोट एशमान और गयाचरण त्रिपाठी जैसे विद्वानों के शोध बताते हैं कि जगन्नाथ-परंपरा में आदिवासी शबर आराधना, वैदिक कर्मकांड, वैष्णव भक्ति तथा शैव और शाक्त मतों के तत्व इस कदर घुले-मिले हैं कि यह किसी एक राजा, जाति या संप्रदाय की सीमा में बँधी परंपरा नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय चेतना का सजीव प्रतीक बन गई है।
इस पौराणिक आख्यान का प्रत्येक पात्र एक जीवंत प्रतीक है। विश्वावसु जहाँ प्रकृति से जुड़ी आदिम जनजातीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहीं विद्यापति ज्ञानमयी वैदिक-ब्राह्मण परंपरा के वाहक हैं। राजा इंद्रद्युम्न उस सजग राजसत्ता के प्रतीक हैं, जो धर्म और समाज को समान रूप से संरक्षण देती है। इसी राजसत्ता के अहंकार-विसर्जन का सबसे जीवंत रूप ‘छेरा पहँरा’ की परंपरा में दिखता है, जब पुरी के गजपति महाराज स्वयं सेवक की भाँति रथ-मार्ग को सोने की झाड़ू से बुहारते हैं। यानी राजा भी उस विराट समष्टि के सामने केवल एक विनम्र सेवक होता है। इन तथ्यों को समग्रता में देखें तो स्पष्ट है कि भारतीय संस्कृति का मूल तत्व समावेशन और समन्वय में निहित है। आज के बँटे हुए समाज के लिए यह बहुत बड़ा और सामयिक संदेश है।
समन्वय का यही भाव आध्यात्मिक जीवन का मार्गदर्शक सिद्धांत बन जाता है। रथ मनुष्य के संपूर्ण अस्तित्व और उसकी अंतर्यात्रा का सबसे सशक्त रूपक है। कठोपनिषद में यमराज नचिकेता को समझाते हैं कि जीवात्मा इस रथ का स्वामी है, शरीर उसका रथ है, बुद्धि सारथी है और मन लगाम। हमारी इंद्रियाँ उन चंचल घोड़ों के समान हैं, जो निरंतर विषय-वासनाओं की ओर दौड़ती हैं। यदि मन असंयत हो और बुद्धि सजग न रहे, तो ये इंद्रियाँ मनुष्य को उसके जीवन-लक्ष्य से भटका देती हैं। इसके विपरीत, जिसका मन संयमित और बुद्धि विवेकपूर्ण है, वह जीवन-रथ को सही दिशा में ले जाकर परम लक्ष्य तक पहुँचता है। इस पृष्ठभूमि में रथयात्रा को देखें तो कहना होगा कि रथ हमें स्मरण दिलाते हैं कि बहिर्यात्रा नहीं, बल्कि अंतर्यात्रा का मूल्य है। सार यह कि जब तक अहंकार समरसता में नहीं बदलेगा और बुद्धि हमारे जीवन-रथ की सारथी नहीं बनेगी, तब तक हमारी अंतर्यात्रा अधूरी ही रहेगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

