अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर करोड़ों लोगों का एक साथ योगाभ्यास करना स्वागत योग्य कदम था। वैसे, अनेक योग संस्थानों की ओर से आम दिनों में भी जागरुकता के लिए योग शिविरों के आयोजन किए जाते हैं। ऐसे आयोजनों का मुख्य उद्देश्य प्रेरणा देना और योग की विविधताओं से परिचय कराना होता है, न कि व्यक्तिगत साधना के लिए सूत्र देना होता है। इसलिए कि एक ही तरह की क्रियाएं सबके लिए समान रूप से कल्याणकारी नहीं हो सकती हैं। पर, देखा जाता है कि अनेक लोग सामूहिक आयोजनों या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के प्रदर्शनों के आधार पर जटिल आसन भी करने का प्रयास करते हैं।
इस विमर्श का दूसरा और अधिक संवेदनशील पहलू योगाभ्यास की सटीकता से जुड़ा हुआ है। मान लिया जाए कि कोई विशेष योग विधि किसी व्यक्ति के लिए उपयुक्त है, तो भी इसकी क्या गारंटी है कि अभ्यास के दौरान शारीरिक मुद्रा और श्वास का क्रम पूरी तरह सटीक है। योग श्वास की गति और मानसिक एकाग्रता का एक सूक्ष्म विज्ञान है और एक सेंटीमीटर का गलत झुकाव या श्वास का असंतुलित क्रम शरीर के तंत्रिका तंत्र पर विपरीत प्रभाव डाल सकता है। ये विषय कितने गंभीर हैं, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि योगशास्त्रों में किसी भी योग विधि के विवरण के साथ ही उसकी सीमाओं और सावधानियों का भी अत्यंत सूक्ष्मता से विवरण होता है।
हठयोग प्रदीपिका के रचयिता स्वामी स्वात्माराम और घेरंड संहिता के प्रवक्ता महर्षि घेरंड ने योगाभ्यासों के लिए अनुशासन और सावधानियों पर बल देते हुए चेतावनी दी है कि इन सावधानियों की उपेक्षा करने पर बड़ी हानि हो सकती है। इसलिए, दोनों ही ग्रंथों में केवल आसन, प्राणायाम या अन्य प्रकार के योग करने की विधियां नहीं बताई गई हैं, बल्कि यह भी समझाया कि उनके अभ्यास से पहले कैसी तैयारी हो, अभ्यास के दौरान किन बातों का ध्यान रखा जाए और अभ्यास के बाद शरीर तथा मन को कैसे संतुलित किया जाए। हालांकि हठयोग की प्रक्रिया राजयोग में बदल जाती है। इसलिए महर्षि पतंजलि ने अपने योगसूत्र में आसन की परिभाषा ‘स्थिरसुखमासनम्’ कहकर इसके पीछे के गहरे विज्ञान को प्रतिपादित किया है।
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता का जमाना है। अनेक युवाओं को लगता है कि आधुनिक तकनीकों की सहायता से सही-सही योगाभ्यास किया जा सकता है। यह कहने का आधार भी है। हाल ही चंडीगढ़ विश्वविद्यालय के एआई विशेषज्ञ प्रोफेसर डॉ. राघव मेहरा ने एक ऐसी “स्मार्ट योग मैट” विकसित की है। दावा किया गया है कि यह मैट कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सेंसरों की मदद से जान लेती है कि योगासन सही तरीके से किए जा रहे हैं या नहीं। मैट की यह भी विशेषता है कि केवल शरीर की स्थिति ही नहीं, बल्कि योगाभ्यास के दौरान होने वाले शारीरिक परिवर्तनों की भी जानकारी देती है। वैसे, आधुनिक तकनीकों के जानकार योगाचार्यों का तर्क है कि जिस तरह इलेक्ट्रोमायोग्राफी से मांसपेशियों की सक्रियता, मोशन कैप्चर से जोड़ों के कोण, श्वसन विश्लेषण, हृदय गति परिवर्तनशीलता और संतुलन परीक्षण उपकरण से आसन की गुणवत्ता का आकलन किया जाता है, एआई आधारित मैट भी कुछ वैसा ही है। ये सभी उपकरण बाहरी यांत्रिक शुद्धता को मापते हैं, आंतरिक यौगिक शुद्धता की परख नहीं कर पाते।
इसमें दो मत नहीं कि अनुभवी योगाचार्यों की “एआई” सदियों से आजमाई हुई और विश्वसनीय है। यदि आसन करते समय श्वास सहज, लंबी और नियंत्रित बनी रहती है, तो यह सही अभ्यास का संकेत माना जाता है। वहीं, श्वास रुक-रुक कर चलने लगे या हांफने जैसी स्थिति बने, तो अभ्यास में सुधार की आवश्यकता है। यदि अभ्यास के बाद असामान्य थकान, चक्कर, दर्द या भारीपन महसूस हो, तो या तो विधि गलत है या अभ्यास क्षमता से अधिक किया गया है। योग में मन की स्थिति को भी महत्वपूर्ण कसौटी मानी गई है। यदि अभ्यास के बाद चिड़चिड़ापन या अत्यधिक उत्तेजना बढ़े, तो अभ्यास की समीक्षा आवश्यक है। इसी कारण परंपरा में योगाचार्य को सबसे विश्वसनीय “जीवंत फीडबैक सिस्टम” माना गया है। एक अनुभवी योगाचार्य केवल शरीर की मुद्रा ही नहीं देखते, बल्कि श्वास, चेहरे के भाव, मांसपेशियों में अनावश्यक तनाव, मानसिक स्थिति और साधक की क्षमता के अनुसार अभ्यास में संशोधन भी करते हैं। ऐसा समग्र मूल्यांकन आज की अधिकांश तकनीकें नहीं कर पातीं।
गलत योगाभ्यास किस तरह कष्ट का कारण बन जाता है, इसे कुछ उदाहरणों से समझिए। योग विद्या में शीर्षासन को आसनों का राजा कहा गया है। लेकिन इसका अभ्यास गलत तरीके से किया जाए, तो आँखों की रोशनी हमेशा के लिए चली जा सकती है। इंडियन जर्नल ऑफ आफथलमोलाजी के मुताबिक, गुजरात में पचपन वर्षीय व्यक्ति ने शीर्षासन के तुरंत बाद अपनी दाहिनी आँख की रोशनी खो दी थी। दरअसल, पाँच साल पहले उसके फेफड़ों में खून का थक्का जम गया था और वह खून पतला करने की दवा ले रहा था। इसके बावजूद उसने बिना किसी पूर्व अनुभव और बिना किसी विशेषज्ञ की देखरेख के, सीधे दीवार के सहारे दो मिनट तक शीर्षासन किया था। पुडुचेरी में उच्च रक्तचाप से पीड़ित एक मरीज़ की शीर्षासन के कारण आँख की नस क्षतिग्रस्त हो गई। कर्नाटक में मात्र 23 साल के युवक की आंख की रोशनी जाती रही। इसकी जड़ में भी उच्च रक्तचाप और शीर्षासन ही था। इन तीनों घटनाओं में स्पष्ट पैटर्न है। हर बार उस योगाभ्यासी को ही नुकसान हुआ, जो पहले से किसी न किसी बीमारी से पीड़ित था और सही मार्गदर्शन के बिना योगाभ्यास कर रहा था।
यूट्यूब के वीडियो या सामूहिक योगाभ्यास का हिस्सा बनकर योग की सूक्ष्मता को पकड़ना असंभव है। केवल अनुभवी योगाचार्य ही बारीकियां समझ और बता सकते हैं। योगाचार्य योगाभ्यासी की शारीरिक बनावट, उसकी व्याधियों और उसकी क्षमता का आकलन करके तय करते हैं कि कौन-सी योग विधि किस तरह किया जाना चाहिए। योगाचार्य के निर्देशन के बिना योग करना चिकित्सक के परामर्श के बिना इलाज कराने के समान है। इसलिए, आवश्यकता योग के प्रचार के साथ ही शुद्ध अभ्यास की संस्कृति विकसित करने की है। योग दिवस का वास्तविक संदेश तभी सार्थक होगा, जब प्रेरणा के साथ प्रशिक्षण भी जुड़ा हो, उत्साह के साथ विवेक भी हो और संकल्प के साथ योग्य मार्गदर्शन भी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

