वृद्धावस्था में मानव स्वस्थ रहे, यह 21वीं सदी की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2050 तक दुनिया में 80 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लोगों की संख्या में भारी इजाफा हो गया रहेगा। यह मानव सभ्यता की एक बड़ी उपलब्धि तो है, पर स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियाँ भी बड़ी हैं। उम्र बढ़ने के साथ हृदय रोग, मधुमेह, गठिया, अल्जाइमर, पार्किंसन, अवसाद और शारीरिक निर्बलता जैसी समस्याएँ बढ़ती हैं। इसलिए, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मौजूदा दशक को स्वस्थ आयु-वृद्धि का दशक घोषित कर रखा है। चूंकि अब योग की वैज्ञानिकता भी साबित हो चुकी है। इस लिहाज से अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की थीम “योगा फॉर हेल्दी एजिंग” प्रासंगिक बन पड़ी है। केंद्रीय आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रतापराव जाधव ने ठीक ही कहा है कि यह विषय वृद्धावस्था में समग्र कल्याण को बढ़ावा देने में योग के बढ़ते महत्व को दर्शाता है।
योग भारत का प्राचीन ज्ञान है। जो लोग वैदिक ऋषियों की उपलब्धियों से वाकिफ नहीं हैं, उन्हें यह जानकर हैरानी होगी कि हजारों वर्ष पहले महर्षि पतंजलि जैसे वैदिक ऋषियों ने योग विद्या के जरिए मानव जाति के स्वस्थ एवं दीर्घायु जीवन की कामना की थी। “पश्येम शरदः शतम्, जीवेम शरदः शतम्… मंत्र तो यजुर्वेद का अमर संदेश है। वैदिक ऋषियों की दृष्टि में जीवन का मूल्य केवल दीर्घायु होने में नहीं, बल्कि स्वस्थ, जागरूक, समर्थ और सार्थक जीवन जीने में है। इसलिए मंत्र में केवल जीवित रहने की कामना नहीं की गई, बल्कि स्वस्थ जीवन की कामना की गई। ताकि ताउम्र दृष्टि, श्रवण, बुद्धि, स्मृति, शक्ति और आत्मिक चेतना बनी रहे। यही कारण है कि यह मंत्र आज भी स्वस्थ और गरिमामय वृद्धावस्था के लिए एक सार्वकालिक प्रार्थना माना जाता है।
शास्त्रीय दृष्टिकोण से देखें तो हठयोग के मूल ग्रंथों में शरीर को कंचन यानी सोने जैसा शुद्ध और सुदृढ़ बनाने का विधान है। हमारे मस्तक में सोम चक्र होता है। वह आज्ञा चक्र से थोड़ा ऊपर और सहस्रार चक्र के ठीक नीचे होता है। ‘सोम’ का संबंध चंद्रमा से माना गया है, जो शीतलता, शांति और पोषण का प्रतीक है। इस चक्र से निरंतर सूक्ष्म और दिव्य रस का स्राव होता रहता है। उसे ‘अमृत रस’, ‘सोम रस’ या ‘सुधा’ कहा जाता है। यह रस हमारे जीवन चक्र, स्वास्थ्य और यौवन को बनाए रखने के लिए जिम्मेदार माना गया है। हठप्रदीपिका और घेरण्ड संहिता के मुताबिक, सामान्यतः सोम चक्र से टपकने वाला अमृत रस नीचे गिरकर नाभि मंडल में स्थित सूर्य चक्र यानी जठराग्नि में भस्म होते जाता है। इसी कारण मनुष्य का शरीर धीरे-धीरे बूढ़ा होने लगता है और बीमारियां घेर लेती हैं।
इस प्राचीन दावे को आज का आधुनिक विज्ञान भी प्रकारांतर से स्वीकार करता है। आधुनिक विज्ञान के मुताबिक, जैविक उम्र का बढ़ना शरीर के भीतर चलने वाली निरंतर प्रक्रिया का परिणाम है। शरीर में नई कोशिकाएं बनने का काम लगातार जारी रहता है, जिसमें क्रोमोसोम की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। क्रोमोसोम के सिरों पर ‘टेलोमेर’ नामक एक सुरक्षा कवच होता है, जो डीएनए और आनुवंशिक सूचनाओं को सुरक्षित रखता है। जैसे-जैसे कोशिकाएं विभाजित होती हैं, इन टेलोमेर की लंबाई धीरे-धीरे कम होने लगती है। टेलोमेर का मुख्य कार्य कोशिकाओं को तेजी से नष्ट होने से बचाना है, लेकिन इनके छोटा होने पर कोशिकाएं अपनी कार्यक्षमता खो देती हैं। यही वह स्थिति है, जब शरीर बुढ़ापे की ओर बढ़ने लगता है और व्याधियों का घर बन जाता है।
मानव जीवन के कल्याण के लिए ऋषियों व योगियों द्वारा विकसित इस वैज्ञानिक विद्या को लेकर भारत सहित दुनिया भर में अब तक जितने भी वैज्ञानिक अध्ययन किए गए, उनसे उसकी वैज्ञानिकता सिद्ध हुई। इस आधार पर आश्वस्ति मिली है कि यदि सही मार्गदर्शन में योग का अभ्यास किया जाए, तो बढ़ती उम्र में भी जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाए रखना संभव है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि योग हमारे डीएनए के छोर पर स्थित ‘टेलोमीयर्स’ की रक्षा करता है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल और एम्स, दिल्ली जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के शोधों से योगियों के अनुभव पर मुहर लगी कि विपरीत करणी और शीर्षासन जैसे योगासनों से ‘टेलोमेरेज़’ एंजाइम सक्रिय होता है, जो टेलोमीयर्स की लंबाई को बनाए रखता है और कोशिकीय स्तर पर बुढ़ापे की गति को धीमा कर देता है। प्राणायाम से शरीर में कोर्टिसोल जैसे स्ट्रेस हार्मोन का स्तर घटता है और ऑक्सीजन का प्रवाह बढ़ता है, तो त्वचा की चमक और अंगों की कार्यक्षमता बनी रहती है।
मुझे लगता है कि इस प्रसंग में आदिगुरु शंकराचार्य के ग्रंथ ‘भज गोविंदम’ की चर्चा न हो तो बात अधूरी रह जाएगी। वे श्लोकों जरिए समझाते हैं कि बुढ़ापे के कारण अंग-प्रत्यंग ढीले पड़ गए हैं, सिर के बाल सफेद हो चुके हैं, मुंह दांतों से पूरी तरह विहीन हो चुका है और वृद्ध व्यक्ति हाथ में लाठी पकड़कर धीरे-धीरे चल रहा है, फिर भी उसके भीतर बैठा हुआ ‘आशापिण्ड’ यानी इच्छाओं और तृष्णाओं का पुलिंदा उसका पीछा नहीं छोड़ता। इसलिए मन अंतर्मुखी न होने से उपभोग की लालसा के कारण जीवन में आध्यात्मिक त्रासदी बनी रह जाती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए आधुनिक युग के योगियों की शिक्षा है कि बुढ़ापे को गरिमापूर्ण और शांत बनाने के लिए युवावस्था से ही प्रत्याहार और ध्यान का अभ्यास किया जना चाहिए। जब इंद्रियों की ऊर्जा भीतर की ओर मुड़ जाती है, तब ढलती उम्र में शरीर के जर्जर होने पर भी मन तृष्णाओं से मुक्त होता है। इससे पूर्ण संतोष और आनंद की प्राप्ति होती है।
योग निद्रा और त्राटक के अभ्यास से व्यक्ति केवल अपनी शारीरिक क्रियाओं के प्रति ही नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व के प्रति जागरूक हो जाता है। आधुनिक न्यूरोसाइंस के मुताबिक, इससे मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स सक्रिय रहता है, जो निर्णय लेने और भावनात्मक संतुलन के लिए जिम्मेदार है। इससे मनुष्य अतीत के पछतावे और भविष्य की चिंताओं से मुक्त हो कर वर्तमान में जीने लगता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

