वैदिक परंपरा में गुरु और शिष्य का संबंध बीज और वृक्ष की तरह होता है, जहाँ बीज अपनी पूरी सामर्थ्य वृक्ष में समाहित कर देता है। श्रीश्री रविशंकर का जीवन और उनकी आध्यात्मिक उपलब्धियों पर गौर करें तो कहना होगा कि महर्षि महेश योगी की चेतना की छाया श्रीश्री के व्यक्तित्व और उनके वैश्विक मिशन में एक आधारशिला की तरह विद्यमान है।
महर्षि महेश योगी की सबसे बड़ी खूबी ‘निंदा का पूर्ण अभाव’ थी। वे साधारण व्यक्ति को भी ‘गवर्नर’ या ‘राजा’ कहकर उसकी गरिमा को जगाते थे। श्रीश्री के व्यवहार में यही छाया ‘अपनत्व’ और ‘मुस्कुराहट’ के रूप में दिखती है। जैसे महर्षि अपनी उपस्थिति से लोगों को मानसिक रूप से ऊंचा उठाते थे, वैसे ही श्रीश्री भी लोगों को उनके दोष गिनाने के बजाय उनके भीतर की अच्छाई को उभारने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते हैं। यह महर्षि योगी की उस कार्यशैली का विस्तार है, जहाँ व्यक्ति को ‘बेवकूफ’ कहने के बजाय उसे ‘ब्रह्म’ होने का बोध कराया जाता है।
महर्षि योगी ने अध्यात्म को केवल गुफाओं का विषय न रखकर उसे ‘यूनिफाइड फील्ड थ्योरी’ और वैज्ञानिक धरातल पर विश्व के सामने रखा। श्रीश्री के कार्यों में महर्षि की इस दृष्टि का गहरा प्रभाव दिखता है। उन्होंने भी प्राचीन वैदिक ज्ञान, प्राणायाम और सुदर्शन क्रिया को आज की आधुनिक जीवनशैली और तनाव के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया। महर्षि ने जिस तरह पश्चिमी जगत की हिप्पी संस्कृति को योग से सुधारा, श्रीश्री ने उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए आर्ट ऑफ लिविंग के माध्यम से दुनिया के सबसे अशांत क्षेत्रों में शांति और मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना की।
महर्षि योगी अपनी ही आलोचना करने वाले ओशो को जेल से रिहा कराने के लिए धन उपलब्ध कराना, महर्षि की ‘मौन करुणा’ का शिखर है। श्रीश्री के व्यक्तित्व में भी यह गुण स्पष्ट झलकता है। वे न केवल अपने अनुयायियों, बल्कि अपने विरोधियों और समाज के उपेक्षित वर्गों के प्रति भी वैसी ही संवेदनशीलता रखते हैं। महर्षि का मंत्र था—”योग करो, उद्योग करो।” श्रीश्री ने इसी सूत्र को सेवा के साथ जोड़कर एक वैश्विक आंदोलन बना दिया, जहाँ ध्यान केवल व्यक्तिगत शांति का साधन नहीं, बल्कि समाज की सेवा का आधार बन गया।
वास्तव में, महर्षि की वह छाया जो सबको राजा बनाने का स्वप्न देखती थी, आज श्रीश्री के माध्यम से करोड़ों लोगों के जीवन में आत्मविश्वास और सेवा के रूप में साकार हो रही है।
श्रीश्री रविशंकर ने अपने गुरु महर्षि महेश योगी के जन्मदिवस पर उन्हें स्मरण करते हुए कहा था – “महर्षि महेश योगी का व्यक्तित्व और उनकी कार्यशैली की विशिष्टता अद्वितीय थी। उनके चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता उनका समभाव था। उन्होंने कभी किसी की निंदा या आलोचना नहीं की, बल्कि वे एक ऐसे दृष्टा थे, जो हर व्यक्ति के भीतर छिपी संभावनाओं को उभारने में विश्वास रखते थे।
महर्षि जी का दृष्टिकोण निर्माणकारी था। जब उनके शिष्य ध्यान सिखाने के दौरान लोगों के तिरस्कार का सामना करते थे, तब महर्षि जी उन्हें ‘राजा’ और ‘गवर्नर’ कहकर संबोधित करते थे। ऐसा करके वे साधारण व्यक्ति की चेतना को इतना ऊंचा उठा देते थे कि वह स्वयं को विश्व प्रशासन का उत्तरदायी मानने लगता था। उनकी शिक्षाओं का मूल आधार वैज्ञानिक था, जहाँ वे ‘यूनिफाइड फील्ड थ्योरी’ जैसे सिद्धांतों के माध्यम से योग और ध्यान को आधुनिक संदर्भों में समझाते थे।
महर्षि जी के धुर आलोचक ओशो अमेरिका में संकट में थे और जेल में उन पर भारी जुर्माना लगाया गया था, तब महर्षि जी ने ही गुप्त रूप से उनकी आर्थिक सहायता की और उन्हें वहां से छुड़वाने में मदद की। यह उनकी उदारता का परिचायक था कि उन्होंने आलोचनाओं के बदले केवल सहयोग दिया।
महर्षि जी ने वैश्विक स्तर पर, विशेषकर पश्चिम में, एक बड़ी सामाजिक क्रांति की। उन्होंने नशे और भटकाव में डूबी हिप्पी पीढ़ी को ध्यान और योग के माध्यम से जीवन का एक नया उद्देश्य दिया। उनके सानिध्य में लोगों के चेहरों पर एक विशेष चमक और जीवन में अनुशासन आने लगा। उनका लक्ष्य केवल व्यक्तिगत शांति नहीं, बल्कि ध्यान के माध्यम से विश्व में शांति और समृद्धि लाना था। उनका पूरा जीवन ‘योग करो और उद्योग करो’ की प्रेरणा देते हुए लोगों को वर्तमान क्षण में खुश रहने की कला सिखाने के प्रति समर्पित रहा।“

