संतों की जयंती मनाना केवल अतीत को याद करने जैसा नहीं, बल्कि वर्तमान को दिशा देना होता है। इसलिए, जब संतों के जीवन और उनके विचारों पर दृष्टि डालते हैं, तो स्पष्ट होता है कि उनकी शिक्षाएँ समय की सीमाओं से परे हैं। विज्ञान, तकनीक और सामाजिक संरचनाओं के क्षेत्र में हमने भले उल्लेखनीय प्रगति कर ली है। पर, खुद का रुपांतरण होना बाकी है। काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसे आंतरिक शत्रु आज भी प्रबल हैं। ऐसे में संत मलूकदास की 452वीं जयंती पर जब देश-विदेश में उन्हें विविध रूपों में स्मरण किया गया, और उनकी शिक्षाएं नईपीढ़ी के समक्ष प्रस्तुत की गईं तो लगा मानों संत मलूकदास वर्तमान युग के संदर्भ में बातें कह रहे हों।
संत मलूकदास का नाम आते ही उनका प्रसिद्ध दोहा – “अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए, सबके दाता राम” जुबान पर आ जाता है। सामान्यतः इस दोहे को अकर्मण्यता से जोड़कर देखा जाता है, जबकि इसका वास्तविक आशय अत्यंत गहन मनोवैज्ञानिक व आध्यात्मिक है। यह उस अवस्था की ओर संकेत करता है, जब मनुष्य अपने अहंकार को त्यागकर ईश्वर की व्यवस्था में विश्वास करते हुए कर्म करता है। इसे विस्तार देने के लिए उनके जीवन पर दृष्टि डालना आवश्यक है।
सत्रहवीं सदी के इस संत का जन्म वर्तमान प्रयागराज के कड़ा ग्राम में हुआ था। आध्यात्मिक प्रवृत्ति ने उन्हें वृंदावन पहुंचा दिया। उन्होंने वहीं यमुना किनारे बंसीवट पर दीर्घकाल तक कठोर तपस्या की और वहीं सदा के लिए धुनी रमा दी थी। उनके लगभग ढाई हजार शिष्य भी साथ रहने लगे थे। उनका दृष्टिकोण अत्यंत उदार और समन्वयवादी था। नतीजतन, वे निर्गुण राम के उपासक होते हुए भी कृष्ण भक्ति से गहराई से प्रभावित थे, जो उस काल की संत परंपरा में समन्वय की अद्भुत मिसाल है। वे सिर्फ वैराग्य के कवि नहीं, बल्कि एक ऐसे मनोवैज्ञानिक थे, जिन्होंने सदियों पहले मनुष्य की भीतरी बेचैनी की जड़ पहचान ली थी।
संत मलूकदास रामानंदी परंपरा की 22वीं पीढ़ी के संत माने जाते हैं। उनकी आध्यात्मिक परंपरा को मलूकपीठ आगे बढ़ा रहा है। हाल ही वृंदावन स्थित इस पीठ में संत मलूकदास की 452वी जयंती के मौके पर सात दिवसीय समारोह का आयोजन किया गया तो उसमें देश-विदेश के भक्तों ने जिस उत्साह से भाग लिया, उससे उस संत की अलौकिक आभा का पता चला। संत मलूकदास एक ऐसे संत थे, जिन्होंने अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब के अशांत और क्रूर कालखंड को देखा था, परंतु अपने आदर्शों से कभी विचलित नहीं हुए। उन्होंने उस समय की अंधकारमय परिस्थितियों में भी सांस्कृतिक चेतना का दीप जलाए रखा।
संतों के जीवन में चमत्कारों की कथाएँ प्रायः आकर्षण का केंद्र होती हैं, किंतु भक्तिकालीन संतों ने चमत्कारों से अधिक भक्ति की शक्ति को महत्त्व दिया। संत मलूकदास के जीवन में भी एक ऐसी ही घटना घटित हुई थी, जो उनके प्रसिद्ध दोहे के गूढ़ार्थ को स्पष्ट करती है। कथा है कि एक बार उन्होंने किसी संत के मुख से सुना कि यदि भगवान पर पूर्ण विश्वास हो, तो भूखे को भी अन्न मिल जाता है। यह शब्द उन पर मानों शक्तिपात की तरह काम किया। वे चल पड़े जंगल की ओर। वहां एक बरगद के वृक्ष पर चढ़कर ईश्वर का स्मरण करने लगे। संयोगवश उसी स्थान पर एक राजकुमार अपने सैनिकों के साथ विश्राम हेतु रुका और भोजन की व्यवस्था की गई। तभी शत्रुओं के भय से वे सब भोजन छोड़कर भाग खड़े हुए।
कुछ ही समय बाद डाकुओं का एक दल वहाँ पहुँचा। उन्हें भोजन देखकर संदेह हुआ कि यह कोई षड्यंत्र है। जब उनकी दृष्टि वृक्ष पर बैठे मलूकदास पर पड़ी, तो उन्होंने उन्हें नीचे उतारकर उसी भोजन को जबरन खिलाया। इस घटना ने संत मलूकदास के भीतर एक गहन बोध उत्पन्न किया। उन्हें भरोसा हो गया कि जब मनुष्य पूर्णतः समर्पित हो जाता है, तो ईश्वर उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। यह कथा चमत्कार नहीं, बल्कि उस अदृश्य व्यवस्था का प्रतीक था, जो जीवन को सूक्ष्म रुप से संचालित करती है।
उनकी ख्याति जब मुगल दरबार तक पहुँची, तो परीक्षा लेने के लिए बहुमूल्य मोतियों से भरा स्वर्ण थाल उनके पास भेजा गया। उस समय वे प्रयाग के कुंभ में अपने गुरु के सान्निध्य में थे। उन्होंने उन मोतियों को भस्म बनाकर चूने में परिवर्तित किया और और ठाकुर जी के भोग के लिए संतों में वितरित कर दिया। उसी समय एक निर्धन ब्राह्मण अपनी पुत्री के विवाह हेतु सहायता मांगने आया, तो उन्होंने स्वर्ण थाल भी उसे दान कर दिया। ये दोनों प्रसंग सेवा, प्रेम और दान की पराकाष्ठा थे, जिन्हें संतजन योगविद्या का मूलाधार बताते हैं।
यद्यपि वृक्ष पर बैठकर भोजन मिलने की कथा कुछ लोग पलायनवाद प्रवृत्ति लग सकती है। लेकिन उस समय की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में यह कथा लोगों में ईश्वर में विश्वास रखते हुए कर्म करने के लिए प्रेरित करने के लिए थीं। यह उनके जीवन रुप प्रयोगशाला से मिला वह परिणाम था, जो दोहा के रुप में दर्ज हुआ। इसीलिए उनकी वाणी आज भी ताज़ी है। लगता है जैसे अभी-अभी किसी ने कही हो। उनका दूसरा दोहा – “हिंदू कहत हैं राम हमारा, मुसलमान रहमाना…. जाति और धर्म से परे समभाव का संदेश देता है। आज जब सोशल मीडिया पर धार्मिक और जातिगत ध्रुवीकरण अपने चरम पर है, तब मलूकदास की समभाव वृत्ति एक मनोवैज्ञानिक उपाय भी है।
जीवन के अंतिम वर्षों में संत मलूकदास अध्यात्म की चरम अवस्था में पहुँच गए थे। ‘मलूक परिचय’ के अनुसार, वे स्वयं भगवान जगन्नाथ के अंश थे। उन्होंने लोक में भक्ति का संदेश देने के लिए अवतार लिया था। अपने महाप्रयाण के समय उन्होंने शिष्यों से कहा कि उनकी देह को गंगा में प्रवाहित कर दिया जाए। संवत 1739 में उन्होंने महासमाधि ली। प्रचलित कथा है कि उनकी देह गंगा की धाराओं के साथ बहती हुई समुद्र मार्ग से जगन्नाथपुरी पहुँची। वहाँ वे स्वयं भगवान जगन्नाथ के मंदिर में प्रविष्ट हुए और प्रभु ने उन्हें अपने हृदय में स्थान दिया। आज भी उस स्थान पर उनकी सूक्ष्म उपस्थिति का अनुभव भक्त करते हैं। 108 वर्षों तक इस धरती को आलोकित करने वाले संत मलूकदास आज भी अपने दोहों के माध्यम से चेतना की ज्योति प्रज्वलित कर रहे हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

