माता रानी का बुलावा आया और अनंत यात्रा पर निकल पड़ी आशा भोसले। वैसे तो उनकी पहचान भारतीय संगीत की बहुरंगी धारा में चुलबुले, रोमांटिक और प्रयोगधर्मी गीतों के साथ जुड़ी हुई थी। पर उनके सुरमयी संसार का एक ऐसा भी पक्ष था, जहाँ उनके स्वर अध्यात्म की गहराइयों को छू जाते थे। तभी कई अवसरों पर उनके गीत गहरे आध्यात्मिक अनुभव में रूपांतरित होते प्रतीत होते थे। उनकी टीम के सदस्य अक्सर कहा करते थे कि जब वे भजन रिकॉर्ड करती थीं, तो स्टूडियो का समूचा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत होता था।
एक मर्मस्पर्शी घटना मराठी अभंग की रिकॉर्डिंग के दौरान घटी थी। वे संत तुकाराम के अभंग को गाते हुए इतनी भावुक हो गईं थीं कि उनका स्वर भर्रा गया था। बाद में उन्होंने कहा कि उन पंक्तियों में कुछ ऐसा था जो उनके भीतर तक छू गया था। जब अंतिम टेक लिया गया, तो पूरी टीम ने महसूस किया कि उस गायन में एक अलौकिक गहराई आ गई थी। वे देवी भजनों की रिकॉर्डिंग से पूर्व सभी से कुछ मिनट मौन रहने का आग्रह करती थीं। उनका मानना था कि भजन गाने से पहले मन को स्थिर करना अनिवार्य है। अन्यथा शब्द तो निकलेंगे, लेकिन भाव पीछे छूट जाएंगे। वे अपनी आँखें बंद कर पूरी तन्मयता से गाती थीं, मानो वे श्रोताओं के लिए नहीं बल्कि सीधे ईश्वर के लिए गा रही हों।
सारेगामा भक्ति द्वारा प्रस्तुत उनके भजनों का विस्तृत संग्रह उनके इसी दिव्य पक्ष का प्रमाण है। इसमें वैष्णो देवी की महिमा से लेकर गणपति की वंदना तक, श्रद्धा का एक अनूठा संगम है। ‘अम्बे तू है जगदम्बे काली’ जैसी आरतियों के बिना आज भी हमारी नवरात्र अधूरी जान पड़ती है। ‘ओ शेरोंवाली’ के ऊर्जावान स्वर हों या ‘रोम रोम में बसने वाले राम’ की सौम्यता, आशा जी ने हर शब्द को जिया है। विशेषकर मराठी संत परंपरा के अभंगों में उनकी आध्यात्मिक समझ और समर्पण देखते ही बनता है। संत ज्ञानेश्वर और तुकाराम की वाणी को उन्होंने जिस सहजता से स्वर दिया, वह उनकी गहरी आंतरिक चेतना को दर्शाता है।
सुरो की इस मल्लिका के निधन की खबर सुनते ही श्री श्री रविशंकर ने कहा, “आशा भोंसले न केवल एक दिग्गज गायिका थी, बल्कि एक अनुशासित साधक भी थी, जो अपने जीवन में आंतरिक संतुलन के लिए ध्यान और प्राणायाम करती थीं। वे बेंगलुरु स्थित आर्ट ऑफ लिविंग आश्रम में नियमित रूप से आती थीं। उनकी आध्यात्मिक निष्ठा ने उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व को एक नया आयाम दिया था। भक्ति संगीत में उनका योगदान और उनकी सक्रिय आध्यात्मिक साधना कला और आस्था का एक सामंजस्यपूर्ण मिश्रण था। यह दोहरी विरासत संगीत प्रेमियों और आध्यात्मिक साधकों दोनों को प्रेरित करती रही।”
आध्यात्मिक साधिका होने का ही नतीजा था कि उनके भक्ति गीतों में बनावटीपन का लेश मात्र भी नहीं था, और उनके स्वर सीधे भक्त के हृदय को स्पर्श करते थे। अवतार फिल्म के गीत “चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है…” को आशा जी ने अपने स्वर से जीवंत बना दिया। पद्म विभूषण और दादा साहेब फाल्के पुरस्कार जैसे सर्वोच्च सम्मानों से अलंकृत आशा जी का जाना कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। सुरों की यह साधिका अब भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन उनके भक्ति गीत सदैव गूंजते रहेंगे। भारतीय संगीत की इस महान विभूति की स्मृतियों को शत्-शत् नमन।

