पृथ्वी की गोद में जीवन का स्पंदन अनादि काल से है। तभी जिस पारिस्थितिक संतुलन की बात दुनिया भर में की जा रही है, उसकी आधारशिला भारत के ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व वैदिक सूक्तों के रुप में रख दी थी। वैदिक काल में प्रकृति केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि वह हमारे लिए वंदनीय थी। अथर्ववेद के ‘पृथ्वी सूक्त’ में कहा गया हैं कि ‘माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः’ अर्थात् यह भूमि मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूँ। इस तरह, जब हम पृथ्वी को माता मानते हैं, तो उसका दोहन करना अकल्पनीय हो जाता है। यही वजह है कि हमारा प्रकृति के साथ अटूट आत्मीय संबंध रहा है।
पृथ्वी सूक्त में कहा गया है कि सत्य, तप और यज्ञ पृथ्वी को धारण करते हैं। जब ये कमजोर पड़ते हैं, तो पृथ्वी का दोहन होता है। हिंदू परंपरा में प्रकृति का सम्मान धर्म का हिस्सा है, लेकिन पश्चिमी संस्कृति के कुप्रभाव और आधुनिक जीवनशैली के कारण हमने हमने पृथ्वी माता को सम्मान देना तो दूर, उसका दोहन करना शुरु कर दिया तो पृथ्वी के साथ ही जीवन संकट में पड़ गया। हवा, पानी और मिट्टी विषाक्त हो जाने के कारण ही सन् 1970 में अमेरिका में 20 मिलियन लोग सड़कों पर उतरे थे। वही घटना विश्व पृथ्वी दिवस का आधार बना। जाहिर है कि यह धर्म की हानि का ही परिणाम था। जब नैतिक मूल्य कमजोर होते हैं तो धर्म की हानि इतना सूक्ष्म होती है कि जब हमें उसका अहसास होता है, तब तक देर हो चुकी होती है। ‘पृथ्वी दिवस’ के रुप में वैश्विक आंदोलन पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन की भयावह चुनौतियों का जीवंत उदाहरण है।
आज का पृथ्वी की रक्षा के लिए जिन समाधानों की तलाश की जा रही है, वे हमारे आध्यात्मिक मूलों में पहले से ही विराजमान हैं। पश्चिम के लिए पर्यावरण एक बाहरी घटना हो सकती है, जिसे बचाना उत्तरजीविता के लिए आवश्यक है, किंतु भारतीय चिंतन में प्रकृति परमात्मा का ही प्रत्यक्ष स्वरूप है। वृक्षों में देवत्व, नदियों में मातृत्व और पर्वतों में स्थिरता के दर्शन करने वाली यह संस्कृति वास्तव में वैश्विक पर्यावरण संरक्षण की मूल प्रणेता रही है। अतः आज जब हम वैश्विक मंचों पर जलवायु परिवर्तन पर विमर्श करते हैं, तो हमें यह स्वीकारना होगा कि आधुनिक शब्दावलियों के आवरण में हम उसी वैदिक सत्य को पुनः खोजने का प्रयास कर रहे हैं, जो हमारे डीएनए में सदियों से रचा-बसा है।
कैसे? इस सवाल का उत्तर पाने के लिए हमें प्राचीन सनातन धर्म की आध्यात्मिक परंपरा की ओर दृष्टिपात करना होगा। तब पता चलेगा कि सनातन धर्म में पृथ्वी माता का दर्जा क्यों दिया गया और इसका संरक्षण मानवता के लिए कितना जरुरी ही नहीं अपरिहार्य है। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है कि अथर्ववेद मे प्रसिद्ध मंत्र है – “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।” यानी, भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ। यह वाक्य सनातन संस्कृति की मूल भावना को व्यक्त करता है। हम पृथ्वी के अंश हैं। इसलिए उसका शोषण नहीं, संरक्षण हमारा परम धर्म है। पुराणों में भूदेवी की कथा है। उसके मुताबिक, विष्णु भगवान ने वराह अवतार लेकर पृथ्वी को असुरों से बचाया था। इस कथा से पृथ्वी की रक्षा के महत्व का पता चलता है। तभी संत-महात्मा कहते रहे हैं कि हर दिन पृथ्वी दिवस जैसा होना चाहिए।
ऋषि अथर्वा ने अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में पृथ्वी को माता के रूप में चित्रित किया है। इसमें पृथ्वी की भौतिक और आध्यात्मिक दोनों विशेषताओं का वर्णन है। इस सूक्त में पृथ्वी को विश्वंभरा यानी सबको धारण करने वाली, वसुधानी यानी धन की खान और हिरण्यवक्षा यानी स्वर्णिम छाती वाली कहा गया है। वह पक्षी, पेड़-पौधो सहित सभी जीवों की जननी है। पृथ्वी पर विविधता है। इस पर ऊँचे-नीचे पर्वत, समतल मैदान, नानाविध ओषधियाँ। वह सबको समान रूप से पोषण देती है।
पृथ्वी की मध्य और नाभि में जो ऊर्जा है, उसकी वर्षा से हमारा जीवन धन्य होता है। यहां उस पर्जन्य या वर्षा को पिता बताया गया हैं, जिसके बिना हम जीवन की कल्पना नहीं कर सकते। वर्षा, मिट्टी और मानव का पारस्परिक संबंध, ये तमाम बातें पर्यावरण संतुलन की ओर ही इशारा करती हैं। इसलिए इसी सूक्त में अपील भी है कि हम पृथ्वी की मर्यादा न लाँघें। एक मंत्र में स्पष्ट कहा गया है – “हे भूमि! जब मैं तुझे खोदता हूँ तो शीघ्र ही वह पुनः उग आए। मैं तेरे मर्म या हृदय को आहत न करूँ।“ यह मंत्र आज के खनन, वनों की कटाई और प्रदूषण के संदर्भ में स्पष्ट संदेश है कि धरती का उपयोग तो किया जाए, लेकिन शोषण या दोहन न किया जाए।
इस बात को और भी स्पष्ट करते हुए “वसुधैव कुटुम्बकम्” के रुप में गहरा संदेश दिया गया है। अभिप्राय यह कि पृथ्वी सबकी माता है, इसलिए सब जीवों के प्रति करुणा और संरक्षण हमारा कर्तव्य है। यह मंत्र पर्यावरणीय नैतिकता की प्राचीनतम अभिव्यक्ति है। इसमें सत्य, ऋत और यज्ञ को पृथ्वी का आधार बताया गया है। सस्टेनेबल डेवलपमेंट, जैव विविधता संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन कम करने के रुप में पृथ्वी दिवस का भी तो यही संदेश है। इस तरह पृथ्वी दिवस और वैदिक दर्शन का अद्भुत समन्वय है। 1970 के पृथ्वी दिवस ने आधुनिक पर्यावरण आंदोलन की नींव रखी, जबकि पृथ्वी सूक्त हजारों वर्ष पुराना है। दोनों के संदेश में बड़ा साम्य है।
आज के समय में जब पर्यावरणीय संकट के कारण हमारे सामने चुनौतियां अनेक हैं, तो आधुनिक विज्ञान के साथ “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” का संतुलन बनाकर उसे हृदयंगम करना समय की मांग है। यदि हम अपने प्राचीन ज्ञान को समझते हुए आधुनिक जीवन में संतुलन स्थापित कर सकें, तो न केवल पृथ्वी सुरक्षित रहेगी, बल्कि मानव सभ्यता का भविष्य भी स्थिर और समृद्ध होगा। सतत विकास तभी संभव है, जब हम अपनी जीवनशैली में संयम, जिम्मेदारी और प्रकृति के प्रति सम्मान को पुनः स्थापित करें। छोटे-छोटे कदम, जैसे जल संरक्षण, वृक्षारोपण, प्लास्टिक का कम उपयोग और ऊर्जा की बचत आदि भी बड़े परिवर्तन ला सकते हैं। पृथ्वी दिवस की शुभकामनाए।

