महर्षि वाल्मीकि भले मरा…मरा.. जपते-जपते राम धुन में सुध-बुध खो बैठे और मंत्र-शक्ति से चेतना का परिष्कार हो गया। पर, उनके दिमाग में रामायण की रचना करने का ख्याल तो दूर-दूर तक नहीं था। वे तो एक ऐसे चरित्र की तलाश में थे, जो गुणवान, पराक्रमी, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवादी और दृढ़संकल्प हो। परन्तु, परिस्थितियों का निर्माण इस तरह हुआ कि रामायण लिखे जाने की पटकथा तैयार हो गई थी।
महर्षि वाल्मीकि तमसा नदी में स्नान करने गए थे। निर्मल जल और शांत वन के बीच उनकी दृष्टि प्रेमपूर्वक विचरण करते क्रौंच पक्षियों के जोड़े पर पड़ी। तभी किसी निषाद ने बाण चलाकर नर पक्षी को मार दिया। मादा क्रौंच विलाप करने लगी। उसके करुण-क्रंदन को सुनकर महर्षि वाल्मीकि का हृदय करुणा और क्षोभ से भर उठा। उनके मुख से अनायास ही संस्कृत की दो पंक्तियां निकल पड़ीं, जिसमें कहा गया था – “हे निषाद! तुम अनंत काल तक कभी भी शांति प्राप्त न कर सको, क्योंकि तुमने प्रेम में मग्न क्रौंच पक्षियों के जोड़े में से एक की बिना किसी अपराध के हत्या कर दी है।“
अनायास ही मुख से निकली इन पंक्तियों से खुद महर्षि वाल्मीकि हैरान रह गए। इसलिए कि उनका शोक चार समान चरणों वाले, गाए जा सकने वाले छंद में ढल गया था और संस्कृत-काव्य परंपरा की नई इबारत लिखी जा चुकी थी। खैर, आश्रम लौटकर महर्षि वाल्मीकि उस घटना का चिंतन कर ही रहे थे कि सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी प्रकट हो गए। उन्होंने कहा – “मेरी ही प्रेरणा से तुम्हारे मुख से यह वाणी निकली है। अब श्रीराम का संपूर्ण चरित्र रचो।“ ब्रह्मा जी ने स्पष्ट किया कि नारद जी ने जैसी राम कथा सुनाई थी, वैसी ही कथा रचो। उन्होंने यह वरदान भी दिया कि इस संदर्भ में प्रकट और अप्रकट घटनाएँ उन्हें स्वत: ज्ञात होती जाएंगी।
सवाल है कि नारद जी ने महर्षि वाल्मीकि के समक्ष श्रीराम के चरित्र का बखान क्यों किया था? दरअसल, महर्षि वाल्मीकि आदर्श मनुष्य की खोज में थे। इसलिए, उन्होंने नारद जी से सवाल किया था कि संसार में ऐसा कौन है, जो गुणवान, पराक्रमी, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवादी और दृढ़संकल्प हो? नारद जी ने उत्तर में श्रीराम का परिचय देते हुए उनका जीवनचरित संक्षेप में सुनाया था। इस तरह, रामायण ग्रंथ की रचना के साथ ही एक ऐसे मनुष्य की खोज पूरी हुई, जिसमें जीवन के श्रेष्ठ गुण एक साथ प्रकट हुए थे।
प्रकट दिवस पर आदिकवि को सादर नमन।

