युवा मन में इन दिनों अजीब-सी बेचैनी है, और उसके साथ एक गहरा विरोधाभास भी है। युवाओं का एक तबका तात्कालिक प्रलोभनों, नशे की लत और स्वार्थी तत्वों के बुने वैचारिक भ्रमजाल में उलझता दिख रहा है। जो उम्र जीवन की दिशा तय करने और राष्ट्र-निर्माण में आहुति देने की है, वह कई बार नकारात्मक नारों और दिशाहीन उग्रता की भेंट चढ़ जाती है। दूसरी ओर युवाओं का बड़ा तबका ऐसा है, जो भारतीय ज्ञान परंपराओं से जुड़कर अपनी चेतना को निखारने में लगा है। यह विरोधाभास अकारण ही नहीं है। हर व्यक्ति के अपने संचित संस्कार होते हैं। फिर परिवार, शिक्षा, संगति और समाज उन पर नई परतें चढ़ाते हैं। जिन युवाओं के शुभ संस्कार दबे रह जाते हैं, तो वे प्रलोभनों के शिकार हो कर भटक जाते हैं। इसलिए भटकाव सिर्फ व्यक्ति की कमजोरी नहीं, संस्कार निर्माण में चूक रह जाने की घोषणा है।
पर, यह भी सच है कि मनुष्य कितना भी बड़ा भोगी क्यों न हो, उसकी वासनाएँ अपने आप प्रकट नहीं होतीं। उन्हें भड़काने के लिए भी अनुकूल वातावरण और विषयों का संयोग चाहिए। कुंभकर्ण का प्रसंग इसका अद्भुत उदाहरण है। लंबी निद्रा से जागने पर उसका चित्त शांत था। रावण ने जब सीताहरण की बात बताई, तो कुंभकर्ण के मुख से पहला वाक्य निकला, “जगदम्बा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान।” अर्थात् जगदम्बा का हरण करके भी तुम अपना कल्याण चाहते हो! इतना कहकर उसने आँखें बंद कर लीं और ध्यान में डूब गया। किंतु उसके भीतर भोग और क्रोध के आसुरी संस्कार मिटे नहीं थे। वे केवल सुप्त अवस्था में पड़े थे। रावण इस बात को भलीभाँति जानता था। उसने तत्काल मदिरा के घड़े और मांस उसके सामने रखवा दिए। विषयों का संयोग होते ही भीतर सोई वासनाएँ जाग उठीं। जो व्यक्ति कुछ क्षण पहले सीता को जगदम्बा और श्रीराम को प्रभु कह रहा था, वह निहत्थे उनसे युद्ध करने निकल पड़ा।
कुंभकर्ण की कथा जहां समाप्त होती है, वहीं से स्वामी चिन्मयानंद के जीवन-दर्शन की शुरुआत होती है। यदि पारस का स्पर्श पाकर खोटा लोहा भी सोना बन जाता है, तो श्रेष्ठ संगति दुर्जन के भीतर भी परिवर्तन का बीज क्यों नहीं बो सकती? स्वामी चिन्मयानंद के मन में उपजे इसी सवाल के कारण आध्यात्मिक आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार हो गई। उन्होंने महसूस किया कि युवापीढ़ी को वैचारिक भटकाव से बचाना है, तो शिक्षा को पुनः संस्कार और सेवा से जोड़ना ही होगा। छात्रों को कक्षाओं में केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने का साधन न मानकर, उन्हें समाज के वास्तविक सुख-दुख से रूबरू कराने वाले प्रकल्पों में भागीदार बनाना होगा। दिलचस्प यह है कि वे खुद कभी संशयी युवा थे। पत्रकार बालकृष्ण मेनन 1947 में ऋषिकेश इस इरादे से गए थे कि साधुओं के पाखंड पर लिखेंगे। वहां स्वामी शिवानंद सरस्वती के सान्निध्य में उनकी दिशा ही बदल गई और बालकृष्ण मेनन से स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती बन गए। कुछ समय बाद अपने गुरू के आदेश से वेदांत शिक्षा ग्रहण करने स्वामी तपोवन महाराज के पास उत्तरकाशी चले गए थे।
आत्मानुभूति के बाद उन्होंने चिन्मय मिशन की स्थापना की औऱ श्रीमद्भगवत गीता व उपनिषदों का संदेश जन-जन तक पहुंचाने के लिए गीता ज्ञान यज्ञ का श्रीणेश किया। वेदांत दर्शन के इस महान प्रवक्ता ने अपने जीवनकाल में भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के अनेक देशों में ज्ञान की ऐसी अविरल धारा प्रवाहित की कि उन्हें लोग दूसरे स्वामी विवेकानंद कहने लगे थे। उनके लिए धर्म जीवन की चुनौतियों के बीच विवेक और साहस के साथ खड़े रहने की शक्ति का पर्याय बन चुका था। वे भली-भांति समझते थे कि युवा पीढ़ी को केवल कोरे उपदेश देकर नहीं बदला जा सकता। उसे ऐसे परिवेश की जरूरत है, जहां संस्कार स्वाभाविक रूप से जीवन का हिस्सा बन सकें। इसी सोच के साथ उन्होंने वेदांत के उदात्त सत्यों को स्कूलों, कॉलेजों और आम लोगों की दिनचर्या से जोड़ दिया।
स्वामी जी का संदेश स्पष्ट था कि सच्चा राष्ट्रप्रेम, सामाजिक समरसता और मानव सेवा कुछ और नहीं, बल्कि उपनिषदों के एकात्म-दर्शन का ही व्यावहारिक रूप हैं। उन्होंने युवाओं को एक ऐसा वैचारिक संबल दिया, जहां वे आधुनिक दुनिया में मजबूती से कदम रखते हुए भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों और जीवन-मूल्यों से गहरे जुड़े रह सकें। इस लिहाज से वेदांत को व्यक्ति और राष्ट्र निर्माण का जीवंत साधन बना देना स्वामी चिन्मयानंद का सबसे बड़ा अवदान है। चिन्मय मिशन की पावन यात्रा के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में तीन दिवसीय चिन्मय अमृत महोत्सव में इसकी झलक मिली। नई दिल्ली के भारत मंडपम में बीते 23 से 25 अक्टूबर तक आयोजित यह महासंगम स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती की शिक्षाओं को आत्मसात करने, विभिन्न पीढ़ियों पर मिशन के प्रभावों पर मनन करने और ज्ञान, सेवा तथा आंतरिक विकास के प्रति अपनी सामूहिक प्रतिबद्धता को नया संकल्प देने का अवसर बन गया।
चिन्मय अमृत महोत्सव के अंतर्गत ‘चिन्मय अमृत यात्रा’ चिन्मय आंदोलन की 75 वर्षों का विरासत का एक चलायमान उत्सव की तरह थी। बीते वर्ष 31 दिसंबर को पुणे स्थित चिन्मय विभूति से प्रारंभ 35 हजार किमी की लंबी यात्रा 295 दिनों बाद विगत 23 अक्टूबर को दिल्ली के भारत मंडपम पहुंची और उसी दिन तीन दिवसीय चिन्मय अमृत महोत्सव प्रारंभ हुआ। इस यात्रा के जरिए स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती की विरासत के प्रति न केवल सम्मान व्यक्त किया गया, बल्कि भारत की पावन भूमि में उनके संदेश, कृपा और सान्निध्य की अनुभूति को जन-जन तक पहुँचाया जा सका। इसका एक विशेष आकर्षण ‘डिजिटल यज्ञ’ था। इसमें स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती के अभिलेखागार से चुने गए प्रवचन क्षेत्रीय भाषाओं के उपशीर्षकों अथवा उन्हीं भाषाओं में स्वर देकर प्रस्तुत किए जाते थे। इससे साधकों को मानो गुरुदेव के चरणों में बैठकर उनका कालातीत मार्गदर्शन प्राप्त करने का अवसर मिलता था।
समारोह में स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती का अत्याधुनिक होलोग्राफिक स्वरूप मंच पर उपस्थित हुआ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ संवाद हुआ तो वह दृश्य भावनाओं को छू लेने वाला था। गीता और उपनिषदों का ज्ञान जनसामान्य तक पहुंचता रहे, वह आचरण में दिखाई दे और समाज की सेवा का आधार बना रहे, इस बाबत उनका संदेश “जाग्रत चेतना” की पुकार बन गया।
(लेखक योग व अध्यात्म विज्ञान विश्लेषक हैं।)

