श्रीदुर्गासप्तशती अथवा देवीमाहात्म्य शाक्त साधना-परंपरा का एक आधारभूत ग्रंथ है। इसके मंत्रों और श्लोकों में आदिशक्ति की वह गत्यात्मक चेतना प्रतिष्ठित है, जो मनुष्य की आसुरी प्रवृत्तियों का रूपांतरण कर उसके भीतर सुप्त दैवी शक्तियों को जागृत करती है। इस दृष्टि से नवरात्रि देवी की आराधना का पर्व तो है ही, आत्मशुद्धि, अंतर्जागरण और चेतना के उत्कर्ष का आध्यात्मिक अनुष्ठान भी है।
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में जगन्माता को समस्त सृष्टि की मूल शक्ति माना गया है। ऋग्वेद के देवीसूक्त में इसी विश्वव्यापी चेतना का उद्घोष है। शाक्त दृष्टि में यह वही आदिशक्ति है, जो समस्त चराचर जगत् में व्याप्त होकर सृष्टि के सृजन, पालन और संहार का संचालन करती है। सृष्टि में सक्रिय यही शक्ति मनुष्य के भीतर भी विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त होती है। जीवन की गति, संकल्प का सामर्थ्य और ज्ञान का प्रकाश उसी की अभिव्यक्तियाँ हैं।
श्रीदुर्गासप्तशती के तीन चरित्र क्रमशः महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती से संबद्ध हैं। साधना की दृष्टि से महाकाली को अज्ञान और आसुरी प्रवृत्तियों के विनाश तथा आंतरिक रूपांतरण की, महालक्ष्मी को संरक्षण, समृद्धि और सद्गुणों के पोषण की तथा महासरस्वती को ज्ञान, विवेक और आत्मप्रकाश की अधिष्ठात्री के रूप में समझा जा सकता है। ये तीन पृथक् शक्तियाँ नहीं, बल्कि एक ही विश्वमाता के दिव्य स्वरूप हैं। नवरात्रि इनकी आराधना के माध्यम से अपने भीतर की जड़ता, अशुद्धि और अज्ञान को पार करने तथा चेतना के क्रमिक परिष्कार और जागरण का महान अवसर है।
नवरात्रि के प्रथम तीन दिनों में देवी के उस प्रचंड शक्ति-स्वरूप की आराधना की जाती है, जो साधक के भीतर विद्यमान तमस, अज्ञान और आसुरी प्रवृत्तियों का संहार कर आत्मशुद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। अगले तीन दिनों में देवी की आराधना महालक्ष्मी के रूप में करके सद्गुणों और दैवी संपदा के विकास का संकल्प लिया जाता है। यहाँ समृद्धि का आशय केवल धन-संपत्ति नहीं, बल्कि जीवन को उदार, संतुलित और सार्थक बनाने वाली आंतरिक संपदा भी है। अंतिम तीन दिन महासरस्वती की उपासना के माध्यम से ज्ञान, विवेक और आत्मबोध की दिशा में आगे बढ़ने के प्रतीक हैं। उनकी कृपा से साधक के अंतःकरण में विवेक का प्रकाश उदित होता है और वह आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होता है।
लेकिन आराधना मनुष्य के भीतर ऐसा रूपांतरण कैसे लाती है? इसका उत्तर राजा सुरथ और वैश्य समाधि के प्रसंगों में सन्निहित है। नवरात्रि में जब श्रीदुर्गासप्तशती का पाठ हो रहा होता है, तो हमारा ध्यान प्रायः देवी के पराक्रम, उनके विभिन्न रूपों और अधर्म के विनाश की कथा पर टिक जाता है। राजा सुरथ और समाधि के प्रसंगों की ओर अपेक्षाकृत कम ध्यान जाता है, जबकि उनके आध्यात्मिक मायने भी बड़े गहरे हैं। राजा सुरथ अपना राज्य खो चुके हैं। सत्ता छिन गई है, मंत्री साथ छोड़ चुके हैं, सेना और कोष पर उनका अधिकार नहीं रहा। फिर भी उनका मन राज्य में ही अटका है। दूसरी तरफ समाधि हैं, जो एक संपन्न वैश्य थे। उनके अपने ही परिवार वालों ने धन के लोभ में उन्हें घर से निकाल दिया। फिर भी उनका मन उन्हीं के लिए व्याकुल रहता है।
दोनों अपनी इस उलझन का समाधान पाने के लिए मेधा ऋषि की शरण में जाते हैं। ऋषि उन्हें देवी की लीलाओं और महामाया की शक्ति से परिचित कराते हैं। वे समझाते हैं कि उसी शक्ति के प्रभाव से जीव मोह में पड़ता है और उसी की कृपा से मुक्ति का मार्ग भी खुलता है। उनके निर्देश पर दोनों श्रद्धा और भक्ति से देवी की उपासना करते हैं। अंततः देवी प्रकट होकर उन्हें इच्छानुसार वरदान देती हैं। राजा सुरथ के भीतर राज्य की पुनर्प्राप्ति की इच्छा शेष थी, जबकि समाधि संसार के प्रति विरक्त होकर ‘मैं’ और ‘मेरा’ की आसक्ति मिटाने वाला ज्ञान चाहते थे। इच्छानासार, सुरथ को राज्य की पुनर्प्राप्ति का और समाधि को ममत्व तथा अहंभाव से मुक्ति देने वाले ज्ञान का वरदान मिलता है।
सवाल है कि दोनों की साधना का स्वरूप क्या था कि उन्हें इच्छित फल प्राप्त हुआ? इसका उत्तर दुर्गासप्तशती के तेरहवें अध्याय में मिलता है। दोनों नदी के तट पर देवी की प्रतिमा बनाकर पुष्प, धूप और अग्नि में अर्पण द्वारा आराधना करते हैं। वे देवीसूक्त का जप करते हुए अपने चित्त को देवी में लगाए रखते हैं। उनकी साधना का वर्णन करते हुए ग्रंथ में श्लोक है, “निराहारौ यताहारौ तन्मनस्कौ समाहितौ।” अर्थात् वे कभी उपवास और कभी संयमित आहार करते हुए देवी में तन्मय तथा एकाग्र बने रहे। इस प्रकार उनकी उपासना में बाहरी अनुष्ठान के साथ अंतःकरण की साधना भी समाहित थी।
राजा सुरथ की कथा इस युग की कथा होती, तो संभव है कि उनकी राज्य-प्राप्ति की इच्छा को सत्तालोलुपता मान लिया जाता। पर भारतीय दर्शन में राजकर्म भी साधना ही है। जो राजधर्म का पालन करता है, उसके लिए सत्ता प्रजा के प्रति दायित्व से जुड़ी होती है। श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है, “कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।” अर्थात् जनक जैसे राजाओं ने कर्म करते हुए ही सिद्धि प्राप्त की। राजा सुरथ की मन:स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी, जबकि समाधि उस आंतरिक बंधन से मुक्त होना चाहते थे, जो मनुष्य को ‘मैं’ और ‘मेरा’ में उलझाए रखता है। देवीमाहात्म्य में भगवती को भोग और अपवर्ग, दोनों की प्रदात्री कहा गया है। इसलिए दोनों को उनकी अभिलाषा के अनुरूप वरदान मिला। एक के लिए संसार में लौटने का मार्ग खुला, दूसरे के लिए संसार के प्रति आसक्ति से मुक्त होने का।
इसलिए कहा जा सकता है कि साधना की सर्वोच्च उपलब्धि केवल इच्छाओं की पूर्ति नहीं, बल्कि इच्छाओं का परिष्कार भी है। जब साधक संसार की परिस्थितियों को बदलने से अधिक अपने भीतर के मोह और अहंकार को मिटाने की आकांक्षा करने लगता है, तब उसकी उपासना आत्मबोध की दिशा में अग्रसर होती है। यही राजा सुरथ और समाधि की कथा का एक अत्यंत गहरा यौगिक संदेश है। इस लिहाज से नवरात्रि देवी की आराधना की नौ रात्रियों का ऐसा महान उत्सव है, जब हम अपने भीतर विद्यमान दिव्य शक्ति को जागृत और जीवन को रूपांतरित कर सकते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

