रामलीला के मंच पर जब श्रीराम वनगमन के लिए निकलते हैं तो दर्शकों की आँखें भर आती हैं। भरत-मिलाप होता है, तो हजारों कंठों से जयघोष फूट पड़ता है। रामराज्याभिषेक के समय श्रद्धालु हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं। आश्चर्य यह है कि इनमें से कोई भी प्रसंग उनके लिए नया नहीं होता। वे जानते हैं कि राम वन जाएँगे, सीता का हरण होगा, हनुमान समुद्र लाँघेंगे और रावण का अंत होगा। फिर भी हर वर्ष वही कथा उन्हें उसी तीव्रता से आंदोलित करती है। आखिर ऐसी कौन-सी शक्ति है, जिसके कारण एक चिर-परिचित कथा सदियों से जीवित है और डिजिटल युग में भी उसका आकर्षण कम नहीं हुआ?
इस रहस्य को समझने के लिए भगवान शिव से जुड़े प्रसंग से बेहतर उदाहरण भला और क्या हो सकता है! रामकथा स्वयं शिव के मानस में रची-बसी थी। गोस्वामी तुलसीदास दास के मुताबिक, भगवान शिव ने रामकथा को अपने हृदय में सँजोकर रखा और उचित अवसर आने पर पार्वतीजी को सुनाया। इसके बावजूद वे रामकथा का श्रवण करने का मौका नहीं चूकते थे। फिर साधारण भक्तों के लिए वही कथा कभी पुरानी कैसे हो सकती है? दरअसल, रामकथा का आनंद यह जानने में नहीं है कि आगे क्या होगा, बल्कि उसके पात्रों के प्रेम, त्याग, करुणा और भक्ति को बार-बार अनुभव करने में है। रामलीला इसी अनुभव को जीवंत बना देती है। यही कारण है कि रामलीला केवल एक धार्मिक नाट्य-प्रस्तुति नहीं, बल्कि जनमानस में बसे रामकथा के संस्कारों को फिर से जागृत करने वाला सामूहिक आध्यात्मिक उत्सव बन गया है।
वैसे तो रामलीला भारत के अनेक राज्यों में होती है। पर, वाराणसी के रामनगर की ऐतिहासिक रामलीला की बात ही निराली है। इसके लिए पूरा नगर ही विशाल रंगमंच बन जाता है। नगर के विभिन्न स्थल अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट, पंचवटी, पंपासर और लंका बन जाते हैं। रामकथा आगे बढ़ती है तो पात्रों के साथ दर्शक भी एक स्थान से दूसरे स्थान तक चलते हैं। इस प्रकार रामनगर की रामलीला में दर्शक केवल श्रीराम की यात्रा नहीं देखते, बल्कि स्वयं भी सहयात्री बन जाते हैं। लगभग एक महीना चलने वाली इस लीला में रामजन्म से लेकर राज्याभिषेक और उत्तरकांड के प्रसंगों तक कथा का विस्तार होता है। रावण-वध इसका एक महत्वपूर्ण प्रसंग है, लेकिन विजयादशमी के साथ लीला समाप्त नहीं होती। उसका समापन रामराज्याभिषेक और उससे जुड़े अनुष्ठानों के बाद होता है।
रामनगर की रामलीला का वर्तमान भव्य स्वरूप उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में काशी नरेश उदित नारायण सिंह के संरक्षण में विकसित हुआ था। इसकी शुरुआत को लेकर कई रोचक कथाएँ प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, महाराजा चित्रकूट की रामलीला में भरत-मिलाप देखने पहुँचे, लेकिन देर हो जाने के कारण उस दृश्य से वंचित रह गए। इससे उन्हें इतनी निराशा हुई कि उन्होंने अपने नगर में ही रामलीला आयोजित कराने का संकल्प ले लिया। दूसरी जनश्रुति के अनुसार, महाराजा के पुत्र गंभीर रूप से बीमार थे तो उन्होंने रामलीला में भगवान राम बने बालक को ही श्रीराम मानकर प्रार्थना की। बालक ने अपनी माला उतारकर राजकुमार को पहनाने के लिए दी। मान्यता है कि इसके बाद राजकुमार स्वस्थ हो गए थे। इस घटना से प्रभावित होकर महाराजा ने रामनगर की रामलीला को राजकीय संरक्षण दिया और उसे भव्यता प्रदान किया।
पर, भारत में रामलीला की शुरुआत कब हुई थी? ज्यादातर विद्वान इस बात पर एकमत हैं कि चित्रकूट की रामलीला ही सबसे प्राचीन है। अमेरिकी विद्वान फिलिप लुटगेनडॉर्फ ने काशी और विशेष रुप से रामनगर की रामलीला को लेकर व्यापक अध्ययन करके “द लाइफ ऑफ अ टेक्स्ट” के नाम से पुस्तक लिखी थी। उसमें भी चित्रकूट की रामलीला को ही प्राचीनतम रामलीला बताया गया है। अब सवाल है कि रामलीला किन परिस्थितियों में किसने शुरु की? इस सवाल को लेकर काफी मत-मतांतर है। प्रचलित मान्यता और फिलिप लुटगेनडॉर्फ के मुताबिक, गोस्वामी तुलसीदास के मित्र या समकालीन मेघा भगत ने रामलीला शुरु कराई थी। जनश्रुति के अनुसार भगवान राम ने बालक रूप में प्रकट होकर मेघा भगत को छोटा धनुष और बाण प्रदान किया था। इसके बाद उन्होंने रामलीला का मंचन शुरु कराया था।
हालांकि लंबे समय से चली आ रही यह मान्यता 21वीं शताब्दी में कमजोर होती दिख रही है। भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी रहे उदय सहाय ने अपनी पुस्तक “कायस्थ इनसाक्लोपीडिया” के लिए अध्ययन किया तो दूसरी ही तस्वीर उभर कर सामने आई। उनके मुताबिक, रामचरितमानस की लोकप्रियता से कुछ रूढ़िवादी विद्वान चिढ़ गए थे। तब गोस्वामी तुलसीदास के संरक्षक टोडरमल की सलाह पर उसे जनस्मृति में सुरक्षित रखने के उद्देश्य से रामलीला को संगठित रूप दिया गया। लेकिन समय बदला, परिस्थितियां बदलीं। अब रामनगर की रामलीला जीवंतता और अनूठे प्रयोगों के कारण विश्व प्रसिद्ध हो चुकी है। इसे आधार बनाकर कई भारतीय और विदेशी लेखक पुस्तकों की रचना कर चुके हैं। उनमें राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की अध्यापिका रहीं अनुराधा कपूर की पुस्तक “एक्टर्स, पिलग्रिम्स, किंग एंड गाड्स” प्रमुख है।
काशी की अन्य रामलीलाएँ भी कम विलक्षण नहीं हैं। काशी में खोजवाँ की नक्कटैया और चेतगंज की नक्कटैया की प्रसिद्धि काफी है। हम जानते हैं कि लक्ष्मण जी ने क्रोधित होकर शूर्पणखा की नाक काट दी थी। खोजवाँ की लीला में इस दृश्य को जीवंत रूप से मंचित किया जाता है। कहा जाता है कि बाबा फतेह राम ने सन् 1887 में काशी के चेतगंज में जब इस परंपरा की नींव रखी, तो धीरे-धीरे यह खोजवाँ समेत काशी के अन्य मोहल्लों में भी प्रसिद्ध हो गई। बाद में यही आयोजन ब्रिटिश दमन के खिलाफ एक औजार बन गया था।
रामकथा से सिंचित भारतीय जनमानस में राम की स्मृति इतनी गहरी है कि जीवन की आपाधापी उसे ढँक तो देती है, पर मिटा नहीं पाती। रामलीला उस स्मृति पर पड़ी धूल हटाने का काम करती है। रामलीला की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वह एक ग्रंथ को समाज की जीवित स्मृति, सामूहिक साधना और आध्यात्मिक अनुभूति में रूपांतरित कर देती है। यूनेस्को द्वारा रामलीला को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में स्थान दिया जाना इसी जीवंत परंपरा के सांस्कृतिक महत्व की अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति है।
(लेखक योग व अध्यात्म विज्ञान विश्लेषक हैं।)

