भारत का उत्थान केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उत्थान के लिए भी है। इस देश का राष्ट्रीय जीवन उसकी आध्यात्मिक चेतना से अलग नहीं किया जा सकता। इसी कारण जब सोमनाथ पुनर्निर्माण हुआ, तो इसे भारतीय आत्मा की वापसी के रूप में देखा। सोमनाथ का पुनर्निर्माण भारतीयो लिए केवल स्थापत्य पुनर्निर्माण नहीं था, बल्कि वह पराजय की मानसिकता से मुक्ति का प्रतीक था। जहां तक ज्योर्तिलिंग का सवाल है तो योगदर्शन के मुताबिक, शिव दैवीव चेतना, मौन, तप और रूपांतरण की दिव्य शक्ति के प्रतीक हैं। इस लिहाज से सोमनाथ का बार-बार विध्वंस और पुनर्जीवन से संदेश मिलता है कि अविनाशी चेतना पलायन नहीं, बल्कि जीवन और इतिहास के भीतर दिव्यता की पुनर्स्थापना के लिए प्रेरित करती है।
तभी ग्यारह मई, 1951 औपनिवेशिक दासता की बेड़ियों से मुक्त हुए इस राष्ट्र के लिए सांस्कृतिक पुनर्जागरण का ऐतिहासिक दिवस बन गया, जब देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नवनिर्मित सोमनाथ मंदिर में ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की थी। उसी गौरवशाली दिवस के आज 75 साल पूरे हुए हैं। संयोग देखिए कि इसी वर्ष इतिहास के एक अत्यंत क्रूर और दु:खद अध्याय के भी एक हजार वर्ष पूरे हुए हैं। महमूद गजनवी ने सन् 1026 में सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण करके मंदिर ही नहीं, सुंदर नगर के वैभव का नमोनिशान मिटा देने की कोशिश की थी। यानी हम इस वर्ष विध्वंस और पुनर्निर्माण जैसी दो विपरीत स्मृतियों के साक्षी बन रहे हैं। ये दोनों घटनाएं हमारी उस अजेय जिजीविषा के प्रमाण हैं, जिसे न तो आक्रमणकारियों की तलवारें झुका सकीं थी और न ही काल-चक्र सांस्कृतिक जागरण के उस केंद्र को विस्मृत इतिहास बना सका।
सोमनाथ के पुनरुद्धार में महती भूमिका निभाने वाले कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने अपनी पुस्तक ‘सोमनाथ : द श्राइन इटर्नल’ में लिखा है कि इस आक्रमण में लगभग पचास हजार रक्षकों ने अपने प्राण दिए। ज्योतिर्लिंग को खंडित किया गया, अकूत संपदा लूटी गई। पर, यह पहला आघात भर था। इसके बाद सदियों तक ऐसा ही सिलसिला जारी रहा। बावजूद भारत की आध्यात्मिक विरासत को मिटाया नहीं जा सका। बीसवीं सदी में सरदार पटेल ने एक जनसभा में घोषणा की थी, “नए साल के इस शुभ दिन पर हमने फैसला किया है कि सोमनाथ को फिर से बनाया जाएगा। सौराष्ट्र के लोग, आप अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दें।” इसके बाद ही कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी आगे आए और इस अभियान को व्यस्थित किया था। इसलिए, प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कहा था, “जो मनुष्य की अखंड श्रद्धा और प्रेम पर आधारित हो, उसे संसार की कोई शक्ति नष्ट नहीं कर सकती।”
खैर, इस लेख का विषय सोमनाथ के आध्यात्मिक महत्वों को रेखांकित करना है, जो मानव जीवन को व्यस्थित रखने का एक महामंत्र है। पर, पहले सोमनाथ की पौराणिक कथा, जिसका उल्लेख शिव पुराण के ज्ञानसंहिता खंड और स्कंद पुराण के प्रभास खंड में विस्तार से वर्णित है। चन्द्रमा का विवाह प्रजापति दक्ष की सत्ताईस कन्याओं के साथ हुआ। चंद्रदेव इन सत्ताईस पत्नियों में से रोहिणी को अधिक चाहते थे। इससे बाकी पत्नियां दुःखी रहती थीं। प्रजापति दक्ष को इस बात की जानकारी हुई तो उन्होंने चन्द्रदेव को समझाने की कोशश की। पर उनके व्यवहार में कोई बदलाव न हुआ। तब प्रजापति दक्ष ने क्रोध में श्रॉप दे दिया कि तुम क्षय रोग से पीड़ित होओगे और एक दिन तुम गल जाओगे। इसका असर तुरंत ही दिखने लगा। चन्द्रदेव का शरीर रोगग्रस्त होकर धीरे-धीरे गलने लगा।
यह खबर देवताओं को मिली तो हाहाकार मच गया। तब ब्रह्माजी आगे आए। उन्होंने चन्द्रदेव को सलाह दी कि वे प्रभास तीर्थ जा कर वहाँ महादेव की आराधना करें। महादेव ही बचा सकते हैं। चंद्रदेव ने वैसा ही किया। प्रभास तीर्थ में शिवलिंग की स्थापना कर महामृत्युंजय आरोग्यवर्द्धक मंत्र की विधिपूर्वक साधना की। भगवान मृत्युंजय प्रसन्न हुए और उनके सामने प्रकट होकर कहा, “प्रजापति का वचन पूर्णतः निष्फल नहीं हो सकता। पर अब तुम्हारा शरीर पन्द्रह दिन तक घटेगा, पन्द्रह दिन तक बढ़ेगा।’ चन्द्रदेव को राहत मिली। उन्होंने शिव जी से विनती की, ‘आप मेरे इष्ट बनकर उसी विग्रह में प्रवेश कर जाइए, जहाँ पर मैंने आपकी आराधना की है।’ शिव जी ने ‘तथास्तु’ कह दिया, और उस समय से भगवान सोमेश्वर के नाम से भी जाने जाते हैं।
अब इस कथा के आध्यात्मिक पक्षों पर गौर करें तो कहना होगा कि सोमनाथ के रुप में शिव का प्रकट हो जाना किसी आध्यात्मिक प्रयोग के परिणाम की तरह है। ‘सोम’ यानी चंद्रमा, जो हमारे मन का अधिपति है। भगवान शिव ने इस चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण किया है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि जब साधक अपने चंचल मन को शांत कर उसे आत्म-तत्व में विलीन कर देता है, तो उसे शिवत्व की प्राप्ति होती है और वह श्रापमुक्त हो जाता है। चंद्रमा की कलाओ से हमें शिक्षा मिलती है कि जैसे चंद्रमा घटता है, पर समाप्त नहीं होता और बढ़ता है, पर स्थिर नहीं रहता, वैसे ही जीवन के सुख-दु:ख भी क्षणभंगुर हैं। हमें जब इस बात का ज्ञान हो जाता है कि हम मन (चंद्रमा) नहीं, बल्कि उसे धारण करने वाले चैतन्य (शिव) हैं, तो जीवन के द्वंद्वों से मुक्ति मिलती है और मानसिक शांति प्राप्त होती है।
इस तरह चंद्रमा को दक्ष का श्राप, उनकी कांति का क्षरण, फिर शिव की शरण में जाना और कांति का पुनः प्राप्त होना महज पौराणिक कथा मात्र नहीं है। इसे मन का विज्ञान कहना ज्यादा उपयुक्त होगा। मन जब आसक्ति (रोहिणी से ज्यादा प्यार) में डूब जाता है, तो वह श्रापित हो जाता है और अपनी ऊर्जा खो देता है। पर, मंत्र की शक्ति इतनी है कि वही मन जब महामृत्युंजय मंत्र के साथ शिव की आराधना करता है, तो उसे मुक्ति मिलती है। यही कारण है कि सोमनाथ में शिव ‘सोम के नाथ’ यानी मन के स्वामी के रुप में विराजमान हैं। इस प्रसंग से मानसिक स्वास्थ्य और आंतरिक संतुलन की एक नई और गहरी समझ मिलती है। इस लिहाज से भी सोमनाथ केवल अतीत की स्मृति नहीं है, बल्कि वह भविष्य की प्रेरणा है। आइए, हम सब भी ‘सोमनाथ अमृत महोत्सव’ जैसे गौरवशाली क्षण का हिस्सा बने।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

