प्राण शक्ति और चित्त शक्ति, इन्हीं दो मूल सिद्धांतों पर ब्रह्मांड की रचना टिकी है। ये दोनों अलग-अलग भले दिखते हैं, परंतु वास्तव में ये एक ही सत्ता के दो विपरीत ध्रुव हैं। इसी कारण प्राण के स्तर को बदलकर चेतना की अवस्था बदली जा सकती है, और चेतना के परिवर्तन से प्राण में भी परिवर्तन संभव है।
तंत्र विज्ञान में स्पष्ट कहा गया है कि चेतना का विस्तार तभी होता है, जब ऊर्जा मुक्त होती है। चाहे हज़ार वर्षों तक ध्यान किया जाए, यदि प्राण ऊर्जा जाग्रत न हो तो चेतना का विकास असंभव है। आधुनिक मनोविज्ञान इस रहस्य से अनभिज्ञ है। पर, तंत्रशास्त्र में स्पष्ट किया गया है कि प्राण का जागरण ही पराचेतना की कुंजी है। सवाल है कि शरीर में विद्यमान इस अपार ऊर्जा को कैसे मुक्त किया जाए? जबाव होगा – जिस प्रकार वैज्ञानिकों ने परमाणु से नाभिकीय ऊर्जा निकाली, उसी प्रकार। यानी, तंत्र या प्राण विद्या की बदौलत शरीर में सुप्त प्राण शक्ति को जाग्रत किया जा सकता है।
दरअसल, प्राणिक ऊर्जा और शारीरिक स्वास्थ्य के बीच अटूट रिश्ता है। “प्राण औऱ प्राणायाम” पुस्तक के मुताबिक, अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. वैलेरी हंट ने शोध करके साबित कर दिया था कि प्राणिक शरीर या आभामंडल कोई काल्पनिक अवधारणा नहीं, बल्कि एक मापनीय ऊर्जा क्षेत्र है, जिसका सीधा संबंध हमारे शारीरिक स्वास्थ्य से है। शोध से पता चला कि पूर्णतः स्वस्थ व्यक्तियों की जैव-ऊर्जा संतुलित, सुसंगत और समन्वित होती है, जबकि बीमार या आसन्न बीमारी वालों में यह ऊर्जा या तो अपर्याप्त या फिर अत्यधिक उत्तेजित होती है।
प्रयोग के दौरान देखा गया कि आभामंडल की यह ऊर्जा स्नायु तंत्र के संकेतों से हज़ार गुना अधिक तीव्र थी। फिर भी शरीर की मनो-भावनात्मक स्थिति के साथ तुरंत तालमेल बिठाती थी। इस खोज से सदियों पुरानी पारंपरिक उपचार पद्धतियों, जैसे रंग-ध्वनि चिकित्सा, एक्यूपंक्चर, होमियोपैथी और मालिश को वैज्ञानिक आधार मिला, क्योंकि ये सभी विधियाँ प्राणिक ऊर्जा को पुनः संतुलित करके शारीरिक रोगों को दूर करती हैं। मतलब, हमारा स्वास्थ्य पहले ऊर्जा स्तर पर बिगड़ता है, फिर शरीर में। इसलिए प्राणिक संतुलन को समग्र स्वास्थ्य की वास्तविक कुंजी कहा गया है।
उपनिषदों में कहा गया है कि समस्त सृष्टि प्राण से ही उत्पन्न होती है और अंततः प्राण में ही विलीन हो जाती है। प्रश्नोपनिषद में तो प्राण को प्रजापति और समस्त प्राणियों का मूल आधार तक कहा गया है। मनुष्य केवल हाड़-मांस का पुतला नहीं, बल्कि ऊर्जा का गतिशील प्रवाह है, जहाँ स्थूल देह के भीतर प्राणमय कोश, नाड़ियों और चक्रों के माध्यम से इस शक्ति का निरंतर संचार होता रहता है। प्रश्नोपनिषद और छांदोग्य उपनिषद में प्राण की इसी महत्ता की गहन व्याख्या मिलती है। इसे बिहार योग विद्यालय के परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती एक सुंदर कथा के माध्यम से स्पष्ट करते हैं।
कथा है कि एक बार शरीर में वास करने वाले पंचमहाभूतों, वाणी और मन के बीच इस बात को लेकर विवाद छिड़ गया कि इस देह का वास्तविक आधार कौन है। प्रत्येक शक्ति स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मान रही थी। उनकी इस बहस को शांत भाव से सुन रहे प्राण ने सहजता से कहा कि तुम सब व्यर्थ के भ्रम में पड़े हो। मैं ही स्वयं को पाँच रूपों में बाँटकर इस पूरे देह-रूपी भवन को थामे हुए हूँ और मेरे बिना तुम्हारा कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। किसी को विश्वास नहीं हुआ। इस पर प्राण ने जैसे ही शरीर से ऊपर उठना शुरू किया, इंद्रियों की शक्ति लुप्त होने लगी, वाणी मौन हो गई और मन स्तब्ध रह गया। देह को निस्तेज होते देख सबका अहंकार टूट गया और उन्हें तत्काल बोध हुआ कि उनका अस्तित्व केवल प्राण की उपस्थिति से ही संभव है। जब सबने प्राण की श्रेष्ठता स्वीकार कर समर्पण किया, तभी देह में पुनः जीवन और चेतना लौट सकी।
शरीर में स्थित पंचप्राणों में प्राण-वायु का मुख्य क्षेत्र हृदय और वक्षस्थल है, जिसकी गति अंतर्मुखी और ऊर्ध्वगामी होती है। सूक्ष्म दृष्टि से यह वह ग्राहक शक्ति है, जो बाहर के जगत को भीतर खींचती है। भोजन का ग्रास निगलना, फेफड़ों में श्वास भरना, आँखों से दृश्य और कानों से शब्द ग्रहण करना, यह सब उसी ग्रह्य शक्ति की क्रिया का परिणाम होता है। इस तरह समझा जा सकता है कि प्राण-ऊर्जा जन्म से मिली कोई स्थिर पूँजी नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत प्रवाह है, जो हमारे दैनिक आचरण, चिंतन और जीवनशैली के अनुरूप निरंतर घटता या बढ़ता रहता है।
दैनिक आचरण, चिंतन और जीवनशैली सही न हो तो प्राणिक क्षेत्र में अवरोध उत्पन्न होता है और वह समय के साथ मजबूत होता जाता है। जैसे अहंकार-प्रेरित व्यवहार से मणिपुर और अनाहत के क्षेत्र में गाँठ बनता है, और हर बार वही व्यवहार होने से उस गाँठ को मजबूती मिलती जाती है। प्राण ऐसे अवरुद्ध क्षेत्र से किनारा करके दूसरी राह पकड़ लेता है। परिणाम होता है कि वह क्षेत्र ऊर्जा से वंचित होकर और दुर्बल होता जाता है, और यही दुर्बलता आगे चलकर अन्नमय कोश में, यानी स्थूल शरीर में, रोग बनकर उभर सकती है।
इसीलिए इस ऊर्जा को पुनः संतुलित करने के लिए प्राणायाम, छाती का विस्तार करने वाले योगासन यथा भुजंगासन व मत्स्यासन और डिजिटल स्क्रीन से थोड़ी दूरी यानी डिजिटल उपवास अत्यंत प्रभावी साधन हैं। ये उपाय मन के द्वार पर विवेक का पहरा बिठाने के समान है। इससे प्राण का क्षय रुकता है। जीवनी-शक्ति संचित होती है। नतीजतन, जीवन में स्पष्टता, और नई चेतना का संचार होता है। योग की दृष्टि प्राणायाम केवल श्वास की तकनीक नहीं, प्राणिक शरीर के शुद्धिकरण की साधना है। जब साधक धीमे और गहरे श्वसन के साथ नाड़ीशोधन करता है, तो प्राण किसी एक क्षेत्र तक सिमटा न रहकर पूरे नाड़ी-तंत्र में संतुलित रूप से बहने लगता है। ठप पड़ा ऊर्जा-परिपथ फिर सक्रिय होता है और दुर्बल हुए क्षेत्र धीरे-धीरे अपनी शक्ति लौटा पाते हैं।
इस तरह, कहना होगा कि प्राण जीवन की गति है, चित्त उस गति की दिशा है और साधना उस दिशा को जागरूक बनाने की प्रक्रिया है। प्राण को असंतुलित छोड़ दिया जाए तो जीवन बाहर की उत्तेजनाओं में बिखरता है। प्राण को साध लिया जाए तो वही ऊर्जा भीतर की ओर मुड़कर चित्त को स्थिर, सजग और अंततः आत्मबोध के योग्य बनाती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

