बीसवीं सदी के महान संत परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी तथा विश्व प्रसिद्ध बिहार योग विद्यालय के परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती की “भारत योग यात्रा – 2026” योग विद्या के वर्तमान व्यावसायिक स्वरूप से अलग प्राचीन विद्या के वास्तविक और शुद्ध रूप को पुनर्स्थापित करने का एक प्रयास है। इसे बिहार योग परंपरा या सत्यानंद योग परंपरा में “योग का द्वितीय अध्याय” के रुप में जाना जाता है।
योग का द्वितीय अध्याय केवल एक नया चरण नहीं है; यह योग का पुनर्जनन है। हम जानते हैं कि बिहार योग विद्यालय बीसवीं सदी के महान संत परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती की प्रेरणा, समर्पण, और बलिदान का प्रतीक है। उनका सपना था कि एक ऐसी संस्कृति का निर्माण हो, जो मानव चेतना को नई ऊँचाइयों तक ले जाए। योग के द्वितीय अध्याय के रुप में उनका सपना नया आकार ले चुका है। बिहार योग विद्यालय के परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती की मौजूदा योग-यात्रा को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव दिल्ली का त्यागराज स्टेडियम होगा, जहां वे आगामी 1 मई से लेकर 3 मई तक बिहार योग परंपरा की शिक्षाओं पर आधारित योग विद्या व्यावहारिक ज्ञान देंगे। दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लोगों के लिए बहुमूल्य सत्यम् योग प्रसाद ग्रहण करने का यह महान अवसर है।
हर महान यात्रा में एक नया मोड़ आता है। योग के द्वितीय अध्याय के रुप में वह मोड़ आ चुका है, जो अभी-अभी अपने प्रारंभिक कदमों के साथ विश्व के सामने उभर रहा है। जब भगवान राम को वनवास का आदेश मिला था, तो वह एक मोड़ था, नया अध्याय था, जो उन्हें राजसुख छोड़कर सत्य, धर्म और सेवा के पथ पर ले गया। उनकी यह यात्रा केवल व्यक्तिगत त्याग की नहीं, बल्कि समाज के कल्याण और अधर्म पर धर्म की विजय की थी। इसी तरह योग के मामले में भी एक नया मोड़ आया तो नए अध्याय की शुरुआत हो गई। यह शुरुआत आधुनिक भारत के वैज्ञानिक संत और विश्व प्रसिद्ध बिहार योग विद्यालय के संस्थापक परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती की प्रेरणा से हुई है।
वैदिक योग का यह परिमार्जित स्वरूप योग को केवल शारीरिक अभ्यास तक सीमित नहीं रहने देता, बल्कि इस गहन विद्या के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन का मशाल प्रज्ज्वलित करता है। जैसे श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समाज के प्रति उसके कर्तव्य का बोध कराया, वैसे ही यह नया अध्याय हमें आज के विश्व की चुनौतियों, जैसे तनाव, असंतुलन, और दिशाहीनता का जवाब बनने को प्रेरित करता है। यह अध्याय कर्म, भक्ति, ज्ञान और राज योग का समन्वय है, जो हर व्यक्ति को सत्यम् (सत्य की खोज), शिवम् (शुभता का आलिंगन), और सुंदरम् (जीवन का सौंदर्य) से जोड़ता है। परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती कहते हैं, “समय की मांग है कि योग के अभ्यासों को अधिक गहन एवं व्यापक बनाया जाए। ताकि विचारों, व्यवहारों और कर्मों को रूपांतरित किया जा सके।“
हालांकि पूरी दुनिया में जिस योग की धूम मची हुई है, वह उस योग से भिन्न है, जिसकी परिकल्पना उन्नीसवीं-बीसवीं संतों ने की थी। योग का वैदिक स्वरुप तो इससे भी अलग था। वैदिक काल में, योग केवल संन्यासियों की गुफाओं में साधना का विषय होता था। यह एक ऐसी विद्या थी, जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ती थी, मन को शांति और शरीर को संतुलन देती थी। पर, समय के साथ योग विद्या का यह रहस्य गुफाओं से निकलकर परिमार्जित रूप में विश्व के हर कोने में फैल गया। स्वामी शिवानंद सरस्वती, स्वामी कुवलयानंद, स्वामी सत्यानंद सरस्वती जैसे समन्वित योग के प्रवर्तकों ने देशकाल को ध्यान में रखकर मानव के कल्याण के लिए शास्त्रानुकूल, परन्तु वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर योग विधियां विकसित की थीं। पर, आज दुनिया भर में योग के नाम पर जो दुकानदारी चल रही है, वह हठयोग का विकृत रूप भर है।
यह संतोष का विषय है कि, जिस तरह बिहार योग विद्यालय और कैवल्यधाम जैसे पारंपरिक योग विद्या के संस्थान हिमालय की तरह पूरी दृढ़ता के साथ खड़े हैं, उसी तरह ऐसे योगाभ्यासियों की संख्या भी कम नहीं, जो योगाभ्यास तक सीमित न रहकर योगसाधक बनना चाहते हैं। योग का द्वितीय अध्याय ऐसे ही अभ्यासियों के लिए है। दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम के संयोजक स्वामी शिवराजानंद सरस्वती कहते हैं, “बिना मन को बदले संसार में सुख खोजना मृगतृष्णा है।” योग दर्शन के मुताबिक, सुख और दुःख मन की अवस्थाएँ हैं। मन को संस्कारों, आसक्तियों और विक्षेपों से मुक्त किए बिना सुख पाने की कल्पना नहीं की जा सकती। कष्टों से मुक्ति की प्रतीति भले होती रहे, पर अंतत: दुःख और निराशा हाथ लगेगी। जैसे गर्म रेत में प्रकाश के अपवर्तन से पानी दिखता है। वैसे ही, अशांत मन में वासनाओं व कामनाओं के विक्षेपों के कारण संसार के साधारण पदार्थों में सुख का भ्रम होता है। यही है मृगतृष्णा।
महर्षि पतंजलि के योगसूत्र में कहा गया है कि मन के सूक्ष्म संस्कार ही इस भ्रम को बनाए रखते हैं। जब तक इन संस्कारों का नाश (निरोध या ध्यान द्वारा उत्कट वैराग्य) न हो, बाहरी सुख के पीछे दौड़ना व्यर्थ है। इसलिए योग का मार्ग बाह्य सुख छोड़ने का नहीं, अपितु आंतरिक परिवर्तन द्वारा सुख के स्रोत को ही पलट देने का है। जब मन बदल जाता है, तो संसार ही आनंदमय लगने लगता है। यही योग का अद्भुत परिणाम है। श्रीमद्भगवत गीता में भी घोषणा है – यत्रोपरमते चित्तं… सुखमात्यन्तिकं यत्तत्। अर्थात जहाँ चित्त शांत हो जाता है, वहाँ असीम सुख प्राप्त होता है, जो इन्द्रिय सुख से अतुलनीय है।
आधुनिक युग में समग्र योग रुपी सत्यम् योग प्रसाद में यह तत्व भी समाहित है, जिसे जन–जन तक पहुँचाने के लिए श्री स्वामी निरंजनानन्द सरस्वती अपनी भारत योग यात्रा के क्रम में नई दिल्ली पधारने वाले हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्रवेश निःशुल्क है। ऐसे समय में जब एक घंटे की योगा क्लास के लिए सैकड़ों रुपये चुकाने पड़ते हैं। वैसे में इस आयोजन का एक गहरा संदेश भी है कि योग-ज्ञान किसी विशेष वर्ग की थाती नहीं, बल्कि समाज की साझी विरासत है। इसलिए, इस नि:शुल्क कार्यक्रम में भाग लेकर कोई भी अपने जीवन को संवारने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

