Author: Kishore Kumar

Spiritual journalist & Founding Editor of Ushakaal.com

भारतीय अध्यात्म की समृद्ध परंपरा में ऐसे ग्रंथ हैं, जिन्हें मनुष्य के भीतर छिपे रहस्यों की कुंजी कहा जाना चाहिए। मार्कंडेय पुराण का श्रीदुर्गासप्तशती उन्हीं में एक प्रमुख ग्रंथ है। अक्सर लोग इसमें वर्णित कथा को केवल देवी और असुरों के युद्ध की पौराणिक या ऐतिहासिक कथा मान लेते हैं। लेकिन गहराई से पड़ताल करें, तो पता चलता है कि यह मानव चेतना के तेरह चरणों का ब्रह्मांडीय आध्यात्मिक विज्ञान है। इसमें वर्णित सात सौ श्लोक असल में हमारे मन की परतों को खोलते हुए उसे ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जोड़ने का काम करते हैं। इस लिहाज से देवी और असुरों…

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भारतीय परंपरा में योग आत्मानुशासन और आत्मबोध की साधना के रूप में पल्लवित-पुष्पित होता रहा है। पर, उसे सीमित स्वरूप देकर आज दुनिया भर के जिम और स्टूडियो में एक ग्लैमरस वर्कआउट के तौर पर प्रस्तुत किया जाने लगा है। नतीजतन, षट्कर्म रूपी मानव शरीर के आंतरिक शोधन का मूल विज्ञान हाशिए पर जा चुका है। भारतीय यौगिक दर्शन में इसे ‘घटाकाश’ के अद्भुत रूपक से समझाया गया है। घटाकाश का अर्थ है कि घड़े के भीतर भी वही अनंत आकाश है, जो बाहर व्याप्त है। यहाँ घड़ा हमारा शरीर है और उसके भीतर का आकाश हमारी जीवात्मा। जब मिट्टी…

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भारतीय संस्कृति में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि यह आत्मा के परमात्मा से मिलन और अहंकार के विसर्जन का एक महान अनुष्ठान है। ब्रज की पावन रज में जब अबीर-गुलाल की बौछार होती है, तो वह केवल बाहरी चकाचौंध नहीं होती, बल्कि उसके भीतर भक्ति का एक ऐसा अनहद नाद छिपा होता है, जो साधक को भीतर तक झंकृत कर देता है।भक्तशिरोमणि सूरदास से जुड़ी एक अर्थपूर्ण लोककथा से इस बात को समझा जा सकता है। रंगोत्सव का समय था। कुछ भक्तों को विनोदवश विचार आया कि क्यों न सूरदास जी रंग दिया जाए। लिहाजा, वे उनके पास…

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परिवर्तन संसार का नियम है। भारत अभी दुनिया का सबसे ‘युवा’ देश है। पर, दो दशकों बाद तस्वीर ऐसी ही नहीं होगी। भविष्य की कोख में एक मौन संकट आकार ले रहा है। अगले दो दशकों में बुजुर्गों की संख्या लगभग बारह फीसदी से बढ़कर चौबीस फीसदी तक पहुंच कर हमारे सामाजिक ढांचे की अग्निपरीक्षा ले रही होगी। परिस्थिति न बदली तो देश में बीमार और लाचार वृद्धों की एक विशाल फौज होगी। उनमें स्मृतियों का क्षय करने वाले डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसे रोगों के साथ ही उच्च रक्तचाप, मधुमेह और कैंसर जैसी जानलेवा व्याधियां विकराल रुप धारण कर चुकी…

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छत्रपति शिवाजी महाराज और समर्थ रामदास के बीच का यह प्रसंग भक्ति, समर्पण और कर्तव्य की पराकाष्ठा है कि कैसे एक महान शासक ने अपना संपूर्ण राज्य अपने गुरु के चरणों में अर्पित कर दिया और गुरु ने उसे राजधर्म का पाठ पढ़ाकर लोक कल्याण के मार्ग पर प्रशस्त किया। प्रस्तुत कथा श्रीहनुमान के अवतार के रुप में प्रसिद्ध समर्थ रामदास पर आधारित माधवराव सप्रे की पुस्तक “दासबोध” पर आधारित है, जिसमें समर्थ रामदास और शिवा जी महाराज के बीच प्रेरक संवाद है।कथा है कि एक दिन समर्थ माहुली-संगम पर स्नान-संध्या करके भिक्षा माँगते हुए शिवाजी के महल में पहुंच…

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हमने अभी-अभी महाशिवरात्रि मनाई। शिव-शक्ति के मिलन का आध्यात्मिक मर्म और भोलेनाथ के नीलकंठ स्वरुप का निहितार्थ समझा। अब दो दिनों बाद ही यानी अठारह फरवरी को उन्नीसवीं सदी के महान संत श्रीरामकृष्ण परमहंस की जयंती है। उन्हें भी आधुनिक युग का नीलकंठ कहा गया है। उन्होंने संसार की वैचारिक कट्टरता और कलह का विष पीकर “ईश्वर एक है’ की उद्घोषणा के रुप में अमृत प्रदान किया था। धर्मों की सारभूत एकता वाले इस संदेश के जरिए साबित किया कि “महोपनिषद्” में वर्णित “वसुधैव कुटुंबकम्” सार्वभौमिक बंधुत्व का बीज मंत्र है। उनके दिव्य गुणों के कारण ही कहा गया कि…

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किशोर कुमार // योग की बेहतर शिक्षा किस देश में और वहां के किन संस्थानों में लेनी चाहिए? यदि इंग्लैंड सहित दुनिया के विभिन्न देशों से प्रकाशित अखबार “द गार्जियन” से जानना चाहेंगे तो भारत के बिहार योग विद्यालय का नाम सबसे पहले बताया जाएगा। चूंकि ऐसा सवाल पश्चिमी देशों में आम है। इसलिए “द गार्जियन” ने लेख ही प्रकाशित कर दिया। उसमें भारत के दस श्रेष्ठ योग संस्थानों के नाम गिनाए गए हैं। बिहार योग विद्यालय का नाम सबसे ऊपर है। इस विश्वव्यापी योग संस्थान के संस्थापक परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती की समाधि के दस साल होने को हैं। फिर भी बिहार योग का आकर्षण…

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दुनिया भर में वेलेंटाइन वीक की धूम है। रोमांटिक शेर ओ शायरी से सोशल मीडिया अंटा पड़ा है। प्रेम का संदेश देने वाले भारतीय सूफी संत परंपरा के महान कवि बुल्लेशाह के प्रेम के रंग में रंगे दोहे भी सोशल मीडिया पर साझा किए जा रहे हैं। पचास साल पहले सुप्रसिद्ध भजन गायक नरेंद्र चंचल द्वारा राजकपूर की फिल्म “बॉबी” के लिए गाया गया गीत बैकग्राउंड में बज रहा है – बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो, बुल्लेशाह वे कहते। पर प्यार भरा दिल कभी न तोड़ो, इस दिल में दिलबर रहता…। हमें फिल्म का संदर्भ याद रह गया, गीत के बोल याद रह गए। पर…

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महाशिवरात्रि का पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि इसमें मानसिक उद्वेगों और बिखरते रिश्तों को संभालने का एक गहरा मनोवैज्ञानिक सूत्र अंतर्निहित है। पर, हम सब इस महान अवसर को सजगता के अभाव में यूं ही हाथों से जाने देते हैं। शिवरात्रि वाली सुबह से लेकर रात तक हर तरफ ‘हर-हर महादेव’ और ‘ॐ नमः शिवाय’ के उद्घोष से आकाश गुंजायमान होता है। भव्य शिव बारात के दौरान देवों से लेकर गणों तक की जीवंत झांकियों के साथ शंखों की ध्वनि और डमरू की थाप पर झूमते भक्तों के कारण अद्भुत उत्सवी माहौल बनता है। पर, हम इस शिवमय…

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भक्ति की पावन गंगा जब हृदय की कंदराओं से फूटती है तो वह ऊंच-नीच, जाति-कुल और शास्त्र-ज्ञान की समस्त सीमाओं को लांघकर सीधे परम तत्व में विलीन हो जाती है। शबरी माता का जीवन इसी आध्यात्मिक लोकतंत्र का वह जीवंत दस्तावेज है, जो सदियों से मनुष्यता को सिखा रहा है कि ईश्वर किसी मंदिर की चारदीवारी या जटिल कर्मकांडों में नहीं, बल्कि भक्त के निश्छल अनुराग और अटूट प्रतीक्षा में निवास करता है। आज के इस भागदौड़ भरे और दिखावे वाली दुनिया में शबरी जयंती केवल एक पौराणिक कथा का स्मरण मात्र नहीं है, बल्कि यह अंतर्मन की शुचिता और…

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