प्राचीनकाल में ऋषि-मुनियों ने शरीर को ‘व्याधिमंदिरम्’ यानी रोगों का घर बताते हुए चेतावनी दी थी कि योग के जरिए उसे इस तरह साधो कि वही शरीर ‘धर्मसाधनम्’ बन जाए। इसलिए कि जीवन का अंतिम लक्ष्य यही है। पर, हमने क्या किया? अतर्यात्रा से मुख मोड़कर बर्हिर्यात्रा शुरु की और इंदियों के दास बन गए। नतीजतन, जिस शरीर को धर्मसाधनम् बनना था, वह व्याधिमंदिरम् बनकर रह गया है। पर, हमरा जीवन कैसा है? हमने भागदौड़ भरी जिंदगी में दवाओं को ‘शॉर्टकट’ मान लिया है। शरीर में जरा-सा दर्द हुआ नहीं कि हमने गोली निगल ली। संकट यही से शुरु होता है। हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता नष्ट होती है। एंटीबायोटिक प्रतिरोध के कारण आज जो वैश्विक संकट है, उसी का परिणाम है। योगशास्त्र से हमें शिक्षा मिलती है कि शरीर के भीतर एक अत्यंत सूक्ष्म और शक्तिशाली रक्षा तंत्र मौजूद है, जिसे सक्रिय कर दिया जाए तो यह शरीर रोगाणुओं के लिए अभेद्य दुर्ग बन जा सकता है।
थोड़ा विस्तार से समझिए। संस्कृत सूक्ति-परंपरा में कहा गया है – कलेवरं व्याधिमंदिरम्। यानी, यह शरीर रोगों का घर है। चरक संहिता में कहा गया है कि शरीर त्रिदोष यानी वात, पित्त और कफ का आश्रय है और इनके असंतुलन से रोग उत्पन्न होते हैं। आदिगुरु शंकराचार्य से लेकर भर्तृहरि के वैराग्य-शतक तक में शरीर की क्षणभंगुरता को लेकर जो छंद हैं, उनकी मूल भावना ‘कलेवरं व्याधिमंदिरम्’ से मेल खाती हुई है। दूसरी तरफ, कालिदास रचित महाकाव्य कुमारसंभव में सूक्त है – “शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।” इस सूक्त की रचना के पीछे शिव-पार्वती से जुड़ी एक कथा है, जिसमें शिव जी माता पार्वती से कहते हैं कि इस शरीर की सीमाओं के भीतर रहकर की गई साधना सबसे बड़ा धर्म है। भारतीय दर्शन में भी जो चार पुरुषार्थ बताए गए हैं, उनमें धर्म प्रथम है। उसके बाद ही अर्थ, काम और मोक्ष का स्थान है और ये सभी पुरुषार्थ इस शरीर से ही संभव है।
तो क्या ये दोनों बातें विरोधाभासी हैं? नहीं। योगियों का मत है कि ये दोनों मिलकर एक संपूर्ण दर्शन बनाते हैं और संदेश मिलता है कि नाशवान शरीर ही धर्म का साधन है, इसीलिए इसे यौगिक क्रियाओँ द्वारा सजग होकर साधो। इस लिहाज से उपरोक्त दोनों मंत्र योग, आयुर्वेद और आधुनिक वेलनेस की पूरी अवधारणा के बीज-मंत्र हैं। यौगिक चर्चा पर आगे बढ़ने से पहले कल्पना कीजिए कि किसी को ऐसी बीमारी है, जिसके उपचार के लिए चिकित्सक एंटीबायोटिक् दवा देते हैं। पर, वह दवा काम नहीं करती। इस क्रम में एक दिन ऐसा भी आता है, जब चिकित्सक को कोई उपाय नहीं सूझता और वे चुप हो जाते हैं। यह कोई डरावनी कहानी नहीं है, बल्कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की हालिया रिपोर्ट ऐसा सोचने के लिए हमें बाध्य कर रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एंटीबायोटिक प्रतिरोध को वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर दिया है। इसके साथ ही अनुमान लगाया गया है कि सन् 2050 तक हर साल बीस लाख से अधिक लोगों की मौत एंटीबायोटिक्स के निष्प्रभावी होने से हो सकती हैं।
बैक्टीरिया जीत रहे हैं और एंटीबायोटिक्स हार रहे हैं। आखिर क्यों? बैक्टीरिया रक्तबीज की तरह है। एक को मारो तो उन जैसे दस जन्म ले लेते हैं। पर, एंटीबायोटिक्स के पास कोई दैवी या प्राकृतिक शक्ति तो है नहीं। लिहाजा उसकी हार हो जाती है। लेकिन क्या समस्या केवल बैक्टीरिया की ताकत में है? गहराई से देखें तो पता चलता है कि समस्या हमारे शरीर की भीतर कमजोर होती रक्षा प्रणाली में भी है। आधुनिक जीवनशैली ने हमें तनाव, नींद की कमी और प्रदूषित वातावरण का उपहार दिया है। नतीजतन, हमारा इम्यून सिस्टम भीतर से खोखला हो रहा है।
यहीं पर योग की भूमिका एक वैज्ञानिक रक्षक के रूप में उभरती है। योग केवल शारीरिक व्यायाम या कुछ मुद्राओं का समूह नहीं है, बल्कि यह वह विज्ञान है, जो शरीर की आंतरिक बुद्धिमत्ता को सक्रिय करता है। पिछले दो दशकों में हुए अंतरराष्ट्रीय शोधों ने यह सिद्ध किया है कि योग शरीर में सूक्ष्म स्तर पर काम करता है। अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ और हार्वर्ड जैसे संस्थानों ने पाया है कि नियमित योगाभ्यास शरीर में पुरानी सूजन को कम करता है और ‘नेचुरल किलर सेल्स’ की संख्या को बढ़ाता है। ये कोशिकाएं ही शरीर के वे सिपाही हैं, जो किसी भी बाहरी संक्रमण से लोहा लेती हैं।
बिहार योग विद्यालय के संस्थापक परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के मार्गदर्शन में आस्ट्रेलिया मूल के डॉ. स्वामी कर्मानंद सरस्वती ने एक पुस्तक लिखी थी – “रोग और योग।” इसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता या प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने के लिए शरीर की प्राण ऊर्जा और आंतरिक संतुलन को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया है। इसके लिए योगासनों में सूर्यनमस्कार को महत्वपूर्ण माना गया है। यह संपूर्ण शारीरिक तंत्र को पुनर्जीवित कर तनाव दूर करता है और पिंगला नाड़ी में प्रवाह बढ़ाकर प्राणिक ऊर्जा उत्पन्न करता है। सूर्य नमस्कार के साथ सूर्यभेदी प्राणायाम का अभ्यास पिंगला नाड़ी के माध्यम से शरीर में प्राणिक ऊर्जा और ऊष्मा उत्पन्न करके आरोग्यता प्रदान करता है। उज्जायी प्राणायाम के द्वारा प्राणिक एवं आध्यात्मिक स्तरों तक के सभी मूल संचालन केंद्रों को प्रभावित किया जा सकता है। मुद्राओं में शांभवी मुद्रा अपने आप में प्राणिक एवं आध्यात्मिक ऊर्जा को निर्देशित करने का एक अत्यंत शक्तिशाली तरीका है। यह आज्ञा चक्र को जाग्रत कर उच्च चेतना का विकास करती है।
शोधन क्रियाओं में नेति और कपालभाति शरीर के ऊपरी श्वसन मार्ग को इतना स्वच्छ और सक्रिय कर देती हैं कि हानिकारक बैक्टीरिया वहां पनप ही नहीं पाते। इन क्रियाओं से आज्ञा चक्र उत्तेजित होता है, जिससे पूरे सिर और चेहरे में प्राणशक्ति का प्रवाह बढ़ जाता है और मांसपेशीय व मनोकायिक तनाव दूर होते हैं। योग निद्रा और ध्यान के अभ्यास से शरीर और मन दोनों में गहरा परिवर्तन आता है। इससे शरीर के तापमान, चयापचय और अंतःस्रावी संस्थानों के व्यवहार में संतुलन आता है और शारीरिक व मानसिक ऊर्जा का संचय होता है। योग के इसी आधार-स्तंभ पर एक सुदृढ़ प्रतिरक्षा तंत्र खड़ा होता है। जाहिर है कि योग की सरल और प्रभावी विधियां वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल में बड़ा संबल प्रदान करने वाली हैं। यह समय दवाओं के शॉर्टकट से पीछे हटकर अपनी आंतरिक शक्ति को पहचानने का है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

