आषाढ़ शुक्ल द्वितीया यानी आगामी 16 जुलाई को महाप्रभु जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने रथों पर सवार होकर मुख्य मंदिर से मौसी के घर यानी गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करेंगे और नवें दिन यानी 24 जुलाई को लौट आएँगे। सामान्यतः देवता मंदिरों के गर्भगृह में प्रतिष्ठित होते हैं और भक्त वहाँ तक पहुँचते हैं। पर पुरी में हर साल भगवान अपने रत्नसिंहासन से उतरकर भक्तों के बीच सड़क पर आ जाते हैं। यह ईश्वर की लोक-सुलभता का अनुपम उदाहरण है। हालांकि गौड़ीय वैष्णव परंपरा में पुरी के मुख्य मंदिर को द्वारका का और गुंडिचा मंदिर को वृन्दावन का प्रतीक माना जाता है। इसलिए, जब भगवान जगन्नाथ रथ पर आरूढ़ होकर गुंडिचा मंदिर की ओर जाते हैं, तो यह श्रीकृष्ण की अपने प्रिय धाम और अपने परम प्रेम की ओर वापसी का आध्यात्मिक रूपक बन जाता है। इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि रथयात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, समानता और आध्यात्मिक समावेशन का सबसे बड़ा सार्वजनिक अनुष्ठान है।
श्रीजगन्नाथ परंपरा की जड़ें भारत के गहरे ऐतिहासिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक चिंतन से जुड़ी हुई हैं। प्राचीन कथाओं के अनुसार, शबर जनजाति मूल रूप से नीलमणि-सदृश पत्थर से निर्मित, संपूर्ण शास्त्रीय लक्षणों वाली नीलमाधव की सुंदर मूर्ति की पूजा करती थी। मालवा के राजा इंद्रद्युम्न जब उस दिव्य प्रतिमा के दर्शन के लिए पहुँचे, तब तक वह अंतर्धान हो चुकी थी। कालांतर में प्रभु समुद्र में तैरती एक विशाल लकड़ी (दारु) के रूप में प्रकट हुए। तब राजा इंद्रद्युम्न, शबर प्रमुख विश्वावसु और ब्राह्मण विद्यापति मिलकर उस दारु को नीलाचल ले आए। पर इसके बाद कथा का सबसे रहस्यमय मोड़ आता है। लोककथा के अनुसार लकड़ी से विग्रह गढ़ने के लिए स्वयं भगवान विश्वकर्मा एक वृद्ध बढ़ई के रूप में प्रकट हुए। उनकी शर्त थी कि इक्कीस दिनों तक कक्ष का द्वार नहीं खोला जाएगा। किंतु उत्सुकतावश द्वार समय से पहले ही खुलवा दिया गया। परिणामतः तीनों विग्रह सदा के लिए अधूरे रह गए। कुछ आख्यानों में यह उतावलापन रानी गुंडिचा से भी जोड़ा जाता है।
हालांकि वैष्णव परंपरा का दृष्टिकोण यह है कि विग्रह अपूर्ण नहीं रह गए, बल्कि जानबूझकर उसी स्वरूप में प्रकट हुए। कथा चाहे जो हो, लेकिन ये अधूरे विग्रह इस शाश्वत सत्य के प्रतीक हैं कि पूर्णता स्थूल शरीर में नहीं, बल्कि सूक्ष्म चेतना में होती है। ऐसा ही विचार उपनिषदों में अनेक स्थलों पर व्यक्त हुआ है। श्वेताश्वतर उपनिषद के अनुसार, परमात्मा के भौतिक हाथ-पाँव नहीं हैं, फिर भी वह सब कुछ ग्रहण करता है। उसकी आँखें और कान नहीं हैं, फिर भी वह ब्रह्मांड में सब कुछ देखता और सुनता है। श्रीजगन्नाथ का अपूर्ण विग्रह इसी गहरे दार्शनिक सत्य का मूर्त रूप है। इस कथा का ऐतिहासिक पक्ष भी कम प्रेरक नहीं है। जगन्नाथ-परंपरा में आदिवासी शबर आराधना, वैदिक कर्मकांड, वैष्णव भक्ति तथा शैव और शाक्त मतों के तत्व इस कदर घुले-मिले हैं कि यह किसी एक राजा, जाति या संप्रदाय की संकीर्ण सीमाओं में बँधी परंपरा नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय चेतना का सजीव प्रतीक बन गई है। सदियों से भारतीय समाज की सामूहिक स्मृति इसी से आलोकित है। हरमन कुल्के, अंचार्लोट एशमान और गयाचरण त्रिपाठी जैसे विद्वानों के शोध भी इस समन्वयकारी विकास की ओर संकेत करते हैं।
इस पौराणिक आख्यान का प्रत्येक पात्र अपने आप में एक गहरा, जीवंत और प्रासंगिक प्रतीक है। विश्वावसु जहाँ प्रकृति से जुड़ी आदिम जनजातीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहीं विद्यापति ज्ञानमयी वैदिक-ब्राह्मण परंपरा के वाहक हैं। राजा इंद्रद्युम्न उस सजग राजसत्ता के प्रतीक हैं, जो धर्म और समाज को समान रूप से संरक्षण देती है। इसी राजसत्ता के अहंकार-विसर्जन का सबसे जीवंत रूप ‘छेरा पहँरा’ की सदियों पुरानी परंपरा में दिखाई देता है, जब पुरी के गजपति महाराज स्वयं एक सेवक की भाँति महाप्रभु के रथ-मार्ग को सोने की झाड़ू से बुहारते हैं। यह दृश्य सिद्ध करता है कि सर्वोच्च सत्ता भी उस विराट समष्टि के सामने केवल एक विनम्र सेवक है। यहाँ दारु-ब्रह्म प्रकृति और परमात्मा के अटूट अंतर्संबंध को दर्शाता है, तो वृद्ध बढ़ई के रूप में आए विश्वकर्मा उस दिव्य सृजनशीलता के प्रतीक हैं, जो मानवीय सीमाओं और अपेक्षाओं से बहुत परे है। इन तमाम सूत्रों को समग्रता में देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय संस्कृति का मूल तत्व परस्पर समावेशन और समन्वय में निहित है। आज के टुकड़ों में बँटे समाज के लिए यह बहुत बड़ा और सामयिक संदेश है।
वैचारिक स्तर पर समन्वय का यही भाव आध्यात्मिक जीवन का मार्गदर्शक सिद्धांत बन जाता है। रथ आध्यात्मिक दृष्टि से मनुष्य के संपूर्ण अस्तित्व, उसकी अंतर्यात्रा और जीवन के गहनतम रहस्यों का सबसे सशक्त रूपक है। कठोपनिषद में यमराज नचिकेता को जीवन का रहस्य समझाते हुए कहते हैं कि जीवात्मा इस रथ का स्वामी है, शरीर उसका रथ है, बुद्धि सारथी है और मन लगाम। हमारी इंद्रियाँ उन शक्तिशाली और चंचल घोड़ों के समान हैं, जो निरंतर विषय-वासनाओं की ओर दौड़ते रहते हैं। यदि मन असंयत हो और बुद्धि सजग न रहे, तो ये इंद्रियाँ उच्छृंखल घोड़ों की भाँति मनुष्य को उसके जीवन-लक्ष्य से भटका देती हैं। इसके विपरीत, जिसका मन संयमित और बुद्धि विवेकपूर्ण है, वह जीवन-रथ को सही दिशा में ले जाकर परम लक्ष्य तक पहुँचता है। इस पृष्ठभूमि में भव्य रथयात्रा को देखें तो प्रतीत होता है मानो प्रत्येक रथ हर मनुष्य को स्मरण करा रहा हो कि बाहरी दुनिया की यात्रा नहीं, बल्कि भीतर की अंतर्यात्रा ही जीवन की वास्तविक यात्रा है।
दर्शन की यह शुचिता केवल विचार तक सीमित नहीं, व्यवहार में भी दिखती है। इसका प्रमाण है जगन्नाथ मंदिर का अर्थतंत्र और लोककल्याण की वह अनूठी व्यवस्था, जो सदियों से कायम है। मंदिर की विशाल रसोई और उसकी प्रशासनिक सुघड़ता देखकर आधुनिक प्रबंधकों को भी विस्मय होता है। मिट्टी के पात्र बनाने वाले कुम्हार से लेकर ईंधन जुटाने वाले, खाद्यान्न संग्रह करने वाले और महाप्रसाद बाँटने वाले हजारों लोगों का श्रम यहाँ एक सुव्यवस्थित तंत्र में ढला हुआ है। इसकी सबसे बड़ी वजह है श्रम को मिली उच्च आध्यात्मिक गरिमा। हर छोटा-बड़ा सेवक अपने कार्य को प्रभु की सेवा और साधना मानकर करता है। जाहिर है, जब किसी व्यवस्था में दायित्व केवल वित्तीय लाभ का माध्यम न रहकर आत्मिक समर्पण बन जाता है, तो वहाँ शुचिता, निरंतरता और आपसी विश्वास अपने आप स्थापित हो जाते हैं।
संदेश स्पष्ट है। दीर्घकालिक प्रबंधन में केवल रणनीतियाँ नहीं, नैतिक और मानवीय मूल्य भी अनिवार्य हैं। और रथयात्रा की सबसे बड़ी सीख यही है कि जब तक अहंकार समरसता में नहीं बदलेगा और बुद्धि हमारे जीवन-रथ की सारथी नहीं बनेगी, तब तक हमारी अंतर्यात्रा अधूरी ही रहेगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

