भारतीय दर्शन में कहा गया है, “विद्यादानं महादानम्।” दूसरी ओर श्रीमद्भगवत गीता तथा चाणक्य नीति में पात्र व्यक्ति को विद्या देने पर जोर है। प्रथम दृष्टया तो इन बातों में विरोधाभास प्रतीत होता है। पर, वास्तव में वे एक दूसरे के पूरक हैं। भारतीय दर्शन का बारीकी से अध्ययन करें तो स्पष्ट संदेश मिलता है कि विद्या का दान अवश्य किया जाए, क्योंकि वह महादान है; परंतु ज्ञान किसी पर थोपा न जाए। इसलिए, कहा गया है कि जिज्ञासा जगाना शिक्षक का धर्म है, और जिज्ञासा जागने पर निस्संकोच ज्ञान देना भी उसका धर्म है। ऐसी विद्या का दान ही महादान बन पाता है।
उपनिषदों का अध्ययन करें तो पता चलता है कि गुरु कभी ज्ञान बेचते या थोपते नहीं थे। इसलिए, हर किसी को ब्रह्मविद्या नहीं देते थे। पहले वे शिष्य की परीक्षा लेते थे। नचिकेता, सत्यकाम जाबाल, श्वेतकेतु, सभी को पहले अपनी पात्रता सिद्ध करनी पड़ी थी। यदि ज्ञान सभी को बिना किसी तैयारी के देना ही शास्त्र का सिद्धांत होता, तो गुरुकुलों में दीक्षा, तप, ब्रह्मचर्य और अनुशासन की व्यवस्था ही क्यों होती?
भगवद्गीता में भी यही क्रम दिखाई देता है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्धभूमि में आते ही उपदेश नहीं दिया। पहले अर्जुन के भीतर प्रश्न जागा, मोह टूटा और उसने स्वयं कहा – शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्। मैं आपका शिष्य हूँ, मुझे उपदेश दीजिए। यही शिष्य की पात्रता है। जब तक अर्जुन स्वयं शिष्य नहीं बना, तब तक श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश आरंभ नहीं किया।
भारतीय दर्शन में एक अत्यंत सुंदर सिद्धांत है। उसे अधिकारवाद कहा गया है। अर्थ यह कि प्रत्येक ज्ञान का एक अधिकारी होता है। यह कोई भेदभाव नहीं, बल्कि विज्ञानसम्मत सिद्धांत है। तभी प्राथमिक कक्षा के विद्यार्थी को सीधे क्वांटम भौतिकी नहीं पढ़ाई जाती। यहाँ भगवान किसी के प्रति घृणा या भेदभाव की शिक्षा नहीं दे रहे हैं। वे केवल ज्ञान के स्वभाव को समझा रहे हैं। ज्ञान कभी थोपा नहीं जाता; वह तभी फलित होता है जब श्रोता के भीतर जिज्ञासा, विनम्रता और ग्रहणशीलता हो। जिस मन का द्वार बंद हो, वहाँ सत्य की किरण भी प्रवेश नहीं कर सकती।
भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है – इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥ अर्थात् इस परम ज्ञान को उस व्यक्ति से नहीं कहना चाहिए जो न तपस्वी है, न श्रद्धावान है, न सुनने की इच्छा रखता है और न ही जो दोष-दृष्टि से ग्रस्त है। यह बात विद्या दान के विरोध में नहीं है। बात तो केवल इतनी है कि परम ज्ञान को ऐसे व्यक्ति पर मत थोपो जो उसे सुनना ही नहीं चाहता। यदि वह स्वयं जिज्ञासु बन जाए, तो वही ज्ञान उसे अवश्य दिया जाना चाहिए।
आचार्य चाणक्य का प्रसिद्ध नीति-वचन है – उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये। पयःपानं भुजङ्गानां केवलं विषवर्धनम्॥ मतलब यह कि मूर्ख को दिया गया उपदेश उसे शांत नहीं करता, बल्कि उसके क्रोध को और बढ़ा देता है; जैसे साँप को दूध पिलाने से उसका विष ही बढ़ता है। यहाँ मूर्ख का अर्थ केवल अशिक्षित व्यक्ति नहीं है। शास्त्रों में मूर्ख वह है जो सत्य सुनना ही नहीं चाहता, जो अहंकारवश सीखने से इंकार करता है और जिसके लिए अपनी मान्यता ही अंतिम सत्य होती है। ऐसे व्यक्ति के सामने सर्वोत्तम तर्क भी निष्फल हो जाते हैं। वह उपदेश को आत्मचिंतन का अवसर नहीं, बल्कि अपने अहंकार पर आक्रमण समझता है। परिणामस्वरूप ज्ञान शांति का कारण बनने के बजाय विवाद और क्रोध का कारण बन जाता है।
यही बात ऋषि-मुनि और संत-महात्मा कहते रहे हैं। वे किसी का तिरस्कार नहीं करते, न ही किसी को ज्ञान से वंचित करना चाहते हैं। उन्हें पता है कि जब तक पात्रता नहीं बनती, तब तक श्रेष्ठतम शिक्षा भी केवल शब्द बनकर रह जाती है। इसलिए वे पहले जीवन, आचरण और साधना के माध्यम से शिष्य के भीतर ग्रहणशीलता का निर्माण करते हैं, फिर ज्ञान का संचार करते हैं। वे कहते हैं कि ज्ञान देना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना सही समय पर, सही व्यक्ति को और सही विधि से देना।
आज के समय में यह शिक्षा पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। सोशल मीडिया और सार्वजनिक विमर्श के युग में लोग अक्सर बिना माँगे सलाह देते हैं, बिना सुने तर्क करते हैं और बिना पात्रता देखे ज्ञान बाँटते हैं। परिणाम यह होता है कि संवाद की जगह विवाद जन्म लेता है। ज्ञान का उद्देश्य विजय प्राप्त करना नहीं, बल्कि अंतःकरण को प्रकाशित करना है; और प्रकाश वहीं फैलता है जहाँ खिड़कियाँ खुली हों। यही चाणक्य की नीति है, यही गीता का संदेश है और यही सभी सद्गुरुओं की शिक्षा भी।

