भागीरथी तपस्या और शिव की जटाओं से नियंत्रित होकर धरती पर उतरी गंगा महज एक नदी नहीं, बल्कि सनातन चेतना के अंतस में बहती जीवनदायिनी धारा है। यह भारतीय आध्यात्मिक यात्रा का दिव्य और जीवंत आख्यान है। जब महर्षि विश्वामित्र के साथ यज्ञ रक्षा के लिए वनगमन करते समय श्रीराम ने गंगा के दैवीय सौंदर्य को निहारा, तो उनके मन में कौतूहल और जिज्ञासाएं जाग्रत हुईं। उन जिज्ञासाओं के समाधान में महर्षि ने गंगा अवतरण का जो प्रसंग सुनाया, वह केवल एक ऐतिहासिक घटना का वृतांत भर नहीं था, बल्कि श्रीराम के भावी जीवन का एक आध्यात्मिक खाका भी था। इसलिए कि उन्हें भी आगे चलकर लोक-कल्याण के लिए भगीरथ की भांति ही कठोर, दुर्गम और त्यागमय पथ से गुजरना था।
गंगा के धरती पर उतरने की कथा से हम सब भली-भांति परिचित हैं। सूर्यवंश के प्रतापी सम्राट राजा सगर द्वारा किए जा रहे अश्वमेध यज्ञ में देवराज इंद्र ने विघ्न डाल दिया। यज्ञ के अश्व को छलपूर्वक कपिल मुनि के आश्रम में छिपा दिया। राजा सगर के साठ हजार पुत्र उस अश्व की खोज करते हुए जब वहाँ पहुँचे, तो कपिल मुनि की साधना भंग हुई। वे क्रोधित हुए। उस क्रोधाग्नि और तेज से सभी सगर पुत्र क्षण भर में भस्म हो गए। उनका उद्धार तभी संभव था, जब स्वर्ग से उतरकर गंगा का पावन जल उन्हें स्पर्श करता। यहीं से भगीरथ के अप्रतिम संकल्प और कठिन तपस्या की शुरुआत होती है। भगीरथ ने असंभव कार्य को संभव कर दिखाया। परंतु स्वर्ग की उस असीम ऊर्जा और प्रचंड वेग को सीधे सहने की शक्ति वसुंधरा में नहीं थी। तब देवाधिदेव महादेव ने अपनी जटाओं को फैलाकर उस विराट वेग को नियंत्रित किया और उसे लोक-कल्याण के अनुकूल एक सौम्य, शीतल और अविरल प्रवाह में बदल दिया।
यदि इस संपूर्ण कथा को हम यौगिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखें, तो गंगा का अवतरण मनुष्य के भीतर सोई हुई कुण्डलिनी शक्ति के जाग्रत होने का प्रतीक बनकर उभरता है। योग विज्ञान के अनुसार मानव शरीर की बहत्तर हजार नाड़ियों में इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना प्रमुख हैं। गंगा को इड़ा नाड़ी का प्रतीक माना गया है, जो हमारे जीवन में शीतलता, करुणा और मानसिक शांति का संचार करती है। इसी तरह यमुना को पिंगला और अदृश्य सरस्वती को सुषुम्ना के रूप में देखा गया है। इन तीनों पवित्र नदियों का मिलन स्थल यानी प्रयागराज का त्रिवेणी संगम वास्तव में मनुष्य के भीतर स्थित ‘आज्ञा चक्र’ अथवा भ्रूमध्य का ही प्रतीक है। इस चक्र पर पहुँचकर साधक की सांसारिक वृत्तियां पूरी तरह शांत हो जाती हैं और वह समाधि के परम आनंद को उपलब्ध होता है। इस आंतरिक गंगा में डुबकी लगाने का वास्तविक अर्थ अपनी बिखरी हुई मानसिक ऊर्जा को समेटकर पूरी तरह अंतर्मुखी हो जाना है।
शिव की जटाओं द्वारा स्वर्ग से उतरती गंगा के वेग को नियंत्रित करने की कथा के भी बड़े मायने हैं। योग विद्या में सिर के सबसे ऊपरी भाग को ‘सहस्रार चक्र’ कहा गया है। यह स्थान साक्षात शिव का धाम माना जाता है। दूसरी तरफ, गंगा उस ब्रह्मांडीय दिव्य ऊर्जा की प्रतीक है, जो ऊपर से नीचे की ओर प्रवाहित होती है। यदि यह अनंत और प्रचंड ऊर्जा बिना किसी माध्यम या नियंत्रण के सीधे हमारे संवेदनशील स्नायुतंत्र पर गिर जाए, तो मस्तिष्क उस वेग को सहन नहीं कर पाएगा और मनुष्य विक्षिप्त हो सकता है। ऐसे में योग की उच्च अवस्था के रूप में शिव की जटाएं उस ब्रह्मांडीय ऊर्जा को अनुशासित और रूपांतरित करती हैं, ताकि वह रीढ़ की हड्डी रूपी भगीरथ के मार्ग से होती हुई मूलाधार चक्र तक सुरक्षित और सुखद यात्रा कर सके। यहाँ राजा सगर के साठ हजार पुत्र मनुष्य की उन अनगिनत दमित इच्छाओं, वासनाओं और अज्ञानता में सोई हुई वृत्तियों के प्रतीक हैं, जो हमारे मूलाधार में दबी पड़ी हैं। इनका उद्धार केवल साधना के इस भगीरथी प्रयास और चेतना के परम प्रवाह के स्पर्श से ही संभव है।
साधना के इसी दुर्गम पथ पर जब गंगा आगे बढ़ती हैं, तो मार्ग में जह्नु ऋषि के आश्रम को बहा ले जाने और ऋषि द्वारा क्रोध में उन्हें पीकर पुनः अपने कान से बाहर निकालने का प्रसंग आता है। आध्यात्मिक रूप से जह्नु ऋषि हमारे जाग्रत विवेक और परम ज्ञान के प्रतीक हैं। जब साधक की आत्मिक ऊर्जा बढ़ने लगती है, तो नई सिद्धियों और अलौकिक अनुभवों के कारण मन में एक सूक्ष्म अहंकार पैदा होने का खतरा रहता है। यह अहंकार पूरी साधना को पल भर में नष्ट कर सकता है। ऐसे समय में एक सच्चा गुरु या साधक का अपना जाग्रत विवेक उस बढ़ते हुए वेग को अपने भीतर आत्मसात कर लेता है। इसके बाद वह उसे ‘श्रुति’ यानी ज्ञान के मार्ग यानी कान से निकालकर पुनः लोक-कल्याण के लिए सही दिशा प्रदान करता है। यही कारण है कि आदि शंकराचार्य ने जहां गंगा को ‘ब्रह्म-विद्या’ की साक्षात देवी मानकर उनकी वंदना की, वहीं संत कबीर ने गंगा के नीर को मन की आंतरिक शुद्धि की कसौटी बनाया। ये दोनों ही युगद्रष्टा भली-भांति जानते थे कि जब तक हमारे विचारों और आचरण में इस पवित्र धारा जैसी निर्मलता नहीं आएगी, तब तक केवल बाहरी शरीर को धोने से वास्तविक मुक्ति संभव नहीं है।
गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस में गंगा को ‘पतित पावनी’ और ईश्वरीय करुणा की साक्षात प्रवाहित धारा कहकर साबित किया कि वह कुछ और नहीं, बल्कि परम चेतना-स्वरुप है। इन तमाम दृष्टिकोणों के मद्देनजर गंगा दशहरा भारतीय आध्यात्मिक चेतना का वह जीवंत उत्सव है, जिसमें योग और भक्ति का सबसे सुंदर और संतुलित समन्वय दिखाई देता है। इसलिए केवल बाह्य गंगा में डुबकी लगाने से बात नहीं बनती। हमें आंतरिक गंगा में भी श्रद्धापूर्वक डुबकी लगाना होगा। तभी लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसे गहरे मानसिक विकार समाप्त होंगे और चित्त की चंचल वृत्तियां नियंत्रित होंगी, जिसकी आकांक्षा हम सबके मन में होती है। ॐ नमः शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नमः
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

