बिहार में उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर बसे मुंगेर की पावन धरती ने कभी दानवीर कर्ण की अद्वितीय उदारता देखी थी। लेकिन नियति ने इस भूमि की कोख में चेतना के जागरण का एक और महायज्ञ सुरक्षित रखा था। बीसवीं सदी में इस महायज्ञ के सूत्रधार बने महायोगी परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती। उनके तप और सद्प्रयासों के कारण यह ऐतिहासिक शहर वैश्विक आध्यात्मिक घटनाओं का केंद्र बन गया। उनकी महासमाधि के कोई सत्रह साल बीत जाने के बाद अब उनकी सूक्ष्म ऊर्जा का प्रभाव पद्म समारोह के दौरान दिखेगा, जो भक्ति और योग का अद्भुत संगम होगा।
स्वामी सत्यानंद सरस्वती जब ऋषिकेश में अपने गुरु स्वामी शिवानंद सरस्वती के सानिध्य में वेदांत की गहराइयों को समझ रहे थे, तब उन्हें यह आभास भी न था कि एक दिन वे दुनिया भर में योग के सबसे बड़े संवाहक बनेंगे। लेकिन एक दिन जैसे ही गुरु आदेश हुआ,, “जाओ सत्यानंद, योग का प्रचार करो,“ उनके जीवन की दिशा बदल गई। उन्होंने कभी प्रचलित योग की औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी, किंतु ‘गुरु शब्दो ब्रह्म’ की उक्ति यहाँ साक्षात चरितार्थ हुई। गुरु का वह एक वाक्य उनके भीतर शक्तिपात और प्रज्ञा के जागरण का आधार बन गया और यही उनके जीवन का मिशन भी बना।
परमहंस जी ऋषिकेश आश्रम से निकले तो परिव्राजक संन्यासी के रूप में भारत भ्रमण और साधनाओं के दौरान इस मुंगेर की पावन भूमि की झलक मिली। फिर तो वे 6 मई 1957 को पहुंच गए मुंगेर। वहां उनके कदम पड़ते ही मानो धरती की सुप्त चेतना जागृत हो उठी और देखते ही देखते मुंगेर विश्व पटल पर ‘योग नगरी’ के रूप में अंकित हो गया। कोई 69 वर्षों के अंतराल के बाद उस ऐतिहासिक क्षण को एक उत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। यह आयोजन इसलिए भी विशिष्ट है, क्योंकि वहां स्वयं भगवान तिरुपति बालाजी की उत्सव मूर्ति पधार रही है। दक्षिण के दिव्य वैभव और उत्तर की इस तपोभूमि का यह मिलन योग और भक्ति की धाराओं का एक महासंगम साबित होगा।
वैसे तो सन् 2023 परमहंस जी का जन्मशताब्दी वर्ष था। पर उनकी महान उपलब्धियों पर जश्न मनाते हुए उनसे जन-जन को अवगत कराने का सिलसिला सन् 2031 तक जारी रहेगा। इन आठ वर्षों के दौरान देश-विदेश, राज्य और नगर-नगर में विशेष आयोजनों के लिए एक श्रृंखला तैयार की गई है। शास्त्रों में 108 की संख्या को ‘पूर्णता’ का मानक माना गया है। इसीलिए सन्यास परंपरा में जन्म शताब्दी वर्ष से ज्यादा अहमियत 108 वर्षों वाली पद्म शताब्दी की होती है। इस लिहाज से यह मात्र आठ वर्षों का विस्तार नहीं, बल्कि परमहंस जी की चेतना को ‘अष्टोत्तर’ की पूर्णता तक ले जाने का एक आध्यात्मिक अनुष्ठान है।
बिहार योग विद्यालय के रुप में योग विद्या का ‘ऑक्सफोर्ड’ स्थापित करने वाले परमहंस जी ने मुंगेर में केदारनाथ गोयनका के भवन में जब योग विद्यालय की नींव रखी, तो उन्हें उसी समय भविष्य की झलक दिखाई दी थी। तब उन्होंने कहा था कि योग आने वाले युग की अनिवार्य संस्कृति बनेगा। इसके साथ ही, उन्हें इस बात का भी भान था कि तर्कवादी और वैज्ञानिक युग में योग को तब तक स्वीकार नहीं किया जाएगा, जब तक इसे विज्ञान की कसौटी पर न कसा जाए। यही कारण था कि उन्होंने मुंगेर में न केवल परंपरागत योग को पुनर्जीवित करने का काम किया, बल्कि ‘योग रिसर्च फाउंडेशन’ के रुप में वैज्ञानिक शोध केंद्र की स्थापना की। आज जब हम दमा, मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसे रोगों पर योग के प्रभावों की चर्चा करते हैं, तो उसकी जड़ें मुंगेर में हुए उन शुरुआती अनुसंधानों में ही निहित हैं। अनुसंधानों से सिद्ध किया गया कि योग विधियों से शरीर की अंतःस्रावी प्रणालियों को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
परमहंस जी के मार्ग-दर्शन में बिहार योग विद्यालय ने योग को आधुनिक समाज, चिकित्सा, उद्योग, सेना और शिक्षा जैसे हर क्षेत्र के लिए एक वैज्ञानिक और प्रामाणिक जीवनपद्धति के रूप में स्थापित किया। बच्चों पर किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर साबित कर दिया कि मात्र तीन महीने के योगाभ्यास से बच्चों की एकाग्रता, स्मृति, व्यवहार और रचनात्मकता में भारी सुधार संभव है। सन् 2000 में इस शोध को यूनेस्को की मान्यता के बाद फ्रांस सहित 17 यूरोपीय देशों के स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में ‘बिहार योग पद्धति’ से शिक्षा दी जाने लगी। फिर तो भारत में भी बिहार योग पद्धति की मांग बढ़ गई। यही योग विद्या भारत के प्रथम अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा और बिना ऑक्सीजन के माउंट एवरेस्ट पर जाने वाली सेना की टीम के काम आई थी।
परमहंस जी का सफर चुनौतीपूर्ण था। उन दिनों चिकित्सकीय शोधों के लिए विदेशी प्रयोगशालाओं पर निर्भर रहना होता था। ज्यादा धन की जरुरत होती थी। पर, गुरुकृपा से बाधाएं दूर होती गईं। एक मजेदार वाकया है। परमहंस जी खाड़ी देशों का भ्रमण करते हुए ईराक गए थे। सत्संग में बड़ी संख्या में महिलाएं जुट गईं। परमहंस जी ने भ्रूमध्य जागृत करने का विज्ञान और उसके फायदे बताए। साथ ही बिंदी लगाने से जुड़ी पौराणिक कथा और उसका विज्ञान भी समझाया। नतीजा हुआ कि अगले दिन बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं बिंदी लगाकर योग साधना के लिए स्वामी जी के समक्ष उपस्थित हो गईं थीं। यह खबर फैली तो देश के तत्कालीन शासक ने रेडियो से स्वामी जी के सत्संग का प्रसारण करवाया और उनकी चुनिंदा पुस्तकों का फारसी में अनुवाद कराने का फैसला किया। इससे मिला धन योग अनुसंधान के काम आया था।
इस संस्थान की वैश्विक व्याप्ति का सबसे गौरवशाली पक्ष तब सामने आया, जब अंतरिक्ष विज्ञान के शिखर ‘नासा’ और मुंगेर के योग विद्यालय के बीच सेतु बन गया। इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक फील्ड और फ्रीक्वेंसी के जरिए अंतरिक्ष में यात्रियों के इलाज की जो परिकल्पना आज मूर्त रूप ले रही है, उसका सूत्रधार यही योग विद्या है। ये उपलब्धियां इस बात के प्रमाण हैं कि जब गुरु कृपा और संकल्प शक्ति एक साथ मिलती है, तो उससे उत्पन्न ऊर्जा विश्व के लिए ज्ञान का प्रकाश-स्तंभ बन जाती है। मुंगेर में 6 मई को आयोजित पदार्पण महोत्सव और श्रीनिवास कल्याणोत्सवम् उसी प्रकाश की एक भव्य अभिव्यक्ति होगी, जो आने वाली पीढ़ियों को योग और सेवा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती रहेगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक)

