“ये बाबा बहुत दिनों से नहीं आए। बाबा की बहुत याद आ रही है… भवन, इसका पेट भी फूला हुआ है, मुझे बड़ी चिंता हो रही है… ऐसी भी क्या नाराजगी थी महाराज? आपने दर्शन नहीं दिए…” भक्तों की यह आर्त पुकार अनसुनी नहीं रह पाती और तभी ममत्व से सराबोर एक वाणी गूंजती है, “ये देख मैं आ गया हूं तेरे लिए। इसी दिन का इंतजार था ना तुझे?” यह किसी साठ-सत्तर के दशक की चमत्कारिक घटना का वर्णन नहीं, बल्कि नीम करोली बाबा पर बनी फिल्म “श्री बाबा नीब करोली महाराज” के टीजर का एक अंश है। मराठी अभिनेता सुबोध भावे अभिनीत यह फिल्म दो दिन पहले ही रिलीज हुई है। दिलचस्प बात यह कि जून में फिल्म ‘हनुमान अंश’ रिलीज होने वाली है, जो तीन कड़ियों की श्रृंखला का हिस्सा होगी। ‘संत’ नाम से वेब सीरीज पर काम चल ही रहा है, जिसमें एआई जैसी आधुनिक तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है। खास बात यह कि ये सभी नीम करोली बाबा के जीवन पर आधारित हैं।
वैसे तो देवी-देवताओं से लेकर संत-महात्माओं तक को केंद्र में रखकर फिल्मों का निर्माण कोई नई बात नहीं है। पर, नीम करोली बाबा पर पहली बार फिल्मकारों की नजर गई है। अचानक बाबा फिल्मकारों की पसंद क्यों बन गए हैं? इस सवाल पर आने से पहले बाबा के बारे में थोड़ी चर्चा समीचीन होगी। उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में जन्में नीम करोली बाबा का जीवन किसी साधारण मनुष्य की यात्रा नहीं, बल्कि उस ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रकटीकरण कहा जा सकता है, जो समय-समय पर मानवता को राह दिखाने आती है। “सबको प्यार करो, सबकी सेवा करो और ईश्वर को याद रखो,” यही बाबा का जीवन-दर्शन था। उन्होंने कभी कोई ग्रंथ नहीं लिखा, न ही संप्रदाय चलाया। श्रीराम के अनन्य भक्त श्री हनुमान जी के इस सेवक ने 11 सितंबर 1973 को वृंदावन में महासमाधि ली थी।
महासमाधि से पहले बाबा ने अधिकांश समय उत्तराखंड के नैनीताल के पास कैंची धाम में बिताया। उनका व्यक्तित्व किसी पारंपरिक संन्यासी जैसा नहीं था। वे न तो गेरुए वस्त्र धारण करते थे और न ही किसी ऊंचे सिंहासन पर बैठते थे। एक साधारण धोती और कंधे पर कंबल, यही उनकी वेशभूषा थी। पर, उनके जीवनकाल में ऐसी-ऐसी घटनाएं घटती गईं कि सामान्यत: उन्हें चमत्कार ही माना गया। आज भी बाबा के कथित चमत्कारों की कहानियां लोककथाओं की तरह चारों ओर बिखरी पड़ी हैं। मसलन, जीवन के प्रारंभिक दिनों में बाबा ट्रेन से बेटिकट यात्रा कर रहे थे तो अंग्रेज टीटीई ने उन्हें ‘नीब करोली’ नामक गांव के पास ट्रेन से उतार दिया। पर, ट्रेन भी वहीं ठहर गई। लाख कोशिशों के बावजूद आगे नहीं बढ़ पाई। जब बाबा को ससम्मान वापस ट्रेन में बिठाया गया तो ट्रेन चल पड़ी थी। वे इसी घटना के बाद ही नीम करोली बाबा के नाम से विख्यात हुए। उधर, भक्तों ने नीम करोली गांव में भव्य मंदिर का निर्माण करया, आज धाम बन चुका है।
बाबा की दिव्य ऊर्जा का असर ऐसा है कि दुनिया भर के दिग्गज उनके चरणों में शीश नवाने मुख्य रुप से कैंचीधाम जाते रहते हैं। एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स से लेकर मार्क जुकरबर्ग तक कैंची धाम की यात्रा कर चुके हैं। जुकरबर्ग ने स्वयं स्वीकार किया था कि कैंचीधाम जाने के बाद विचारों में स्पष्टता आई और वे फेसबुक को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा पाए। साठ के दशक में हार्वर्ड विश्व विद्यालय के प्रोफेसर रिचर्ड अल्बर्ट को लगता था कि ‘एलएसडी’ जैसे रसायनों से भी निर्वाण प्राप्त हो सकता है। भारत आए और नीम करोली बाबा से मिले, तो उऩके जीवन में नया मोड़ आ गया। बाबा ने अल्बर्ट के पास की एलएसडी गोलियां वैसी ही निगल लीं जैसे संत मीराबाई ने जहर का प्याला पीकर मृत्यु को मात दे दिया था। ऐसा करके बाबा ने संदेश दिया कि जीवन को कृत्रिम साधनों या रसायनों से नहीं, बल्कि आंतरिक रूपांतरण से ही बदला जा सकता है। दुनिया के लिए यह घटना बड़ा चमत्कार था, लेकिन प्रोफेसर अल्बर्ट का ऐसा आंतरिक रुपांतरण हुआ कि वे बाबा के अनन्य भक्त बन बैठे। आज पूरी दुनिया उस भक्त को रामदास के रूप जानती है।
अब मूल बात कि फिल्म जगत क्यों आध्यात्मिक प्रसंगों की ओर खिंचा चला जा रहा है? इसका जवाब निश्चित रूप से हां या ना में नहीं है। लेकिन, इस भौतिकतावादी युग में कोई फिल्मकार “रामायणम्” जैसी आध्यात्मिक फिल्म के निर्माण पर चार हजार करोड़ रुपए खर्च कर रहा है तो इसका निहितार्थ और इसके पीछे का मनोविज्ञान समझना मुश्किल भी नहीं। दरअसल, फिल्म उद्योग ने भांप लिया है कि भारत का युवा वर्ग तेजी से अध्यात्म की ओर खिंचा चला जा रहा है। कांटारा, हनुमान, या महावतार नरसिम्हा जैसी आध्यात्मिक और पौराणिक फिल्मों इस बात के गवाह हैं। इनके दर्शकों में 18 से 30 वर्ष के युवाओं की संख्या अस्सी फीसदी तक थी। यह समाज में हो रहे गहरे मानसिक और सांस्कृतिक बदलावों का प्रतिबिंब है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में मानसिक रूप से परेशान युवाओं को बात समझ में आ रही है कि भावनात्मक संतुलन के बिना मानसिक संतुलन टिकाऊ नहीं हो सकता। और इसके लिए भक्ति मार्ग उन शक्तिशाली मार्गों में से एक है, जो उन्हें जड़ों से जोड़कर भावनाओं को परिष्कृत करने में मददगार है।
बीसवीं सदी के महान संत परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती को तो कोई छह दशक पहले झलक मिल गई थी कि इक्कीसवीं सदी ‘भक्ति’ की सदी होगी। उस भक्ति का उद्देश्य केवल पूजा-पाठ या पारंपरिक श्रद्धा नहीं, बल्कि कच्ची व अनगढ़ भावनाओं को परिष्कृत करना होगा, जो मानसिक प्रबंधन से आगे की बात होगी। बच्चे उस यौगिक व आध्यात्मिक विज्ञान को समझने की कोशिश करेंगे, जिसकी बदौलत संत मीराबाई जहर पी कर भी जीवित रह गई थीं। आज हम देख रहे हैं कि स्वामी जी ने भविष्य की जैसी झलक देखी थी, वह फलित होती दिख रही है। ऐसे में उम्मीद है कि नीम करोली बाबा का आगमन फिल्मी पर्दो पर ही नहीं, लोगों के अंतर्मन में भी होगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

