जय हनुमान ज्ञान-गुण सागर…. गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री हनुमान जी को “ज्ञान गुण सागर” क्यों कहा? इसलिए कि सूर्य भगवान से अपार ज्ञान प्राप्त करने के कारण ज्ञानियों में अग्रगण्य (सबसे आगे) हैं। ज्ञान के असीम सागर हैं। यह केवल स्तुति नहीं, बल्कि एक पूर्ण व्यक्तित्व का खाका है। श्री तुलसीदास जी जब उन्हें असीम ज्ञान का पुंज और दोषरहित बाताते हैं, तो इसका सीधा अर्थ यह है कि वास्तविक ज्ञान वही है जो अहंकार को समाप्त कर दे।
प्रकृति का नियम है कि जहाँ गुण होते हैं, वहाँ कुछ न कुछ दोष भी होते हैं, लेकिन हनुमान जी दोषरहित हैं। क्यों? क्योंकि उन्हें माता जानकी जी से ‘अजर अमर गुननिधि’ और ‘सकल गुण निधान’ (सभी गुणों का भंडार) होने का वरदान मिला हुआ है और यह आशीर्वाद इसलिए मिला क्योंकि हनुमान जी की शक्तियां केवल सेवा के लिए थीं।
श्री रामचरितमानस में सज्जन की तीन परिभाषाएं दी गई हैं। उसके मुताबिक, सज्जन वह है जो अपने स्वभाव में परोपकारी हो, व्यवहार में क्षमाशील हो और दृष्टि में समभाव रखता हो। प्रभु श्रीराम के अनुसार, जो व्यक्ति माता, पिता, परिवार, धन और संपत्ति से अपनी सारी ममता और मोह हटाकर केवल भगवान के चरणों में अपना मन बाँध ले, वह सज्जन है। हनुमान जी इन सभी कसौटियों पर पूरी तरह से खरे उतरते हैं। सुग्रीव और विभीषण को राज्य के पद मिले, लेकिन हनुमान जी ने किसी भी पद की लालसा नहीं की और केवल प्रभु के चरणों को ही अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि माना।
इस तरह, इन प्रसंगों हमें प्रेरणा मिलती है कि हम अपनी क्षमताओं का विस्तार करें, लेकिन अपनी जड़ों और मूल्यों से विमुख न हों। दूसरी बात यह कि बिना किसी स्वार्थ या पद की लालसा के किया गया कार्य ही व्यक्ति को सच्चे अर्थों में ‘अग्रगण्य’ बनाता है। यदि हम अपने भीतर थोड़ा भी समभाव और परोपकार की भावना विकसित कर सकें, तो हमारे सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में एक बड़ा सकारात्मक परिवर्तन हो सकता है।

