हठयोग तन और मन के संतुलन की एक सुव्यवस्थित पद्धति है और इसका षट्कर्म योग साधना की आरंभिक सीढ़ियां हैं। इसलिए, घेरण्ड संहिता में शोधन क्रिया को योग-साधना का आधार माना गया है। धौति, बस्ति, नेति, नौलि, त्राटक और कपालभाति जैसी क्रियाएँ इसी शोधन का हिस्सा हैं। इनका उद्देश्य शरीर की बाह्य सफाई करके उसे इस तरह तैयार करना है कि श्वास और प्राण का प्रवाह सहज हो तथा उच्चतर योग-साधनाओं का मार्ग प्रशस्त हो सके। इस दृष्टिकोण से नेति क्रिया का विशिष्ट स्थान है। सर्दियों के दिनों में, जब नाक बंद होने, एलर्जी, जुकाम और साइनस संबंधी परेशानियाँ बढ़ने लगती हैं, तो इसकी उपयोगिता और भी बढ़ जाती है।
हम जानते हैं कि नासिका श्वास का प्रमुख द्वार होने के साथ शरीर की पहली प्राकृतिक सुरक्षा-व्यवस्थाओं में से एक है। नाक की भीतरी सतह पर श्लेष्मा यानी म्यूकस की पतली परत होती है। हवा के साथ आने वाली धूल, परागकण और अनेक सूक्ष्म कण इसी परत में फँस जाते हैं। नाक के भीतर अत्यंत सूक्ष्म बाल जैसी संरचनाएँ भी होती हैं, जिन्हें सिलिया कहा जाता है। ये निरंतर गति करती रहती हैं और श्लेष्मा में अटके कणों को धीरे-धीरे गले की ओर पहुँचाती हैं, जहाँ वे निगल लिए जाते हैं या शरीर से बाहर निकल जाते हैं। चिकित्सकीय भाषा में इस प्राकृतिक सफाई-प्रक्रिया को म्यूकोसिलियरी क्लीयरेंस कहा गया है।
शरीर स्वस्थ हो तो यह सफाई-तंत्र अपने आप चलता रहता है। लेकिन एलर्जी, जुकाम, सूजन या साइनुसाइटिस जैसी स्थितियों में जब श्लेष्मा गाढ़ा होने लगे और नासिका-मार्ग से उसका निष्कासन धीमा पड़ जाए, तब साँस लेने में कठिनाई, भारीपन और अवरोध महसूस होने लगता है। ऐसे में हल्के नमकीन जल से नासिका-शुद्धि करने से श्लेष्मा ढीला होता है और नासिका-मार्ग की सफाई आसान हो जाती है। आधुनिक चिकित्सा में भी सलाइन नेजल इरिगेशन का उपयोग एलर्जिक राइनाइटिस और क्रॉनिक राइनोसाइनुसाइटिस जैसी स्थितियों में सहायक उपचार के रूप में किया जाता है, जो योग की जलनेति जैसा ही होता है।
जाहिर है कि षट्कर्म की नेति क्रिया बड़े काम की है। नेति क्रिया के कई प्रकार हैं। पर आज सबसे सरल जलनेति बात। बिहार योग विद्यालय के परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती बताते हैं कि इसके लिए ऐसी टोंटी वाला नेति-लोटा प्रयोग किया जाना चाहिए, जो नासाछिद्र में सहज रूप से बैठ सके। क्रिया उकड़ूँ बैठकर, एड़ियों पर बैठकर अथवा शरीर और सिर को थोड़ा आगे झुकाकर खड़े होकर भी की जा सकती है। लोटे में शरीर के तापमान के लगभग बराबर गुनगुना जल लिया जाता है और उसमें इतना नमक मिलाया जाता है कि पानी हल्का नमकीन हो जाए तथा नमक पूरी तरह घुल जाए।
टोंटी को एक नासाछिद्र में सावधानी से लगाकर सिर को दूसरी ओर थोड़ा झुकाया जाता है। मुँह खुला रखा जाता है और श्वास मुँह से चलती रहती है। सही स्थिति बनने पर जल एक नासाछिद्र से प्रवेश करता है और दूसरे से बाहर निकल जाता है। कुछ समय तक जल प्रवाहित करने के बाद यही प्रक्रिया दूसरी नासिका से दोहराई जाती है। क्रिया पूरी होने के बाद नाक में बचा हुआ जल बाहर निकालना भी उतना ही आवश्यक होता है।
नासिका-शुद्धि का केवल शारीरिक और मानसिक ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक महत्त्व भी है। हठयोगप्रदीपिका में नेति के संदर्भ में कहा गया है कि यह कपाल-प्रदेश को शुद्धि करती है, दिव्यदृष्टि प्रदान करती है और हंसली यानी कॉलर बोन के ऊपर के क्षेत्र से संबंधित रोगों को दूर करने में सहायक है। हंसली के ऊपर के इस क्षेत्र में नाक, गला, कान, आँखें और स्वर से जुड़े अनेक अंग हैं। यही कारण है कि योग-परंपरा में नेति क्रिया को केवल श्वसन-मार्ग की सफाई तक सीमित नहीं रखा गया है।
स्वर को ही लें। स्वर पैदा भले ही कंठ में स्थित स्वर-तंतुओं के कंपन से होता है, लेकिन उसकी वास्तविक गूँज केवल कंठ में नहीं बनती। गला, मुख, नासिका और साइनस मिलकर उसके अनुनाद-कक्ष का काम करते हैं। इसे गिटार के प्रतीक से समझा जा सकता है। ध्वनि तारों के कंपन से पैदा होती है, लेकिन उसकी गहराई और गूँज पूरे वाद्य के ढाँचे से बनती है। इस संदर्भ में ‘द लैरिंगोस्कोप’ जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन उल्लेखनीय है। नाक में पॉलिप और क्रॉनिक राइनोसाइनुसाइटिस से पीड़ित पचास रोगियों की सर्जरी के तीन महीने बाद जब उनकी स्थिति का परीक्षण किया गया तो साइनस संबंधी लक्षणों के साथ स्वर-बाधा में भी सुधार पाया गया।
नाक का संबंध कानों से भी अत्यंत निकट है। सामान्य रूप से सुनने के लिए आवश्यक है कि मध्य कान के भीतर हवा का दबाव बाहरी वातावरण के दबाव के लगभग बराबर बना रहे। इस संतुलन में यूस्टेशियन ट्यूब की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। ये बारीक नलिकाएँ मध्य कान को नाक और गले के पीछे वाले हिस्से से जोड़ती हैं। इसलिए नाक, गला और कान को एक-दूसरे से पूरी तरह अलग करके नहीं देखा जा सकता। एक क्षेत्र में सूजन या अवरोध दूसरे क्षेत्र को भी प्रभावित कर देता है।
आँखों के संदर्भ में भी नेति क्रिया का उल्लेखनीय प्रभाव होता है। योग रिसर्च फाउंडेशन, मुंगेर से जुड़े बिहार योग साहित्य में नेति को आँखों और आसपास के क्षेत्र पर उद्दीपक तथा टोनिंग प्रभाव देने वाली क्रिया के रूप में वर्णित किया गया है। अनेक साधक नेति के बाद आँखों के भारीपन या थकान में कमी अनुभव करते हैं। इसी तरह सिर के भारीपन, कुछ प्रकार के सिरदर्द और ऊपरी श्वसन-मार्ग से जुड़ी असुविधाओं में भी राहत का अनुभव किया जाता है। लेकिन हठयोग की इस क्रिया का प्रभाव और भी व्यापक है। योग-परंपरा में दोनों नासिका-प्रवाहों का संबंध इड़ा और पिंगला नाड़ियों से माना गया है। इसी कारण नासिका की शुद्धि को प्राणायाम और आगे की अंतर्मुखी साधनाओं की तैयारी के रूप में भी देखा गया।
हठयोगप्रदीपिका में नेति को ‘दिव्यदृष्टिप्रदायिनी’ कहा गया है। माण्डूकी मुद्रा जैसी परंपरागत साधनाओं में भी नासाग्र और वहाँ अनुभव होने वाली सूक्ष्म संवेदनाओं के प्रति सजगता का बड़ा महत्त्व है। इस प्रकार हठयोग की यह सामान्य-सी क्रिया का व्यापक प्रबाव है। पहले शोधन, फिर श्वास की सहजता, उसके बाद संवेदनाओं के प्रति बढ़ती सजगता और अंततः चेतना का बहिर्मुखता से अंतर्मुखता की ओर मुड़ना। नेति की पूरी साधना-दृष्टि को इसी क्रम में समझा जा सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

