“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
अर्थात्, तुम्हारा अधिकार कर्म करने में है, उसके परिणामों पर नहीं।
समुद्र के क्षितिज को यदि कोई छूना चाहे, तो वह कभी संभव नहीं हो पाता। हम जितना आगे बढ़ते हैं, क्षितिज उतना ही आगे खिसक जाता है। हमारे जीवन की प्रकृति भी कुछ ऐसी ही है। हम लक्ष्यों को पूरा करने, जीवन को व्यवस्थित करने और भीतर-बाहर की अव्यवस्था को समेटने के लिए निरंतर दौड़ते रहते हैं। किंतु जैसे ही एक काम समाप्त होता है, दूसरा सामने खड़ा मिलता है। एक ज़िम्मेदारी पूरी होती है, तो अगली दस्तक दे देती है। जीवन में कभी ऐसा कोई अंतिम बिंदु नहीं आता, जहाँ पहुँचकर हम कह सकें कि अब सब कुछ पूर्ण हो गया।
यहाँ एक सहज दुविधा जन्म लेती है। जब पूर्णता कभी हासिल ही नहीं होनी, तो फिर कार्य को पूरा करने के लिए इतनी जद्दोजहद क्यों? इसका उत्तर हमारे भीतर के संतुलन में छिपा है। किसी कार्य को हाथ में लेकर उसे भली-भांति समाप्त करना हमारा कर्तव्य है, क्योंकि यही संकल्प हमारे भीतर अनुशासन और ऊर्जा पैदा करता है। लक्ष्य के बिना कर्म अपनी दिशा खो देता है। अंतर केवल इतना है कि काम को पूरा करने की निष्ठा हमारे प्रयास में होनी चाहिए, न कि इस मानसिक हठ में कि जब तक दुनिया का हर काम खत्म नहीं होगा, तब तक हम शांत नहीं बैठेंगे।
श्रीमद्भगवतगीता का कर्मयोग हमें इसी व्यग्रता से मुक्त करता है। कार्यों की कभी न समाप्त होने वाली सूची मन को थका देती है, जबकि कर्मयोग मन को अनावश्यक चिंता से मुक्त कर वर्तमान कर्तव्य में सहज, एकाग्र और ऊर्जावान बनाए रखता है। घर की हर वस्तु शायद कभी पूरी तरह व्यवस्थित न हो, कंप्यूटर और फोन की फाइलें शायद कभी पूरी न सुलझें, और मन के सारे विचार भी एक दिन में शांत न हों। फिर भी, जब हम प्रतिदिन अपनी वर्तमान ज़िम्मेदारी को पूरी निष्ठा से निभाते हैं और हाथ में लिए काम को सार्थक बनाते हैं, तो हम कर्म के सच्चे मार्ग पर ही चल रहे होते हैं।
अधूरापन जीवन की सहज सच्चाई है, लेकिन काम को अधूरा छोड़ देना हमारा स्वभाव नहीं होना चाहिए। यात्रा की मंजिल तय करना ज़रूरी है ताकि हम भटकें नहीं, पर चलने की सार्थकता हर एक कदम को ईमानदारी से उठाने में है। जीवन की सफलता सारे काम समाप्त कर देने के किसी काल्पनिक ठहराव में नहीं, बल्कि वर्तमान कर्तव्य को पूरे समर्पण से निभाते हुए निरंतर आगे बढ़ते रहने में है।

