वैसे तो सावन का पूरा महीना ही भगवान शिव को समर्पित होता है। लोकमान्यता है कि इस महीने में भगवान शिव माता पार्वती के साथ धरती पर भ्रमण करने आते हैं और अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाते हैं। भक्तगण भोलेनाथ को प्रसन्न करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। माह की अंतिम सोमवारी के साथ ही धार्मिक कर्मकांडों का एक चक्र पूरा हो जाता है। पर, आध्यात्मिक दृष्टिकोण से सावन का अंतिम सोमवार विशिष्ट दिवस है। यह आंतरिक रूपांतरण के लिए संकल्प लेने का दिवस है। हम जलाभिषेक करके भोले बाबा को शीतलता प्रदान करते रहे। पर, अब वैसी ही शीतलता हमारे व्यवहार में भी परिलक्षित हो। हमने शिवालयों में पूरे महीने घंटियों की गूँज और नमः शिवाय के नाद से मंदिरों को गुंजायमान रखा। अब वही कल्याणकारी मंत्र हमारी वाणी में मिठास, हमारे निर्णयों में विवेक और हमारे व्यवहार में दूसरों के प्रति करुणा का भाव उत्पन्न करे।
जब हम “शिव” कहते हैं, तो सामान्यतः हमारे मानस-पटल पर जटाजूटधारी, त्रिशूलधारी महादेव की छवि उभरती है। यह हमारी भक्ति और धार्मिक परंपरा का अत्यंत सुंदर रूप है। पर वेद में “शिव” मूलतः मंगलकारी, कल्याणकारी और शुभ अर्थ वाला विशेषण है और रुद्र के लिए भी इसका प्रयोग हुआ है। बाद की परंपरा में “शिव” स्वयं देवता के विशिष्ट नाम के रूप में प्रतिष्ठित हो गया। संदेश यह कि नमन गुण को करना है, आकृति को नहीं। माण्डूक्य उपनिषद् में इस दृष्टि की व्यापकता को एक मंत्र के जरिए विस्तार दिया गया है – “प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः।” इस मंत्र में भी “शिव” किसी व्यक्ति, आकृति, मूर्ति या देवता के नाम के रूप में प्रयुक्त नहीं है, बल्कि इसे उस अवस्था के गुण के रूप में बताया गया है, जो शांत है, मंगलमय है और द्वैत के पार है। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति के पार जिस चौथी अवस्था की ओर संकेत है, उसे तुरीयावस्था कहा गया है। शंकराचार्य ने भाष्य में तुरीय को केवल तीन अवस्थाओं के ऊपर की कोई सीढ़ी नहीं माना, बल्कि तीनों अवस्थाओं से निरपेक्ष आत्मतत्त्व के रूप में समझाया है। इस अर्थ में वह वह आधार है, जिस पर पूर्व की तीनों अवस्थाएँ उठती और गिरती हैं।
यदि सावन की चार सोमवारी को चेतना की इन चार अवस्थाओं का प्रतीक मानकर देखें, तो सावन की यात्रा केवल चार सोमवारों तक शिव की पूजा करने की यात्रा नहीं रह जाती। वह धीरे-धीरे बाह्य आराधना से अंतर्यात्रा बन जाती है। यह कोई शास्त्रीय वर्गीकरण नहीं, बल्कि सावन की साधना को समझने का एक प्रतीकात्मक ढंग है। पहला चरण वह है, जब मन संसार में लगा हुआ है। मन थोड़ा रूपांतरित होता है तो अपने भीतर के स्वप्न और इच्छाओं पर दृष्टि जाती है। तीसरी अवस्था आते-आते मानसिक तूफान शांत होने लगता है। और चौथी अवस्था में कहीं पहुँचना नहीं, यह पहचान लेना होता है कि तीनों के भीतर जो देखने वाला बैठा था, वही शिव है। इस मायने में सावन का अंतिम सोमवार पूर्व की तीन अवस्थाओं से आगे जाने की आकांक्षा का प्रतीक बन जाता है।
पर कोई भी संकल्प खुद-ब-खुद तो फलीभूत होता नहीं। हर सावन के बाद लाखों लोग तय करते हैं कि अब क्रोध नहीं करेंगे, अब वाणी संयत रखेंगे। कुछ दिनों में वह निश्चय बिखर जाता है। कारण साफ है। संकल्प भाव है, और भाव को टिकने के लिए विधि चाहिए। शिव परंपरा ने वह विधि छिपाकर नहीं रखी। हठयोगप्रदीपिका का आरंभ ही इस नमन से है कि योग विद्या आदिनाथ से मिली। अर्थात् शिव से। शिवसंहिता पूरी की पूरी शिव और पार्वती के संवाद के रूप में रची गई है। विज्ञानभैरव तंत्र में पार्वती पूछती हैं कि सत्य का स्वरूप क्या है, और उत्तर में शिव एक सौ बारह धारणाएँ या ध्यान-विधियाँ बताते हैं। इनमें से अनेक इतनी सरल हैं कि आश्चर्य होता है। जैसे, एक विधि बताई गई है। उसके मुताबिक, श्वास के आवागमन के बीच के संधि-बिंदु पर जागरूक रहना है।
कश्मीरी शैव दर्शन के मुताबिक, सरल भाषा में इन उपायों को समझें तो पहली साधना शरीर, इंद्रियों और श्वास जैसे साधनों के सहारे चलती है। दूसरी मंत्र, भावना और सूक्ष्म मानसिक साधना का सहारा लेती है। तीसरी शांभव, जहाँ सहारा लगभग छूट जाता है और केवल दृष्टि बची रहती है और चौथी को अनुपाय कहा गया। अनुपाय इसलिए कि उस अवस्था में कोई विधि शेष नहीं रहती। वहाँ पहुँचना नहीं होता, पहचानना होता है। यानी, पहली तीन अवस्थाएं साधन हैं और चौथा साध्य।
इस दृष्टि से जब हमें लगता है कि मैं अलग हूं, अधूरा हूं और मुझे किसी सहारे की जरूरत है, तब हम शिव के सामने जल चढ़ाते हैं, बेलपत्र अर्पित करते हैं, मूर्ति के सामने खड़े होते हैं। यहां साधक और शिव दो हैं। इन दोनों के बीच अर्पण संबंध का माध्यम बनता है। यह साधना की सबसे सरल और बाहरी अवस्था है। इसके बाद ही साधना का स्वरुप बदलता है। जब मन में ‘नमः शिवाय’ मंत्र उतरता है तो हाथ में जल या बेलपत्र हो न हो, शिव-स्वरुप दिखाई दे या न दे, मंत्र भीतर चलता रहता है। शांभव अवस्था में मंत्र का सहारा भी धीरे-धीरे छूट जाता है। अब केवल जागरूकता का सहारा होता है। मान लीजिए कि भीतर क्रोध उठ रहा है तो क्रोध को दबाते नहीं, उसके साथ बहते भी नहीं। बस उसे देखते हैं। यही देखने की जागरूकता शांभव की दिशा है।
और फिर आती है अनुपाय की अवस्था। यहां देखने का अभ्यास भी अभ्यास नहीं रह जाता। व्यक्ति को बार-बार खुद को रोकने या सजग करने की जरूरत नहीं पड़ती। अब बहिर्यात्रा की जगह अंतर्यात्रा हो जाती है। जागरूकता जीवन का स्वभाव बनने लगती है। इंद्रियों का विषयों की ओर अनावश्यक बहिर्गमन घटता है और चेतना भीतर स्थिर होने लगती है। यही प्रत्याहार की दिशा है। इसके आगे धारणा, ध्यान और समाधि की भूमि तैयार होती है। इस सावन में इसी प्रवेश द्वार पर पहुंचने का संकल्प फलीभूत हो, यही कामना और इसी के लिए साधना होनी चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

