हृदय रोग के प्रति हमारी पारंपरिक समझ नए-नए वैज्ञानिक शोधो के कारण तेजी से बदल रहे हैं। अब तक हम मानते थे कि धमनियों में कोलेस्ट्रॉल समय के साथ ठीक वैसे जमा होते जाता है, जैसे पाइपों में कचरा। यह जमाव तय मानकों से ज्यादा होता है तो खतरा उत्पन्न होता है। पर, आधुनिक विज्ञान ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। नए अनुसंधानों से पता चला है कि हृदयाघात या ब्रेन हैंमरेज के कारण काल के गाल में समां जाने वाले लगभग पच्चीस फीसदी लोगों की कोई मेडिकल हिस्ट्री नहीं होती है। सवाल वाजिब है कि पैथोल़ॉजिकल रिपोर्टों में हृदयाघात के लक्षण न होने के बावजूद लोग हृदयाघात के शिकार क्यों हो जाते हैं? नवीनतम शोध से इसी रहस्य का खुलासा हुआ है। इससे एक बात तय है कि हमें अपने हृदय को स्वस्थ रखने के मामले में व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की जरुरत है। केवल लिपिड प्रोफाइल की सकारात्मक रिपोर्ट देखकर खुश होने से बात नहीं बनने वाली।
हालिया शोध के मुताबिक, धमनियों में जमा कोलेस्ट्रॉल पैथोलॉजिकल पैरामीटर के अनुरुप होने के बावजूद लंबी अवधि में अपना स्वरुप बदलकर क्रिस्टल का रूप धारण कर लेता है। बिल्कुल कांच के बारीक टुकड़ों की तरह। उसका आयतन कोलेस्ट्रॉल की तुलना में पैतालीस फीसदी तक बढ़ जाता है और वह सुई जैसा नुकीला बन जाता है। यह वृद्धि ‘फेज ट्रांजेक्शन’ (तरल से ठोस बनने) के दौरान होती है। कोलेस्ट्रॉल का यही स्वरुप धमनी की कोमल दीवारों को क्षतिग्रस्त करता है। इससे हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली मैक्रोफेज जैसी श्वेत रक्त कोशिकाएं इन क्रिस्टलों को खत्म करने के लिए दौड़ पड़ती हैं। टी-कोशिकाएं भी साथ आती हैं, जिससे वहां वसा और मृत कोशिकाओं का एक खतरनाक मलबा जमा होता है। नतीजतन, बचाव की यह कोशिश ही विनाश का कारण बनती है। इस प्रक्रिया में निकलने वाले इन्फ्लेमेटरी रसायन धमनी की सूजन बढ़ा देते हैं। दशकों तक चलने वाली यह निरंतर सूजन प्लाक को अस्थिर कर देती है, जिसके फटने से बनने वाले रक्त के थक्के अंततः हार्ट अटैक या स्ट्रोक की वजह बनते हैं।
कोरोना महामारी के बाद से अक्सर देखा गया कि क्लीनिकली स्वस्थ भी व्यक्ति भी हृदयाघात का शिकार हुआ। हृदय रोग के इस नए पहलू से अज्ञात कारणों से होने वाले हृदयाघात की गुत्थी सुलझ गई लगती है। ‘साइंटिफिक अमेरिकन’ पत्रिका के ताजा अंक में प्रकाशित शोध में इस नए खतरे का खुलासा करते हुए कहा गया है कि शरीर में सूजन का सूचक ‘सी-रिएक्टिव प्रोटीन’ का बढ़ा हुआ स्तर दिल के दौरे के जोखिम को तीन गुना तक बढ़ा सकता है। इस रिपोर्ट में बोस्टन स्थित ब्रिघम एंड विमेंस हॉस्पिटल के शोधवेत्ता और हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. पॉल रिडकर के परीक्षणों का हवाला दिया गया है। डॉ पॉल रिडकर ने प्रमाणित किया है कि जिन लोगों का कोलेस्ट्रॉल स्तर सामान्य था, लेकिन सूजन अधिक थी, उन्हें सूजन कम करने वाली दवाओं से अप्रत्याशित सुरक्षा मिली। इससे स्पष्ट हुआ कि अब हमें केवल कोलेस्ट्रॉल की जांच तक नहीं रुकना है, बल्कि शरीर के भीतर छिपे इस अदृश्य सूजन को भी नियंत्रित करना होगा।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लिए धमनियों का सूजन भले किसी बड़े रहस्य पर से पर्दा उठाने के समान है। पर, आयुर्वेद और योगशास्त्र के ऋषियों ने हज़ारों साल पहले इस रहस्य को समझ लिया था। उन्होंने कहा था, “मनुष्य केवल हड्डी और मांस का पुतला नहीं है। उसके भीतर अननमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश के रुप में पाँच परतें हैं, जो एक दूसरे से गूंथे हुए हैं। इसलिए, किसी एक कोश में उथल-पुथल होती है, हृदय को उसका मूल्य चुकाना पड़ता है। दूसरी तरफ, आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में हृदय रोग को ‘हृद्रोग’ कहा गया है। यह रोग तब होता है, जब शरीर के दोष (वात, पित्त, कफ) रस धातु को दूषित करके हृदय में असंतुलन पैदा करते हैं।
इस बात को चंद उदाहरणों के जरिए समझा जा सकता है। अन्नमय कोश वह स्थूल शरीर है जो अन्न से पलता है और अन्न से ही विकृत होता है। हृदय की धमनियाँ इसी कोश का हिस्सा हैं। आज के युग में हमारे खान-पान में प्रसंस्कृत, रासायनिक, तैलीय पदार्थों का समावेश हो चुका है, जो इस कोश को खोखला करता जा रहा है। लैंसेट पत्रिका में 195 देशों के विश्लेषण से एक चौंकाने वाला निष्कर्ष निकला। उसके मुताबिक, विश्व में प्रतिवर्ष होने वाली मौतों में 11 मिलियन मौतें केवल खराब खानपान के कारण होती हैं। हमारे खानपान में सोडियम की अधिकता, साबुत अनाज की कमी, और फल-सब्ज़ियों का अभाव होता है। ये सभी सीधे हृदयाघात और आघात को निमंत्रण देते हैं। इसी तरह प्राणमय कोश की बात करें तो यह सबसे ज़्यादा तीन कारणों अनियमित नींद, शारीरिक निष्क्रियता और श्वास-विकार से विकृत होता है। इनमें से किसी एक की भी अनदेखी हृदय के लिए जानलेवा हो जाती है। तन-मन एक दूसरे से गूंथे होने के कारण मन की अशुद्धियां तन को भी प्रभावित करती हैं। तभी आचार्य वाग्भट ने अष्टांगहृदयम् में लिखा, ‘मनसो हि प्रसादेन शरीरमारोग्यमश्नुते।’ मन की प्रसन्नता से ही शरीर स्वास्थ्य को प्राप्त होता है।
योगशास्त्र और योगियों के अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि योग एक वैज्ञानिक और प्रमाणिक चिकित्सा की तरह कार्य करता है, जो सूक्ष्म स्तर पर दोषों का शमन करता है। इसलिए योग साधकों को षट्कर्म, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार की किसी एक क्रिया करने की सलाह दी जाती है। षट्कर्म में जल नेति, शंखप्रच्छालन व कपालभाति, आसनों में सर्वांगासन, भुजंगासन व उट्रासन, प्राणायामों में नाड़ी शोधन, भस्त्रिका व शीतली और प्रत्याहार में योगनिद्रा प्रमुख हैं। हठयोग प्रदीपिका मे कहा गया है कि कपालभाति समस्त व्याधियों का नाश करती है और कफ दोषों को पूर्णतः मिटाती है। आसनो में उष्ट्रासन के बारे में बिहार योग विद्यालय के परमाचार्य घोषणा करते हैं – “रक्त वाहिनी नलिकाओं को मजबूत बनाने वाले इस आसन को व्यक्ति नियमित रुप से करता रहे तो उसे दिल का रोग कभी नहीं होगा, यह निश्चित है।“
वैसे योगाचार्य की सलाह से ही कोई भी अभ्यास करना हितकर होता है। पर, इसमें दो मत नहीं कि ‘पंचकोशों’ का शोधन करने का संकल्प लेना समय की मांग है। इस दिशा में सजग प्रयास से ही स्वस्थ हृदय और दीर्घायु जीवन की गारंटी मिल सकती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

