मनुष्य ने विकास के अनेक सोपान तय किए हैं। पर, आंतरिक शांति और आध्यात्मिक उत्थान चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। ऐसे में गोस्वामी तुलसीदास जी का कालजयी निष्कर्ष, ‘कलि केवल हरि नाम अधारा’ हर दृष्टिकोण से व्यावहारिक जान पड़ता है। रामनवमी के पावन अवसर पर जब हम मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के अवतरण का उत्सव मनाने वाले हैं, तब राम नाम की इस महिमा पर विचार करना और भी प्रासंगिक हो गया है। इसलिए कि यह नाम केवल एक शब्द नहीं, बल्कि चेतना को जागृत करने वाली एक दिव्य ध्वनि है।
श्रीरामचरितमानस के बालकांड में राम नाम की महिमा का वर्णन अत्यंत गहन और भावपूर्ण है। भारतीय वांग्मय में अनेक कथाएं भी हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि स्वयं भगवान से भी बड़ा उनका ‘नाम’ है। राम सेतु की कथा तो हम जानते ही हैं। श्रीराम की विशाल वानर सेना लंका पर चढ़ाई करने के लिए तत्पर थी और समुद्र पार करने का कोई उपाय न था। तब, वानर-वीर नल और नील आगे बढ़े। असाधारण श्रद्धा व विश्वास के साथ पत्थरों पर राम नाम लिखकर समुद्र में डालते गए। ताकि सेतु बन सके। राम नाम की शक्ति काम आ गई। पत्थर समुद्र में तैरने लगे और सेतु का निर्माण हो गया। लेकिन जब श्रीराम लीला की और स्वयं एक पत्थर समुद्र में डाला, तो वह डूब गया। इस लीला के जरिए श्रीराम ने स्वयं घोषित कर दिया कि नाम की शक्ति देह की शक्ति से विशाल है।
इसलिए संत तुलसीदास कहते हैं – “कहाँ कहौ लगि नाम बड़ाई….।“ मैं नाम की बड़ाई कहाँ तक कहूँ, स्वयं श्रीराम भी अपने नाम के गुणों का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते। इसलिए राम का नाम महामंत्र है, जो कलयुग के समस्त पापों का नाश करने वाला है। शिव जी भी माता पार्वती को “राम रामेति रामेति” को तारक मंत्र बताते हुए कहते हैं कि इस मंत्र का एक बार जप विष्णुसहस्रनाम के जप के समतुल्य है। यह संसार के लिए भी संदेश है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए “नाम” के प्रति अनन्य प्रेम ही पर्याप्त है। तभी रत्नाकर डाकू उल्टा नाम जप कर भी भाव सागर पार कर गए और महर्षि वाल्मीकि कहलाए। इन कथाओं का सार यही है कि श्रीराम नाम का प्रभाव भाव और कुभाव, दोनों ही स्थितियों में कल्याणकारी होता है।
तभी इस कलिकाल में भी तमाम संतों ने राम की महिमा गाई और खुद को धन्य कर लिया। मीराबाई तो श्रीकृष्ण की अनन्य उपासिका थीं और कहती थी – “मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोई।” पर, भक्ति की चरमावस्था में पहुंचकर वही मीराबाई बोल उठी थीं – “पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।“ और सूरदास की “अखियाँ हरि दर्शन की प्यासि” थी। पर एक समय वे भी बोल उठे, “जो तू राम नाम चित धरतो, तेरो जनम सुधरतो।” निर्गुण संत कबीरदास इस सत्य को और भी सरल शब्दों में कह गए, “कबीरा सब जग निर्धना, धनवंत नहीं कोय। धनवंत सोई जानिए, जाके राम नाम धन होय॥” इस संसार में वास्तव में कोई धनी नहीं है, सच्चा धनवान वही है, जिसके पास “राम नाम” का धन है। सत्यानंद जी महाराज जैसे संत ने तो श्रीराम शरणम् नाम से संस्था बनाकर “राम महामंत्र” को आध्यात्मिक आंदोलन बना दिया था।
योगशास्त्र की दृष्टि से भी ‘नाम जप’ चित्त की वृत्तियों को नियंत्रित करने का एक अत्यंत वैज्ञानिक और सूक्ष्म मार्ग है और यही योग का लक्ष्य भी है। सच तो यह है कि राम नाम का रहस्य श्रद्धा के शिखर और विज्ञान की सूक्ष्मता के मिलन बिंदु पर स्थित है। राम नाम के उच्चारण से एक ऐसी ध्वनि तरंग निकलती है, जो मनुष्य के मानसिक और शारीरिक तंत्र पर गहरा प्रभाव डालती है। शोध बताते हैं कि इस नाम के निरंतर जाप से उत्पन्न होने वाली कंपन मस्तिष्क की अल्फा तरंगों को बढ़ाती हैं, जिससे साधक को गहरे विश्राम और स्पष्टता का अनुभव होता है। दूसरी तरफ विश्वास के धरातल पर राम नाम वह सेतु है जो जीव को उसके मूल अस्तित्व यानी परमात्मा से जोड़ता है।
राम नाम की महत्ता को लेकर तमाम वैदिक उद्घोषणाओं के बावजूद, कई बार हमारे मन में भ्रम उत्पन्न होता है कि भगवान शिव किस राम की आराधना करते हैं? कहने का भाव यह कि हम तो दशरथ नंदन श्रीराम की आराधना करते हैं, जो त्रेता युग के हैं। लेकिन वे? संत कबीर इस भ्रम को दूर करते हैं। वे कहते हैं – “एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट घट में बैठा। एक राम को सकल परासा, एक राम त्रिभुवन से न्यारा।।“ यानी हम अयोध्या के जिस मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की पूजा करते हैं, वे प्रथम साकार रूप हैं। श्रीरामचरितमानस में वर्णन है – जब जब होइ धरम कै हानी…..तब तब प्रभु धरि बिबिध शरीरा….। जब-जब संसार में धर्म का ह्रास होता है और असुरों का प्रभाव बढ़ जाता है, तब-तब प्रभु विभिन्न रूप धारण कर अवतार लेते हैं और भयरहित समतामूलक समाज का निर्माण करते हैं।
संत कबीर बताते हैं कि दूसरा राम “राम चेतना” का वह अंश है, जो शरीर के भीतर स्पंदित होता है और दृश्य जगत का साक्षी बनता है। तीसरा राम समस्त सृष्टि के विस्तार का आधार है। यह वह आत्म-तत्व है, जो कण-कण में व्याप्त है और जिसके होने से ही ब्रह्मांड की संरचना बनी हुई है। चौथा राम इन तीनों अवस्थाओं से न्यारा है। वह परमात्मा है, जो त्रिगुणमयी माया और त्रिभुवन से सर्वथा परे है। यह वह परम सत्य है, जिसे शब्दों में बांधना असंभव है और इसीलिए कबीर कहते हैं कि इस चौथे राम का मर्म विरले ही समझ पाते हैं। जाहिर है कि शिव जी उसी राम की आराधना करते हैं।
भारतीय संत परंपरा की एक अद्भुत विशेषता रही है कि भले ही उनके आराध्य अलग-अलग रूपों में प्रकट होते हों, परं साधना का केंद्र एक ही तत्व पर आकर स्थिर हो जाता है। यही वह सूत्र है, जो गोस्वामी तुलसीदास से लेकर मीराबाई, सूरदास, कबीरदास, गुरु नानक देव और मलूकदास तक एक समान रूप से प्रवाहित होता है। आइए, हम सब भी उस धारा में डुबकी लगाते हुए अपने जीवन को धन्य करें।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

