कुंडलिनी क्या है: ऊर्जा का सुप्त स्रोत
कुंडलिनी ऊर्जा भारतीय योग परंपरा का सबसे रहस्यमयी आयाम है, जो मेरुदंड के मूल में सुप्त अवस्था में स्थित रहती है और साधक के भीतर गहन रूपांतरण की संभावना जगाती है।
भारतीय योग परंपरा में “कुंडलिनी” शब्द एक रहस्यमयी और शक्तिशाली ऊर्जा का प्रतीक है। इसका प्रारंभिक उल्लेख हठयोग प्रदीपिका जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है, जहाँ इसे “मुक्ति की कुंजी” कहा गया है—एक सर्प के समान कुंडलित, जो मेरुदंड के मूल में सुप्त अवस्था में स्थित रहती है। स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने इसे आत्म-जागरण की प्रक्रिया का मूल आधार माना है, जो साधक को उसकी सीमित चेतना से ऊपर उठाकर ब्रह्म चेतना की ओर ले जाती है।
स्वामी सत्यानंद के अनुसार, कुंडलिनी केवल एक प्रतीकात्मक अवधारणा नहीं, बल्कि एक जीवंत ऊर्जा है, जो ध्यान, प्राणायाम और मंत्रों के माध्यम से जागृत की जा सकती है। वे स्पष्ट करते हैं कि “जो कुंडलिनी को जानता है, वही योग को जानता है”—यह ऊर्जा जब जागृत होती है, तो साधक के भीतर गहन आध्यात्मिक अनुभव, भावनात्मक परिवर्तन और शारीरिक संवेदनाएँ उत्पन्न होती हैं।
हालाँकि आधुनिक विज्ञान ने अभी तक कुंडलिनी की अवधारणा को पूर्णतः स्वीकार नहीं किया है, फिर भी 1928 में कुछ भारतीय योगियों ने बॉम्बे मेडिकल यूनियन के समक्ष इसके प्रभावों का प्रदर्शन किया था। इस प्रदर्शन की रिपोर्ट प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका नेचर में प्रकाशित हुई, जिसमें कुंडलिनी की शारीरिक क्रियाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया।
मानव अस्तित्व दो स्तरों पर कार्य करता है—स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर। सूक्ष्म शरीर आभामंडल के रूप में हमारे चारों ओर विद्यमान होता है, जिसमें प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान जैसे ऊर्जा प्रवाह शामिल होते हैं। जहाँ स्थूल शरीर भौतिक ऊर्जा को संचित करता है, वहीं सूक्ष्म शरीर दिव्य ऊर्जा का भंडार होता है। स्वामी सत्यानंद सरस्वती के अनुसार, कुंडलिनी की शक्ति इन्हीं सूक्ष्म परतों में स्थित होती है और जब यह सक्रिय होती है, तो साधक के जीवन में एक गहन रूपांतरण की प्रक्रिया आरंभ होती है।
कुंडलिनी: शरीर में ऊर्जा केंद्रों की संरचना
योगशास्त्र में वर्णित कुंडलिनी शक्ति केवल एक आध्यात्मिक अवधारणा नहीं है, बल्कि शरीर के सूक्ष्म और स्थूल स्तर पर स्थित ऊर्जा केंद्रों की वैज्ञानिक व्याख्या भी है। स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने इसे “आत्मिक विकास की सीढ़ी” कहा है, जो साधक को पशु चेतना से मानव चेतना और अंततः ब्रह्म चेतना की ओर ले जाती है। उनके अनुसार, कुंडलिनी शक्ति शरीर के मेरुदंड के साथ स्थित आठ प्रमुख चक्रों के माध्यम से सक्रिय होती है—मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा, सहस्रार और बिंदु।
ये चक्र भौतिक रूप में नहीं होते, बल्कि ऊर्जा के रूप में विद्यमान होते हैं। इसलिए शरीर की शारीरिक चीर-फाड़ में इनका पता नहीं चलता। स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने स्पष्ट किया कि ये चक्र मस्तिष्क के अप्रकाशित केंद्रों से जुड़े होते हैं और ध्यान, प्राणायाम तथा मंत्रों के माध्यम से जागृत किए जा सकते हैं।
मूलाधार चक्र, जो पेल्विक फ्लोर में स्थित होता है, को उन्होंने आध्यात्मिक विकास का प्रथम चरण माना है। इसके जागरण से शरीर में गर्मी, कंपन और ऊपर की ओर ऊर्जा प्रवाह की अनुभूति होती है। स्वाधिष्ठान चक्र अंडकोष और डिम्बग्रंथि से जुड़ा होता है, और इसमें जल तत्व की प्रधानता होती है। इसके जागरण से भय का क्षय, अंतर्ज्ञान की वृद्धि और सूक्ष्म सत्ता की अनुभूति होती है।
मणिपुर चक्र नाभि के पास स्थित होता है और यह पाचन तथा ऊष्मा नियंत्रण से जुड़ा है। इसे स्वामी सत्यानंद ने “सक्रियता और उपलब्धि का केंद्र” कहा है। अनाहत चक्र, जिसे हृदय केंद्र कहा जाता है, करुणा, प्रेम और रचनात्मकता को जागृत करता है। उन्होंने इसे कवियों, कलाकारों और संगीतकारों की प्रेरणा का स्रोत बताया।
इन चक्रों की सक्रियता से व्यक्ति को गहन आध्यात्मिक अनुभव होते हैं, जो कभी-कभी आध्यात्मिक उत्क्रांति के रूप में प्रकट होते हैं। यह प्रक्रिया न केवल आत्मिक विकास की ओर ले जाती है, बल्कि मानसिक संतुलन और सामाजिक संवेदनशीलता को भी सुदृढ़ करती है।
मस्तिष्क में ईश्वर बिंदु: आध्यात्मिक ऊर्जा का वैज्ञानिक केंद्र
1990 के दशक में न्यूरोसाइकोलॉजिस्ट माइकल पर्सिंगर और न्यूरोलॉजिस्ट वी.एस. रामचंद्रन ने मस्तिष्क में एक विशेष क्षेत्र की पहचान की, जिसे “गॉड स्पॉट” कहा गया। यह क्षेत्र टेम्पोरल लोब में स्थित होता है और धार्मिक या आध्यात्मिक चर्चाओं के दौरान अत्यधिक सक्रिय हो जाता है। PET स्कैन की रिपोर्टों में यह स्पष्ट रूप से देखा गया कि जब व्यक्ति ईश्वर, धर्म या ध्यान से संबंधित विषयों पर ध्यान केंद्रित करता है, तो इस क्षेत्र में विद्युत गतिविधियाँ तीव्र हो जाती हैं। पर्सिंगर के प्रयोगों में यह पाया गया कि जब टेम्पोरल लोब को कृत्रिम रूप से उत्तेजित किया गया, तो प्रतिभागियों ने दिव्य अनुभूतियाँ, शरीर से बाहर निकलने के अनुभव, पूर्व जन्म की स्मृतियाँ और रहस्यमयी घटनाओं का अनुभव किया। उन्होंने यह भी बताया कि इन अनुभवों की अवधि कुछ ही क्षणों की होती है, परंतु उनका प्रभाव जीवन भर बना रहता है।
स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने अपने योग साहित्य में सहस्रार और बिंदु चक्र को चेतना के उच्चतम केंद्र बताया है। उनके अनुसार, ध्यान की अवस्था में जब साधक चिदाकाश धारणा करता है—अर्थात् बंद आँखों के भीतर भृकुटि के मध्य, बाएँ, दाएँ, ऊपर और नीचे की ओर ध्यान केंद्रित करता है—तो मस्तिष्क के दोनों टेम्पोरल लोब सक्रिय होते हैं। यह प्रक्रिया प्राचीन भारत के ऋषियों द्वारा विकसित की गई थी, जो आधुनिक न्यूरोसाइंस की खोजों से मेल खाती है।
इस प्रकार, “गॉड स्पॉट” की अवधारणा न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह योग और ध्यान की परंपराओं में सहस्रार चक्र की भूमिका को भी पुष्ट करती है। यह वह बिंदु है जहाँ विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे से संवाद करते हैं—जहाँ मस्तिष्क की विद्युत तरंगें आत्मा की गहराइयों को छूती हैं।
ईश्वर बिंदु की उत्तेजना का प्रभाव: चेतना की सीमाओं से परे
मस्तिष्क के टेम्पोरल लोब में स्थित “गॉड स्पॉट” की अवधारणा ने यह सिद्ध किया है कि आध्यात्मिक अनुभव केवल भावनात्मक या सांस्कृतिक नहीं, बल्कि न्यूरोवैज्ञानिक स्तर पर भी घटित होते हैं। माइकल पर्सिंगर ने अपने प्रयोगों में जब इस क्षेत्र को कृत्रिम रूप से उत्तेजित किया, तो प्रतिभागियों ने रहस्यमयी अनुभवों की श्रृंखला महसूस की—जैसे शरीर से बाहर निकलने की अनुभूति, पूर्व जन्म की स्मृतियाँ, दिव्य उपस्थिति का आभास और परामानसिक संकेतों की प्राप्ति।
पर्सिंगर के अनुसार, इन अनुभवों की अवधि कुछ ही क्षणों की होती है, परंतु उनका प्रभाव व्यक्ति के पूरे जीवन पर पड़ता है। यह अनुभव इतना गहन होता है कि व्यक्ति की सोच, भावनात्मक संरचना और जीवन के प्रति दृष्टिकोण में स्थायी परिवर्तन आ सकता है। उन्होंने यह भी पाया कि इन अनुभवों की गहराई व्यक्ति की भावनात्मक तीव्रता पर निर्भर करती है—जितनी तीव्र भावना, उतना गहरा आध्यात्मिक अनुभव।
स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने प्राचीन योग परंपरा में जिस “चिदाकाश धारणा” का उल्लेख किया है, वह इसी गॉड स्पॉट की सहज उत्तेजना का माध्यम है। इस अभ्यास में साधक ध्यान की मुद्रा में बैठकर बंद आँखों के भीतर भृकुटि के मध्य, बाएँ, दाएँ, ऊपर और नीचे की ओर ध्यान केंद्रित करता है। यह प्रक्रिया मस्तिष्क के दोनों टेम्पोरल लोब को सक्रिय करती है, जिससे दिव्य अनुभूतियाँ उत्पन्न होती हैं।
इस प्रकार, आधुनिक न्यूरोसाइंस और प्राचीन योग परंपरा एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं। जहाँ पर्सिंगर और रामचंद्रन ने प्रयोगशाला में ईश्वर बिंदु की उपस्थिति को सिद्ध किया, वहीं स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने ध्यान और धारणा के माध्यम से इसकी अनुभूति को जीवन में उतारने का मार्ग दिखाया। यह वह बिंदु है जहाँ विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे से संवाद करते हैं—जहाँ मस्तिष्क की विद्युत तरंगें आत्मा की गहराइयों को छूती हैं।
इस अध्याय में हमने देखा कि कुंडलिनी ऊर्जा चक्रों और मस्तिष्कीय केंद्रों के माध्यम से साधक को आत्मिक विकास की ओर ले जाती है। अगले भाग में हम इसके मनो-शारीरिक प्रभावों और अनुभवजन्य परिणामों को समझेंगे, जो साधक के जीवन को गहराई से बदल देते हैं।

