Author: Kishore Kumar

Spiritual journalist & Founding Editor of Ushakaal.com

मातृत्व की कोमल भावभूमि में जीवन का अंकुर प्रस्फुरित होना प्रकृति की चिरंतन लीला का एक दिव्य अनुष्ठान है। यह सृष्टि का सनातन विधान है, जहाँ प्रेम, त्याग और संरक्षण की छाया में नया जीवन आकार लेता है। जब मातृत्व की यह भावभूमि योग के प्रकाश से आलोकित होती है, तो ब्रह्मी चेतना का विकास होता है, जो आनंदमय जीवन और संतुलित समाज का आधार बनता है।भारतीय दर्शन में गर्भसंस्कार का विशेष महत्व है। मान्यता है कि गर्भकाल में माता के विचार, भावनाएँ और कर्म गर्भस्थ शिशु की मानसिकता, संस्कार और भविष्य के व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित करते हैं।…

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भारत में कोविड-19 के मामले एक बार फिर तेजी से बढ़ रहे हैं। चार साल पहले इस अनजान बीमारी ने लाखों लोगों की जान ली थी, और आज भी इसके दंश को लोग झेल रहे हैं। एक तरफ फेफड़े की बीमारियां तेजी से बढ़ गई तो दूसरी ओर हृदयाघात आम बात हो गई है। ऐसे में, फिर से कोरोना ने दस्तक दी है तो चिंता की लकीरें खिंच जाना वाजिब ही है। इसके साथ ही योग को फिर से एक प्रभावी हथियार के रूप में देखा जाने लगा है। इसलिए कि कोरोनाकाल में षट्कर्मों में विशेष तौर से नेति व…

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वैदिक साक्ष्य इस बात के प्रमाण हैं कि महाभारत में संजय ने दूर बैठकर अपनी दिव्य-दृष्टि से कुरुक्षेत्र के युद्ध की सजीव व्याख्या की थी। सनातन काल से अनेक संत-महात्मा अपनी अंतर्दृष्टि के बल पर भविष्य की झलक पाते रहे हैं। परमहंस श्री उड़िया बाबा ने 1940 के दशक में भविष्यवाणी की थी कि पाकिस्तान का पतन होगा, यानी इसके निर्माण से पूर्व ही इसके भविष्य की झलक पा ली थी। ज्योतिषियों ने भी ऐसी ही भविष्यवाणियाँ की। आज जैसे हालात उभर रहे हैं, लोगों का यह विचार बलवती होता जा रहा है कि क्या यही वह कालखंड है, जिसका…

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विदुषी तोमर //ग्यारह मई मेरे जीवन की उन दुर्लभ स्मृतियों में से एक बन गया है, जिसे मैं शब्दों में समेटने की कोशिश तो कर रही हूँ, पर शायद ये अनुभव शब्दों से कहीं आगे की बात हैं।हमने दिल्ली के त्यागराज स्टेडियम में बिहार स्कूल ऑफ योग द्वारा आयोजित साधना सत्र में भाग लिया। जैसे ही उस पावन परिसर में कदम रखा, लगा जैसे किसी और ही लोक में प्रवेश कर लिया हो—वहाँ की शांति, वहाँ के लोग, वहाँ का वातावरण… सब कुछ भीतर तक छू गया। हर चेहरा एक अलग तरह की शांति बिखेर रहा था। वहाँ कोई भी…

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मनुष्य की अनूठी क्षमता है कि वह अपने विचारों के अनुरूप परिवर्तित हो सकता है। जीवन में दो प्रक्रियाएँ हैं, बनना यानी साधना के माध्यम से नए गुण अपनाना और होना यानी उन गुणों की अभिव्यक्ति। व्यक्तित्व का निर्माण समाज, संस्कृति, शिक्षा और प्रकृति की छह शक्तियों यथा, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद व मात्सर्य से होता है। ये शक्तियां शुरू में मित्र के रूप में व्यक्तित्व को आकार देती हैं, लेकिन अनियंत्रित होने पर शत्रु बन जाती हैं। जब मन और आत्मा का संबंध जुड़ता है, तो ये शक्तियाँ विकास में बाधक लगने लगती हैं। संयम के माध्यम से इन्हें नियंत्रित, संशोधित और उत्कृष्ट किया जा सकता है। कैसे? क्या घंटों…

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अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस अगले महीने ही है। उसे व्यापक स्तर पर मनाने की तैयारियां जोर-शोर से की जा रही हैं। जोर इस बात पर है कि शरीर को स्वस्थ्य रखने के लिए योगाभ्यास किया जाना चाहिए। योग के जरिए ईश्वरानुभूति की बात आम आदमी के संदर्भ में बेमानी प्रतीत होती है, इसलिए यह मुद्दा गौण प्राय: ही है। पर बीसवीं सदी के महान संत स्वामी शिवानंद सरस्वती और योग की कुछ अन्य परंपराओं के साधक सदैव योग का अंतिम लक्ष्य ईश्वर-दर्शन मानते रहे हैं। आज भी स्वामी सत्यानंद सरस्वती, स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती, स्वामी नित्यानंद आदि योग परंपराओं में योग का…

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हर महान यात्रा में एक नया मोड़ आता है। योग के द्वितीय अध्याय के रुप में वह मोड़ आ चुका है, जो अभी-अभी अपने प्रारंभिक कदमों के साथ विश्व के सामने उभर रहा है। जब भगवान राम को वनवास का आदेश मिला था, तो वह एक मोड़ था, नया अध्याय था, जो उन्हें राजसुख छोड़कर सत्य, धर्म और सेवा के पथ पर ले गया। उनकी यह यात्रा केवल व्यक्तिगत त्याग की नहीं, बल्कि समाज के कल्याण और अधर्म पर धर्म की विजय की थी। इसी तरह योग के मामले में भी एक नया मोड़ आया तो नए अध्याय की शुरुआत…

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जब मनुष्य अपने आत्मस्वरूप — सत्य, करुणा और विवेक से विमुख हो जाता है, तब वह हिंसा और विनाश के पथ पर बढ़ता है। आतंकवाद इसी आत्म-विमुखता का चरम रूप है। यह केवल एक राजनीतिक षड्यंत्र या सामाजिक विद्रोह नहीं, बल्कि उस सनकी मनोभाव का विस्फोट है, जिससे घृणा, क्रोध और वैचारिक कट्टरता मनुष्य की चेतना पर पूरी तरह हावी हो जाते हैं।आतंकवाद केवल एक सामाजिक या राजनीतिक समस्या नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक विकृति है। यह घृणा, क्रोध, और वैचारिक कट्टरता से उपजा वह सनकी मनोभाव है, जो संज्ञानात्मक पक्षपात और भावनात्मक असंतुलन का शिकार होकर तर्क,…

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अब यह कोई रहस्य नहीं रहा कि आधुनिक जीवन की जटिलताओं में ध्यान यानी मेडिटेशन मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक संतुलन का सरल, प्रभावी उपाय है। चाहे मानसिक तनाव कम करना हो, एकाग्रता बढ़ानी हो, भावनात्मक संतुलन बनाना हो, स्वास्थ्य जीवन जीना हो या आत्म-खोज के मार्ग पर आगे बढ़ना हो, ध्यान ही इन सबकी कारगर और आजमायी हुई दवा है।जीवन में ध्यान घटित हो, इसके लिए हमारे संतों और योगियों ने अनेक मार्ग सुझाए, अनेक विधियां बतलाई, जो उनके अनुभवों पर आधारित हैं और आधुनिक विज्ञान भी उन विधियों की पुष्टि करता है। पर, आज पृथ्वी दिवस (22 अप्रैल) है…

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