मानव चेतना की सबसे पहली और स्वाभाविक अनुभूति माँ ही रही है। जब सभ्यता अपनी शैशवावस्था में थी और आदिम समाज मातृत्व की धुरी पर घूमता था, तब सृष्टि के नियामक को भी देवी माँ के रूप में ही पूजा गया। यह केवल आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति और सृजन के प्रति मनुष्य का सीधा और सहज जुड़ाव था। कालक्रम के साथ मानवीय समाज बदला। व्यवस्थाएँ बदलीं और पितृसत्तात्मक ढाँचा प्रभावी हुआ, जिसने परिवार के केंद्र में पिता को निर्णायक भूमिका में ला खड़ा किया। इस सामाजिक रूपांतरण का असर हमारे आध्यात्मिक दृष्टिकोण पर भी पड़ा। ईश्वर को अब पिता, व्यवस्थापक और सर्वोच्च सत्ता के रूप में देखा जाने लगा।
दिलचस्प बात यह है कि इस सामाजिक बदलाव के बावजूद ईश्वर का मातृ-स्वरूप कभी ओझल नहीं हुआ। मनुष्य निराकार और अलौकिक ईश्वर के दार्शनिक नियमों की तुलना में माँ के घनिष्ठ और करुणामय स्वरूप से अधिक गहराई से जुड़ा रहा। बाद में भारतीय संस्कृति ने इस द्वंद्व का एक अत्यंत सुंदर और परिपक्व समाधान निकाला। उसने मातृ और पितृ भाव को अलग करने के बजाय उन्हें एक प्रेमपूर्ण सामंजस्य में पिरो दिया। यही संतुलन आगे चलकर सीता-राम और राधा-कृष्ण के संयुक्त स्वरूपों की आराधना के रूप में हमारे सामने आया, जहाँ शक्ति और ब्रह्म एक-दूसरे के पूरक बन गए।
उपनिषदों, शाक्त दर्शन और पुराणों में यह संपूर्ण विकासक्रम और दार्शनिक चिंतन अत्यंत स्पष्ट रूप में मिलता है। ऋग्वेद के प्रसिद्ध ‘देवी सूक्त’ में वाग्देवी स्वयं घोषणा करती हैं कि वे ही संपूर्ण जगत की संचालिका और आधार शक्ति हैं। इसी प्रकार केनोपनिषद में उमा हैमवती का अत्यंत सुंदर आख्यान आता है। इस कथा में जब अग्नि, वायु और इंद्र जैसे सामर्थ्यवान देवता एक अलौकिक यक्ष का रहस्य नहीं समझ पाते, तब देवी उमा प्रकट होकर उन्हें ब्रह्म की वास्तविक सत्ता का बोध कराती हैं। बाद के शाक्त उपनिषदों, विशेषकर ‘देवी उपनिषद’ में स्पष्ट कहा गया है कि यह संपूर्ण दृश्य-अदृश्य जगत मूलतः मातृ-शक्ति का ही प्रकटीकरण है। मार्कण्डेय पुराण के ‘देवी माहात्म्य’ और ‘देवी भागवत पुराण’ में इस विचार का चरमोत्कर्ष दिखाई देता है, जहाँ देवी को समस्त देवताओं के सामूहिक तेज और करुणा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।
बीसवीं सदी के महान संत स्वामी शिवानंद सरस्वती और उनके पट्शिष्य व बिहार योग विद्यालय के संस्थापक परमहंस स्वामी सत्यानांद सरस्वती तमाम वैदिक ग्रंथों के वाचन और अपनी अनुभूतियों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे। उन्ही निष्कर्षों के आधार पर बिहार योग विद्यालय की ओर से “देवी” नाम पुस्तक की रचना की गई। उसके मुताबिक, ईश्वर का मातृ-स्वरूप केवल श्रद्धा और उपासना का विषय नहीं, बल्कि सृष्टि और जीवन के मूल सत्य को समझने की कुंजी है। माँ केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि पोषण, संरक्षण, करुणा और सृजन की जीवंत अभिव्यक्ति है। भारतीय मनीषा ने इसी अनुभव को व्यापक बनाकर समस्त सृष्टि में मातृशक्ति की उपस्थिति देखी। यहाँ देवी और देवता के बीच श्रेष्ठता का प्रश्न नहीं, बल्कि उस परम सत्ता की पूर्णता का बोध है, जिसमें चेतना और शक्ति, ज्ञान और करुणा, सृजन और संरक्षण अभिन्न हैं।

