नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की… गोकुल के भगवान की, जय कन्हैया लाल की… जन्माष्टमी के मौके पर ब्रज में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में और सरहद पार भी ये शब्द गुंजायमान हैं। पर उत्सव, उल्लास और उमंग के परे राधा, गोपियां, रासलीला और श्रीकृष्ण की बांसुरी की सुमधुर धुन… आदि के आध्यात्मिक संदेश भी कुछ कम नहीं।
कृष्ण भक्ति आंदोलन के तमाम संत कहते रहे हैं कि श्रीकृष्ण को मायावादी दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। उनके नाम, उनके रूप, उनके गुणों और उनकी लीलाओं में अंतर नहीं है। वह परब्रह्म हैं। पर हम सब श्रीकृष्ण की बहिरंग शक्ति से मोहित हैं, जो माया के सिवा कुछ भी नहीं है। इसलिए जयदेव की कालजयी रचना गीतगोविंद के बारे में कहा जाता है कि भौतिक इंद्रियों को तुष्ट करने वालों को इसे नहीं पढ़ना चाहिए। क्यों? क्योंकि ऐसे लोगों के पास शुद्ध प्रेम की आंखें नहीं होतीं। बारहवीं सदी की यह रचना भक्ति और शृंगार की परंपरा का शिखर मानी जाती है।
उनकी तथाकथित बुद्धिमत्ता अवरोध उत्पन्न कर लेती है। आखिर मीरा जब श्रीकृष्ण के प्रेम में पड़ी थीं तो उस समय के समाज को उनका प्रेम अंधा मालूम पड़ा ही था न। लेकिन हम सब जानते हैं कि उनके हृदय के प्रेम की अंतिम परिणति क्या थी।
श्रीकृष्ण के आध्यात्मिक संदेशों को दो कथाओं के जरिए समझिए। इनमें लौकिक और अलौकिक दृष्टियों में फर्क भी दिखेगा। मैंने बीसवीं सदी के महान संत और बिहार योग विद्यालय, मुंगेर के संस्थापक परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के श्रीमुख से ये कथाएं सुनी थीं।
श्रीकृष्ण को अपनी बांसुरी से बेहद प्रेम था। सोते-जगते, उठते-बैठते हर समय उनके पास बांसुरी होती थी। उनकी दिव्य ऊर्जा के प्रभाव के कारण बांसुरी की ध्वनि इतनी शक्तिशाली हो गई थी कि संपूर्ण सृष्टि का निर्माण हो गया। श्रीकृष्ण के प्रेमरस के लिए व्याकुल रहने वाली गोपियों को बड़ा अजीब लगता था। सूखे और खोखले बांस से बनी बांसुरी श्रीकृष्ण को इतनी प्यारी क्यों है?
रहा न गया तो गोपिकाओं ने सीधे-सीधे बांसुरी से ही पूछ लिया— बांसुरी, हमें सच-सच बताओ कि आखिर ऐसी क्या बात है कि भगवान तुम्हें दिन-रात अपने पास रखते हैं और तुम उनकी पटरानी की तरह साथ-साथ रहती हो? तुम तो जंगली और सूखे बांस से बनी हो, जिसका न तो कोई रंग, न रूप और न अन्य कोई आकर्षण। फिर तुमने ऐसा कौन-सा जादू कर दिया कि भगवान तुम्हें अपने श्रीमुख से लगाते हैं तो तुमसे ऐसी सुमधुर आवाज निकलती है कि मोर पागलों की तरह नाचने लगते हैं। पहाड़ों में अजीब शांति छा जाती है। जीव-जंतु मूर्तिवत हो जाते हैं। तुमसे निकली सुरीली धुन से हम गोपियां भी सुध-बुध खो बैठती हैं और पागलों की तरह कृष्ण से मिलने दौड़ पड़ती हैं। ऐसा लगता है कि तुम बांसुरी नहीं, जादू की छड़ी हो।
बांसुरी तो अपने प्रियतम के प्रेमरस में सराबोर थी। उसे क्या पता जादू क्या होता है। उसे तो यह भी पता नहीं कि उससे इतनी सुरीली आवाज कैसे निकलती है कि गोपियों के मन में इतने सारे सवाल चल रहे हैं।
लिहाजा उसने जवाब दिया— मुझे न तो जादू करना आता है और न सम्मोहन कला आती है। मैं तो जंगलों में पलती-बढ़ती हूं। अंदर से सदा खोखली ही रहती हूं। मेरे इष्टदेव को मेरी कमियों की जानकारी है। फिर भी वे प्रसन्न रहते हैं। वे एक ही बात कहते हैं— अपने आप को खाली रखो, मैं तुम्हें भर दूंगा। मैं जिसे अपनी कमजोरी समझती रही हूं, भगवान की नजर में वही मेरी शक्ति है। इसलिए आप लोग भी अपने वैभव, अपनी सुंदरता व विद्वता के अभिमान से मुक्त होकर अपने को खाली कर दें तो भगवान दिव्य प्रेम से भर देंगे।
दूसरी कथा श्रीकृष्ण की रासलीला से जुड़ी हुई है। श्रीकृष्ण आधी रात को जंगल में जाकर जब बांसुरी बजाने लगे तो उस बांसुरी की मधुर धुन सुनकर गोपिकाएं मदहोश हो गईं। जो जिस अवस्था में थीं, उसी अवस्था में जंगल की तरफ दौड़ पड़ीं और बांसुरी की सुरीली धुन पर नाचने लगी थीं। परमहंस जी बताते थे कि इसे आध्यात्मिक नजरिए से इस तरह समझना चाहिए।
यह शरीर भी सूक्ष्म रूप से कृष्ण की वंशी ही है। उसकी सुमधुर आवाज आत्मा है। इंद्रियों को वश में कर लेना गोपियां हैं। दरअसल भक्ति परंपरा में ‘गोपी’ शब्द की एक प्रतीकात्मक व्याख्या रही है— ‘गो’ यानी इंद्रियां और ‘पी’ यानी उन्हें पी जाना। कहा गया है, ‘गोभि: इन्द्रियै: भक्तिरसं पिबति इति गोपी’— यानी जो अपनी समस्त इंद्रियों से केवल भक्तिरस का पान करे, वही गोपी है। अर्थात कृष्ण की मुरली की धुन पर गोपियों के खिंचे चले आने से अभिप्राय है आत्मा की आवाज पर इंद्रियों का वश में हो जाना। योग साधक जब साधना में लीन होता है, ध्यानमग्न होता है तो उसकी अंतरात्मा की आवाज से इंद्रियां वशीभूत हो जाती हैं और झूमने लगती हैं, नाचने लगती हैं। यानी वे वश में आ जाती हैं, आत्मा में लीन हो जाती हैं। यही योग की पूर्णता है, यही भक्ति की पराकाष्ठा है, यही मनुष्य के जीवन का पूर्णत्व है। रासलीला का अभिप्राय यही है। इस लिहाज से जन्माष्टमी दिव्य आनंद का उत्सव है।
श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता में भी ऐसा संदेश देते हैं। छठे अध्याय में वे कहते हैं कि योग साधक को चाहिए कि वह शरीर, मन और इंद्रियों को संयमित करके मन को आत्मा में स्थिर करने का प्रयत्न करे। पर जिसका मन उच्छृंखल है, उसके लिए मन को वश में करना आसान कहां होता है। अर्जुन ने भी यही शंका उठाई थी कि मन तो वायु की तरह चंचल है, उसे रोकना कठिन है। इस पर श्रीकृष्ण का उत्तर था कि निःसंदेह मन चंचल है, पर अभ्यास और वैराग्य से वह वश में होता है (गीता 6.35)। आज के जमाने में विषयों का परित्याग यानी इच्छारहित होना कम चुनौतीपूर्ण नहीं। इसीलिए सजगता का विकास और एकाग्रता जैसे उपाय बताकर साधक के मार्ग को सुगम बनाने की कोशिश की गई है। महर्षि पतंजलि ने भी अपने योगसूत्र में यही क्रम रखा कि इंद्रियों को विषयों से लौटाने यानी प्रत्याहार के बाद ही धारणा, फिर ध्यान की स्थिति बनती है। सूत्र कहता है कि धारणा जब सघन होकर एक ही लक्ष्य पर टिक जाए, वही ध्यान है (योगसूत्र 3.1–3.2)। इस काम में सफलता मिली तो ध्यान स्वतः घटित हो जाता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखें तो श्रीकृष्ण मन की गहरी पड़ताल करने वालों में हैं। वे केवल मन के खंडों की पड़ताल ही नहीं करते, बल्कि दुविधाग्रस्त चित्त, संतापग्रस्त मन, खंड-खंड टूटे हुए संकल्प को अखंड बनाने के मार्गों की ओर स्पष्ट इशारा करते हैं। गीता में वर्णित यह चंचल मन, यह भीतरी द्वंद्व और उसे साधने की विधि आज की मनोवैज्ञानिक समझ से आश्चर्यजनक रूप से मेल खाती है। आज जब हम तेज रफ्तार जीवन, काम के दबाव, डिजिटल थकान और भीतर तक पसरे अकेलेपन से जूझ रहे हैं, ऐसे में श्रीकृष्ण के ये संदेश संबल प्रदान करते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं)

