देश भर में फैले नीलकंठ महादेव मंदिरों में वैसे तो सालो भर भीड़ होती है। पर सावन महीने की बात ही अलग है। भक्तगण कई-कई घंटे मशक्कत करके नीलकंठ महादेव का जलाभिषेक करते हैं। लेकिन जिस घटना की स्मृति में ये मंदिर बने हैं, उसके सबसे बड़े संदेशवाहक वे लोग होते हैं, जो कठिन समय में विष वमण नहीं, बल्कि उसे धारण करके भी धर्मानुकूल कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं।
इस विचार को पौराणिक कथा के संदेशों के जरिए समझिए। समुद्र-मंथन के समय सबसे पहले हालाहल विष निकला। उस विष की ज्वाला से तीनों लोक संकट में पड़ गए। न देव उसे ग्रहण कर सके, न दैत्य। तब समस्त प्राणी भगवान महादेव शिव की शरण में गए। महादेव ने लोक-रक्षा के लिए उस विष को पी लिया, परंतु उसे न तो उदर में उतारा, न बाहर उगला, बल्कि अपने कंठ में ही धारण कर लिया। इस तरह वे नीलकण्ठ कहलाए। पर, जरा सोचिए कि यदि महादेव उस विष को उगल दिए होते, तो समस्त सृष्टि नष्ट हो गई होती। यदि उसे हलक से नीचे उतार लिए होते, तो स्वयं की हानि हुई होती। इसलिए उन्होंने उसे कंठ में रोक लिया। यह समाज में कटुता के प्रसार को रोकने का सार्थक उपाय था। इससे संयम, त्याग और लोकमंगल का आदर्श प्रस्तुत हुआ।
शास्त्रों में इसे तितिक्षा कहा गया है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं – “इन्द्रियों और विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले शीत-उष्ण, सुख-दुःख आदि अनुभव आने-जाने वाले और अनित्य हैं। इसलिए हे अर्जुन, उन्हें तितिक्षा के साथ सहन करो।“ यानी व्यक्तिगत सुख-दुःख की तितिक्षा करने का उपदेश देते हैं। लेकिन इसके बाद वे कहते हैं – “जब धर्म और न्याय की रक्षा का दायित्व सामने हो, तब समत्व के साथ उसका पालन करो।” वेदांत में तितिक्षा को षट्संपत्ति का एक अनिवार्य अंग माना गया है। शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान, ये छह गुण साधक को आत्मज्ञान के योग्य बनाते हैं। इनमें तितिक्षा वह शक्ति है, जो मनुष्य को कठिनाइयों से टूटने नहीं देती, बल्कि उन्हें आत्मविकास का साधन बना देती है। इस दृष्टि से नीलकंठ महादेव की कथा को देखें, तो विषपान और तप तितिक्षा के प्रतीक ही हैं।
अब एक नजर भारत के प्रमुख नीलकंठ महादेव मंदिरों पर डालिए। इनमें उत्तराखंड के नीलकंठ महादेव मंदिर का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। सावन मास प्रारंभ होते ही ऋषिकेश से नीलकंठ महादेव मंदिर तक जाने वाला मार्ग पर भक्तों की भीड़ बढ़ने लगी है। लगभग बत्तीस किलोमीटर की यह चढ़ाई विष्णुकूट, ब्रह्मकूट और मणिकूट पर्वतों के बीच से होती हुई पंकजा और मधुमती नदियों के संगम तक पहुंचती है। वहीं है प्राचीन नीलकंठ महादेव मंदिर। इस मंदिर का बड़ा महात्म्य है। लोकमान्यता के अनुसार, क्षीरसागर से निकले विष को धारण करने के बाद महादेव इस पर्वतीय क्षेत्र में आए। विष की ज्वाला शांत करने के लिए विराजमान हुए और तप किया था। इसलिए, सावन में हजारों श्रद्धालु रातभर पैदल चलकर वहां पहुंचते हैं और जलाभिषेक करते हैं।
पर, ऐसी ही मिलती-जुलती लोककथा बुंदेलखंड के कालिंजर दुर्ग में स्थित नीलकंठ मंदिर से भी जुड़ी हुई है। यह चंदेलकालीन मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित है। मान्यता है कि समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष का पान करने के पश्चात शिव जी उसकी दाहकता को शांत करने इस प्रांगण में आए थे। पहाड़ को काटकर बनाई गई इस प्रतिमा के ठीक ऊपर स्थित चट्टानों से निरंतर जल की धारा रिसती रहती है। भीषण सूखे की मार झेलने वाले बुंदेलखंड में जल का यह अविरल प्रवाह कभी नहीं थमता। श्रद्धालु इसे महादेव के कंठ की ज्वाला को शांत करने वाला प्राकृतिक अभिषेक मानते हैं।
राजस्थान में अलवर जिले का नीलकंठ महादेव मंदिर सरिस्का टाइगर रिज़र्व के भीतर, राजगढ़ तहसील के निकट स्थित है। छठी-सतवीं शताब्दी के मध्य विकसित इस मंदिर के बारे में कथा है कि जब औरंगजेब की सेना ने इस मंदिर को ध्वस्त करने का प्रयास किया, तब मधुमक्खियों के विशाल झुंड ने आक्रमणकारियों पर हमला कर मंदिर की रक्षा की थी। राजस्थान के ही दौसा का नीलकंठ महादेव मंदिर देवगिरि पहाड़ी पर स्थित है। इस मंदिर तक पहुँचने के लिए लगभग 365 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। सावन तथा महाशिवरात्रि के मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु वहाँ दर्शन के लिए जाते हैं। कर्नाटक के नंजनगूड का प्रसिद्ध श्रीकंठेश्वर या नंजुंडेश्वर मंदिर मैसूरु जिले में कपिला नदी के पावन तट पर अवस्थित है। इसकी नींव गंग और चोल राजवंशों के काल में रखी गई थी। पुणे के समीप स्थित पानशेत के नीलकंठेश्वर से लेकर हिमाचल और नेपाल की दुर्गम घाटियों तक ऐसे अनगिनत नीलकंठ मंदिर हैं।
लेकिन इतिहास की कड़ियों को जोड़कर तय करना लगभग नामुमकिन है कि विषपान के बाद महादेव इन स्थानों पर गए थे या उस घटना की स्मृति में मंदिर बनवाए गए थे। बिहार योग विद्यालय के परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती कहते हैं, “विषपान के बाद महादेव कैलाश चले गए थे। समुद्र मंथन के चरम पर जब चंद्रदेव का प्राकट्य हुआ, तो संपूर्ण सृष्टि में एक असीम शीतलता व्याप्त हो गई। उसी क्षण भगवान विष्णु के कहने पर चंद्रमा का कैलाश पर्वत पर पदार्पण हुआ। तब शिव जी उन्हें अपने मस्तक पर धारण कर लिया। इस तरह हलाहल विष की तीव्र तपन शांत हो गई और और महादेव पुनः समाधि में लीन हो गए थे। यह शास्त्रसम्मत तथ्य है।“
खैर, विषपान के बाद महादेव कहां विराजे, यह तीर्थ के लिहाज से महत्वपूर्ण तो है, पर आज जैसे हालात बने हुए हैं, विषपान का संदेश ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसलिए कि नीलकंठ महादेव मंदिर केवल तीर्थ नहीं हैं, वे सनातन संस्कृति के नैतिक विश्वविद्यालय हैं। आज के दौर में संवाद में अधीरता, उतावलेपन और संयम के अभाव के साथ ही विचारहीन अभिव्यक्ति और वाणी-शुद्धि का अभाव अक्सर देखने को मिलता है। दिल्ली में जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन के दौरान की घटनाएं इस बात के गवाह हैं। ऐसी घटनाओं से दुनिया को शांति, सहिष्णुता और वसुधैव कुटुंबकम का मार्ग दिखाने वाले भारत का गौरव मलिन होता है। ऐसे में नीलकंठ महादेव स्मरण कराते हैं कि महानता विषवमन में नहीं, बल्कि विष को धारण कर संसार में शांति और शीतलता स्थापित करने में है।
(लेखक योग-अध्यात्म विज्ञान विश्लेषक हैं।)

