अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर वैसे तो कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कामरूप तक उत्सवी माहौल रहा, पर पहली बार कोलकाता महानगर सहित पूरे पश्चिम बंगाल का जैसा योगमय वातावरण रहा, वह अद्भुत था और उसके मायने बड़े गहरे हैं। एक संदेश जो मुख्य रूप से मुखरित हुआ, वह यह कि बंग भूमि के लोग अपने स्वर्णिम अतीत से जुड़कर बेहतर कल की ओर कदम बढ़ाने के लिए सजग और सतर्क हैं। लोगों में उत्साह का आलम यह था कि योग दिवस समारोह मुख्य सड़कों, पार्कों और विभिन्न शिक्षण संस्थानों तक सीमित नहीं रह गया था, बल्कि नदी, नौका और योगासनों के त्रिकोण के कारण अविस्मरणीय उत्सव बन गया।
बंग भूमि सदियों से आध्यात्मिक चेतना का महत्वपूर्ण केंद्र रही है। इस भूमि ने योग, भक्ति, करुणा और समरसता के संस्कारों को पोषित किया। श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रेम और भक्ति का संदेश दिया, रामकृष्ण परमहंस ने सभी धर्मों की एकता का अनुभव कराया और स्वामी विवेकानंद ने राजयोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग की कालजयी व्याख्या कर योग व वेदांत को विश्व मंच पर स्थापित किया। इसी तरह श्री अरविंद ने योग को मानव विकास की अगली अवस्था से जोड़ा और लाहिड़ी महाशय, युक्तेश्वर गिरि तथा परमहंस योगानंद की गुरु-शिष्य परंपरा के तहत क्रिया योग को दुनिया भर में पहचान व लोकप्रियता मिली। पर, विविध कारणों से यौगिक व आध्यात्मिक चेतना की लौ मद्धिम पड़ती गई, यहाँ तक कि व्यायामशालाएं भी राजनीतिक अड्डों में तब्दील हो गईं। ऐसे में, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के मौके पर पश्चिम बंगाल के लोग जिस मूड में दिखे, वह राज्य की मूल चेतना के पुनर्जागरण जैसा था।
पश्चिम बंगाल की पावन धरा को लेकर अक्सर यह विस्मयकारी प्रश्न उठता रहा है कि महान योगियों की जन्मभूमि और भारतीय आध्यात्मिक चेतना का प्रमुख केंद्र होने के बाद भी यह राज्य योग के वैश्विक मानचित्र पर अग्रिम पंक्ति में क्यों नहीं आ सका। इसके लिए सबसे पहले हमें योग की विविध शाखाओं और बंगाल के अंतस को समझना होगा। हठयोग से लेकर राजयोग, कर्मयोग, कुंडलिनि योग, ज्ञानयोग और भक्तियोग तक फैली इस योग विद्या में से बंगाल की भूमि ने सदैव सौम्य भक्ति और गहन तांत्रिक साधना को अपने केंद्र में रखा। कालीघाट की दक्षिणेश्वर काली, तारापीठ की मां तारा, गंगासागर का पावन तट और दुनिया भर में विख्यात दुर्गापूजा इसके जीवंत प्रमाण हैं। रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, श्री अरविंद सहित अनेक संतों ने मनुष्य के आंतरिक रूपांतरण, सेवा, ज्ञान और आध्यात्मिक उत्कर्ष को प्रमुखता दी। इसी आध्यात्मिक विरासत का बल है कि कड़वाहट के दौर में भी लोगों को प्रेम का दीप जलाए रखने की प्रेरणा मिलती रही है।
पर, भक्ति योग को छोड़कर योग की जिन अन्य पद्धतियों और वैचारिक धाराओं को बंगाल ने जन्म दिया या पोषित किया, उनके बड़े प्रशिक्षण केंद्र और संस्थागत स्वरूप विडंबना से दूसरी भूमियों पर विकसित होते चले गए। हालांकि, स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन (बेलूर मठ) और परमहंस योगानंद द्वारा स्थापित योगदा सत्संग सोसाइटी जैसे वैश्विक संस्थानों के मुख्यालय आज भी बंगाल की धरती पर ही मौजूद हैं, फिर भी स्थानीय राजनीति और विजन की कमी के कारण राज्य वैसी बढ़त नहीं बना सका। इसके बावजूद आज दुनिया भर में मौजूद योग के विशाल संस्थागत स्तंभों में बंगाल की वैचारिक नींव का अंश समाहित है, इसमें कोई संशय नहीं है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर आमजन की जैसी स्वतःस्फूर्त भावनाएं उमड़कर सामने आईं, उससे यह बिल्कुल साफ हो चुका है कि पश्चिम बंगाल के पास अब योग के प्रकाश से जगमगाने और योग-पर्यटन का एक विशिष्ट इतिहास रचने का स्वर्णिम अवसर मौजूद है। एक दीर्घकालिक विजन, संस्थागत निर्माण और स्पष्ट नीति के सहारे इस सपने को हकीकत में बदला जा सकता है।
इस दिशा में बंगाल की सबसे बड़ी ताकत उसका बहुआयामी भूगोल और अनूठा सांस्कृतिक वैभव है। एक तरफ जहां चित्त-वृत्तियों के निरोध के लिहाज से दार्जिलिंग का शांत प्राकृतिक वातावरण मौजूद है, वहीं दूसरी ओर सुंदरवन की अद्वितीय पारिस्थितिकी और शांतिनिकेतन का चिंतनशील परिवेश चेतना को विस्तार देता है। इसके साथ ही बेलूर मठ, दक्षिणेश्वर और कोलकाता की आध्यात्मिक विरासत पहले से ही वैश्विक स्तर पर अपनी साख स्थापित कर चुकी है। ऐसे में बंगाल के लिए योग-विकास का स्वाभाविक मॉडल समन्वित योग हो सकता है, जो श्री अरविंद की शिक्षाओं का आधार है। इसका लाभ यह होगा कि राज्य में एक व्यापक ‘योग-परिपथ’ यानी योग-सर्किट का निर्माण हो जाएगा, जो प्रकृति, संस्कृति, अध्यात्म और आरोग्य को एक सूत्र में पिरो सकेगा।
दार्जिलिंग के वेलनेस रिट्रीट, सुंदरवन में योग और इको-टूरिज्म के प्रयोग तथा शांतिनिकेतन में कला व मानसिक स्वास्थ्य को जोड़ते उपक्रम यह साफ संकेत दे रहे हैं कि योग आधारित पर्यटन का आधार तैयार है। आवश्यकता इस बात की है कि इन बिखरे हुए प्रयासों को एक साझा सूत्र और विमर्श में पिरोकर ‘आध्यात्मिक बंगाल’ के रूप में एक आकर्षक वैश्विक ब्रांड की तरह प्रस्तुत किया जाए। इस विजन को साकार करने के लिए नीतिगत स्तर पर सरकारी सहयोग और निजी भागीदारी का एक ईमानदार समन्वय बेहद जरूरी है।
एक बात और। परिस्थितियां अनुकूल हों और योग्य योगाचार्य न हों तो किसी मुकाम पर पहुंचना संभव नहीं। मानसिक तनाव वाले दौर में, जहां योग को महज एक शारीरिक व्यायाम मान लिया जाता है, वहां बीसवीं सदी के महान संत और बिहार योग विद्यालय के संस्थापक परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती का छह दशक पुराना कथन बेहद प्रासंगिक हो जाता है। उन्होंने 21वीं सदी में योग शिक्षकों की भूमिका को लेकर एक दूरदर्शी दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए कहा था कि इस सदी को ऐसे योगियों की जरूरत होगी, जो केवल एक योग ट्रेनर न होकर मानव चेतना के गहरे अध्येता हों। उन्हें अपने ज्ञान को इस प्रकार समायोजित करना होगा कि वे मनुष्य के पीछे छिपे उस वास्तविक मनुष्य को सही दिशा दे सकें जो उसकी हर बाहरी गतिविधि को संचालित करता है। अपनी सीमाओं का इस प्रकार विस्तार करके ही वे एक स्वस्थ, संतुलित और उच्च गुणवत्ता वाले नए समाज के निर्माण की विराट जिम्मेदारी को निभा सकेंगे।
पूरी परिघटना के परिप्रेक्ष्य में देखें तो कोलकाता का अंतरराष्ट्रीय योग दिवस महोत्सव केवल एक लोक-उत्सव भर नहीं था, बल्कि एक बड़ा वैचारिक संकेत दे गया कि योग किस तरह सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और पर्यटन नीति का एक मजबूत आधार बन सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

