कुरुक्षेत्र के मैदान में किसी बाह्य कारण से अर्जुन के हाथ से गांडीव नहीं फिसला था, बल्कि कारण मन में उपजा विषाद था। मौजूदा समय में छात्र-युवाओं की स्थिति भी कुछ वैसी ही है। प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव, भविष्य की अनिश्चितता, प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाओं के कारण ऐसे हालात बने हैं। मानसिक यंत्रणा और टूटते मन को सहारा देने के लिए किसी बाहरी दिलासे की नहीं, बल्कि एक ऐसे आंतरिक मार्गदर्शक सिद्धांत की आवश्यकता है, जो हमारी मानसिक अवस्था को बदल दे।
वैदिक शास्त्र में घोषण है कि मनुष्य केवल हाड़-मांस का शरीर या केवल भावनाओं का पुंज नहीं है। हमारे भीतर मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार की एक अत्यंत जटिल और वैज्ञानिक व्यवस्था काम करती है। तभी, दुनिया की महान पराजयों के पीछे कठिन परिस्थितियां कम, बल्कि पहले से हार मान चुकी मानसिक अवस्था अधिक थी। इसके विपरीत, संकल्प-शक्ति के कारण असंभव संभव हो गया। सच है कि जय और पराजय का पूरा खेल इसी आंतरिक संतुलन पर निर्भर है। हमारे भीतर जिस प्रकार के विचार और भावनाएं प्रबल होती हैं, हमारा जीवन और हमारा दृष्टिकोण वैसा ही रूप ले लेता है। यह यौगिक निष्कर्ष वैज्ञानिक रुप से भी प्रमाणित है।
पर, दृष्टिकोण कैसा हो कि सूरत बदले? इसका उत्तर हमें एकलव्य के जीवन-दर्शन से मिलता है। एकलव्य की कथा सदियों से भारतीय संस्कृति में इसलिए जीवंत और प्रासंगिक है, क्योंकि यह केवल एक धनुर्धर की कहानी नहीं है, बल्कि यह मानवीय श्रम, पूर्ण समर्पण, त्याग और अद्वितीय आत्म-सम्मान का कालजयी प्रतीक है। एकलव्य ने न तो पक्षपाती व्यवस्था से लड़कर अपनी ऊर्जा नष्ट की और न ही असहाय होकर बैठ गया। उसने इन दोनों के बीच एक तीसरा और सबसे व्यावहारिक मार्ग चुना। वह था इच्छा-शक्ति को कमजोर न होने देना। उसने गुरु की प्रतिमा को साक्षी मानकर साधना में सफलता पाई और सिद्ध कर दिया कि यदि आंतरिक संकल्प दृढ़ हो, तो किसी बाहरी सहयोग या साधन की कमी हक से वंचित नहीं कर सकती।
यही सीख हमें आधुनिक भारत के हरदिल अजीज और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के जीवन के एक बेहद संवेदनशील प्रसंग से भी मिलती है। युवा कलाम भारतीय वायुसेना में भर्ती होने का सपना संजोए देहरादून गए थे। पर परीक्षा परिणाम घोषित हुआ तो एक पायदान पीछे रह गए। इस परिणाम से वे गहरे अवसाद और निराशा से भर गए और चले गए ऋषिकेश। वहां गंगा के तट पर अनिर्णय की स्थिति में बैठे थे तो महान संत स्वामी शिवानन्द सरस्वती के दर्शन हो गए। स्वामी जी ने युवा कलाम के चेहरे पर लिखी उस गहरी पराजय को पढ़ लिया और उन्हें एक ऐसा महामंत्र दिया, जिसने उनका पूरा जीवन बदल दिया। स्वामी जी ने कहा था – “इस विफलता से तनिक भी चिंतित मत हो, बल्कि यह मान लो कि ईश्वर ने तुम्हारे लिए इससे भी बड़ा और कुछ अलग तय कर रखा है। दूसरी बात यह कि सबसे पहले तुम्हारे भीतर जो पराजय की भावना घर कर गई है, उसे अपनी आत्म-शक्ति से पराजित करो।“ इतिहास गवाह है कि कलाम साहब ने अपनी उस आंतरिक पराजय को इस तरह पराजित किया कि वे विमान उड़ाने वाले एक पायलट के बजाय पूरे देश की रक्षा प्रणालियों के निर्माता और राष्ट्र के सर्वोच्च शिखर पर बैठने वाले महामानव बन गए।
इन दोनों ही प्रसंगों से यह साफ हो जाता है कि सफलता के द्वार हमेशा आंतरिक पराजय को पराजित करने के बाद ही खुलते हैं। परंतु यह प्रवृत्ति आम है कि हर असफलता के लिए केवल बाहरी परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहराकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है। इस बात की अनदेखी कर दी जाती है कि राज-व्यवस्था और समाज कोई अलग-अलग इकाई नहीं है, बल्कि वे एक-दूसरे में पूरी तरह गूंथे हुए हैं। इसलिए, केवल एक-दूसरे को कोसने या व्यवस्था पर कीचड़ उछालने से ठोस और सकारात्मक परिणाम नहीं मिल पाता। प्रश्नपत्र लीक की घटनाएँ हों, मूल्यांकन की त्रुटियाँ हों या प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ी अनिश्चितताएँ, इनके कारण मानसिक तनाव लाजिमी है। पर, हम जिस व्यवस्था के शिकार हैं, वह भी उसी समाज से निर्मित होती है, जिसका हम हिस्सा हैं। प्रश्नपत्र लीक करने वाले, भ्रष्टाचार करने वाले या नियमों को तोड़ने वाले लोग किसी दूसरे ग्रह से नहीं आते।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण है कि दूसरों को बदलने की जिद पालने से कहीं ज्यादा बुद्धिमानी और व्यावहारिक कदम यह है कि हम उस परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से करें। यही बात महात्मा गांधी पूरी दृढ़ता के साथ कहा करते थे कि वह परिवर्तन स्वयं बनो, जो तुम इस संसार में देखना चाहते हो। यह बात शास्त्रसम्मत है कि स्थायी परिवर्तन केवल शासन बदलने से नहीं आता; बल्कि नागरिक चेतना बदलने से आता है। रामराज्य केवल इसलिए आदर्श नहीं था कि वहाँ भगवान राम जैसे राजा थे। वह इसलिए आदर्श था, क्योंकि वहाँ नागरिक भी अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे थे। इसलिए हर बड़ी सामाजिक क्रांति की शुरुआत व्यक्ति के भीतर से होती है।
ऐसी ही आंतरिक जंग कभी अर्जुन ने जीती, एकलव्य ने जीती और डॉ. कलाम ने भी। आज के छात्र-युवाओं के सामने भी ठीक वैसी ही चुनौती है। जो युवा अपने भीतर पैठ बना चुकी पराजय की भावना को पराजित करने का साहस दिखाएगा, वही अंततः अपने श्रेष्ठ भविष्य और एक नए समाज का निर्माता बनेगा, क्योंकि व्यक्ति का आत्म-परिवर्तन ही अंततः व्यापक सामाजिक परिवर्तन का शाश्वत आधार बनता है। अंत में व्यावहारिक मार्ग-दर्शन। त्राटक क्रिया पराजय की भावना से मुक्ति दिलाने में मददगार है। भगवान बुद्ध का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण उपदेश है, “अप्प दीपो भव:।” त्राटक और “अप्प दीपो भव:” का गहरा और वैज्ञानिक संबंध है। दोनों का लक्ष्य प्रकारांतर से एक ही है। त्राटक बाहरी दीप से भीतरी दीप तक पहुंचने की सीढ़ी है, और भीतरी दीप जलते ही “पराजय की भावना” स्वयं पराजित हो जाती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

