तथास्तु! यानी, जैसा तुम चाहते हो, वैसा ही हो। प्राचीन काल में बहुत नपा-तुला बोलने के आदी ऋषि-मुनि और देवता वरदान देने के लिए इसी शब्द का प्रयोग करते थे। इसके मुख्यत: तीन कारण थे। पहला तो यह कि उनमें ‘वाक-सिद्धि’ होती थी। जब कोई भक्त वरदान मांगता, तो ऋषि अपनी ऊर्जा को एक शब्द में केंद्रित करते थे – ‘तथास्तु’। यह एक तरह का ‘कमांड’ था जो ब्रह्मांड को दिया जाता था कि भक्त की इच्छा पूरी हो। दूसरी बात यह कि ‘तथास्तु’ के माध्यम से ऋषि अपनी तपस्या का एक अंश उस भक्त को दे देते थे, ताकि उसकी इच्छा पूरी हो सके। तीसरी बात यह कि वाणी में निष्पक्षता होती थी। अगर हमने अच्छा माँगा, तो तथास्तु (वैसा ही हो)। अगर हमने बुरा माँगा, तो भी तथास्तु (वैसा ही हो)। यह इस बात का द्योतक है कि प्रकृति या ईश्वर हमारी इच्छा में दखल नहीं देते, वे बस उसे पूरा करने की शक्ति देते हैं।
यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा के सिद्धांतों से मेल खाती हुई बात है। वैदिक उद्घोष है, “यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे।” यानी जो इस शरीर में है, वही पूरे ब्रह्मांड में है। हम उस अनंत ब्रह्मांडीय ऊर्जा का ही एक अंश हैं। रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे, “विचार, भाव, संकल्प, ये सब हमारे भीतर के ब्रह्माण्डीय नियमों पर काम करते हैं। जब मन शुद्ध होता है, तब बाहर की दुनिया भी सुव्यवस्थित दिखती है और जब भीतर अराजकता है, तो बाहर भी दुनिया अराजक प्रतीत होती है।“ मतलब यह कि हमारा बाहरी जीवन हमारी आंतरिक स्थिति का ही प्रतिबिंब है। जीवन संयोग से नहीं चलता। जो विचार, भावनाएं और कंपन हम लगातार अपने भीतर रखते हैं, अस्तित्व उसी को हकीकत में बदल देता है। हमारे जीवन में यदि दु:ख है तो उसकी वजह यह है कि मन में उठी इच्छाएं हमारी नहीं हैं; वे समाज, माता-पिता या विज्ञापन द्वारा थोपी गई हैं। यदि आत्मा की गहराई से इच्छा उठती तो उसके परिणाम सुखद होते।
अब यह रहस्य नहीं रहा कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा शब्दों को नहीं, उसके भावों को पकड़ती है। यदि हम कहते हैं कि दु:ख नहीं चाहिए, तो ब्रह्मांडीय ऊर्जा हमारे सुख के लिए घनीभूत नहीं होती, बल्कि उसकी शक्ति दु:ख को प्रबल करने में लग जाती है। कारण कि भाव में दु:ख है। बीसवीं सदी के महान संत स्वामी शिवानंद सरस्वती कहते थे, “काम करना कर्मयोग नहीं है, बल्कि सही भावना से काम करना कर्मयोग है। अगर आप अस्पताल में झाड़ू लगा रहे हैं और मन में यह भाव है कि गंदा काम कर रहा हूँ, तो वह साधारण कर्म है, जो बंधन पैदा करेगा। लेकिन यदि भाव यह हो कि ईश्वर के मंदिर (अस्पताल) की सफाई कर रहा हूँ, ताकि रोगियों (नारायण) को कष्ट न हो, तो वह कर्म ‘योग’ बन जाता है।”
श्रीरामचरितमानस में प्रसंग है। सीता स्वयंवर के समय जब श्रीराम का रंगभूमि में पदार्पण हुआ तो वहां उपस्थित हजारों लोगों को श्रीराम अलग-अलग रूपों में दिखाई देने लगे थे। अहंकारी और क्रूर राजाओं को साक्षात ‘काल’ (मृत्यु) या वज्र जैसा कठोर योद्धा दीखे। माताओं को ‘कोमल बालक’ दीखे। योगियो और ज्ञानियो को श्रीराम में ‘विराट ब्रह्म’ या परम सत्य का तेज दिखा, और विदेह राज जनक के लिए वे एक ‘प्रिय संबंधी’ थे। रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास ने उस स्थिति का वर्णन कुछ इस तरह किया है – “जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी।।” तात्पर्य यह कि हमारी भीतरी चेतना जिस रंग में रंगी होती है, हमें बाहरी जगत उसी रंग में दिखाई देता है।
प्राचीन भारतीय अध्यात्म ने जिस सत्य को हजारों साल पहले ही जान लिया था, उसे आधुनिक विज्ञान क्वांटम फिजिक्स की भाषा में समझ रहा है। इस संदर्भ में चर्चित पुस्तक “पावर वर्सेस फोर्स” उल्लेखनीय है। प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ. डेविड हॉकिन्स की इस आध्यात्मिक क्लासिक के मुताबिक, हर भावना की एक फ्रीक्वेंसी होती है। उदाहरण के लिए, शर्म और अपराध बोध सबसे निचली आवृत्तियों पर कंपन करते हैं, जबकि क्रोध और डर इससे थोड़ा ऊपर हैं। इसके विपरीत, प्रेम, शांति और आत्मज्ञान उच्च आवृत्ति पर कंपन करते हैं। मतलब यह कि जब हम क्रोधित होते हैं, तो निम्न आवृत्ति पर प्रसारण कर रहे होते हैं, और विज्ञान के ‘लॉ ऑफ रेजोनेंस’ या अनुनाद के नियम के अनुसार, हम ब्रह्मांड से वैसी ही घटनाओं, लोगों और परिस्थितियों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, जो उसी निम्न आवृत्ति पर कंपन कर रही होती है। यानी क्रोध और अधिक क्रोध को आमंत्रित करता है। इसके उलट, जब हम कृतज्ञता या प्रेम की उच्च अवस्था में होते हैं, तो हमारी फ्रीक्वेंसी उसी के अनुरुप बदल जाती है। इससे भी यही निष्कर्ष निकला कि ब्रह्मांड शब्दों को नहीं, बल्कि भावों और ऊर्जा को समझता है।
राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल खिलाड़ी और माउंट एवरेस्ट पर पहुंचने वाली दुनिया की पहली दिव्यांग महिला अरुणिमा सिन्हा के बारे में तो हम सब जानते ही हैं। लुटेरों ने चलती ट्रेन से नीचे फेंक दिया था। हालात ऐसे बने कि बायां पैर घुटने के नीचे से काटना पड़ा और दाहिने पैर में लोहे की रॉड डालनी पड़ी। बदले हालात में सामान्य रूप से चलना-फिरना भी एक चुनौती बन गया था। जब वे अस्पताल के बिस्तर पर गंभीर पीड़ाओं से जूझ रही थीं, और दुनिया उन पर दया कर रही थी, तब उनके अवचेतन मन में एक अलग ही कहानी लिखी जा रही थी। अरुणिमा ने अपनी भावना को दृढ़ किया और मन को एक असंभव-सा निर्देश दिया – “मैं माउंट एवरेस्ट फतह करूंगी।” इसके बाद से अरुणिमा उस भावना को घनीभूत करने के लिए मन में खुद को एवरेस्ट की चोटी पर तिरंगा फहराते हुए देखती थीं। इस प्रबल विचार से अवचेतन इतना भरा कि उनकी अपंगता उनके मानसिक संकल्प के आगे गौण हो गई थी।
पर, हममें से कितने लोग अरुणिमा सिन्हा की तरह अपने मन की शक्तियों को प्रबल बना पाते हैं? ज्यादातर आदमी अपनी भावनाएं प्रबल कर ही नहीं पाता या फिर भावनाएं शुद्ध किए बिना सही उत्तर चाहता है। नतीजतन, जीवन में दु:ख बना रहता है। पर, योग का सहारा लें तो निश्चित रुप से जीवन रुपांतरित हो जाएगा। “योगनिद्रा” थोड़ा सरल और आजमाया हुआ है। शुद्ध भावनाएं घनीभूत होती हैं और और संकल्प की सिद्धि में मदद मिल जाती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

