किसी व्यक्ति के गुण या व्यवहार प्रतिकूल हो तो हम सब कहते हैं कि फलां रीढ़ विहीन है। इसके विपरीत रीढ़ का सीधा होना साहस, आत्मसम्मान और नैतिक दृढ़ता का प्रतीक बन जाता है। पर, इस मुहावरे से इतर रीढ़ का महत्व इतना है कि चिकित्सा विज्ञान से लेकर अध्यात्म विज्ञान तक में इसकी महत्ता पर काफी कुछ कहा गया है। चिकित्सा विज्ञान के दृष्टिकोण से मेरुदंड (रीढ़) हमारे शरीर की संरचना का केंद्रीय अक्ष है, मुख्य आधार है। मेरुदंड अस्वस्थ हो तो न शरीर सीधा खड़ा रह सकता है, न ही तंत्रिका तंत्र ठीक से कार्य कर सकता है। यौगिक और आध्यात्मिक परंपराओं में रीढ़ का महत्व केवल शारीरिक नहीं है, बल्कि यह गहन आध्यात्मिक अर्थों से जुड़ा है। इसे सीधा और मजबूत रखकर, हम अपने आंतरिक केंद्र और आत्म-जागरूकता से गहरा संबंध स्थापित करते हैं।
भारतीय शास्त्रों में सहस्राब्दियों पूर्व इसकी महत्ता बता दी गई थी। संस्कृत में रीढ़ को ही मेरुदंड कहा गया है। पुराणों में जिस तरह सुमेरु पर्वत को ब्रह्मांड का अक्ष बताया गया है, मानव शरीर में वही स्थान मेरुदंड का है। शिव पुराण में भी मानव शरीर को लघु ब्रह्मांड बताया गया है – “मेरुदंड स्थितं ब्रह्म, तस्माद् मेरुं न लंघयेत्।” दूसरे शब्दों में सूक्ष्म जगत (शरीर) और स्थूल जगत (ब्रह्मांड) के बीच का सेतु यही मेरुदंड है। भारतीय ज्ञान प्रणालियों में, रीढ़ को चेतना का केंद्रीय अक्ष और आंतरिक ऊर्जा के प्रवाह का मार्ग माना गया है। रीढ़ की हड्डी के साथ-साथ सात चक्रों के रुप में ऊर्जा के केंद्र होते हैं, जो रीढ़ के आधार से सिर के शीर्ष तक फैले हुए होते हैं। प्रत्येक चक्र एक विशिष्ट आध्यात्मिक गुणवत्ता और शारीरिक कार्य से जुड़ा है। जब हम संतुलित होकर बैठते हैं, तो अनजाने में ही भीतर एक जागरूकता पैदा होती है। तब अनुभव होता है कि हम केवल शरीर नहीं हैं, बल्कि एक गहरी चेतना के साथ जुड़े हुए हैं। यही भाव धीरे-धीरे आत्म-जागरूकता में बदल जाता है और आध्यात्मिक यात्रा शुरु हो जाती है।
तभी श्रीमद्भागवत गीता के छठे अध्याय के तेरहवें श्लोक में मानसिक शांति और एकाग्रता के लिए भौतिक अनुशासन का महत्व बताते हुए कहा गया है – अपने शरीर, गर्दन और सिर को एक सीधी रेखा में स्थिर धारण करके, अडिग होकर और इधर-उधर की दिशाओं को न देखते हुए, केवल अपनी नासिका (नाक) के अग्रभाग पर दृष्टि टिकाकर (एकाग्र होकर) बैठना चाहिए। इस बात के केंद्र में रीढ़ ही है। घेरंड संहिता से लेकर शिव संहिता तक में रीढ़ और चक्रों के अंतर्संबंध की सुंदर व्याख्या हैं। हठयोग प्रदीपिका में कहा गया है कि मेरुदंड (रीढ़) ही वह आधार है, जहाँ मूलाधार और अन्य सभी चक्र व नाड़ियाँ स्थित हैं। इस तरह हम देखते हैं कि, रीढ़ का स्वास्थ्य केवल शारीरिक कल्याण का प्रतीक नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक यात्रा का एक अनिवार्य हिस्सा है। यही प्राण के प्रवाह, चक्रों की सक्रियता और कुंडलिनी शक्ति के उत्थान का आधार है।
आज विज्ञान भी इसी वैदिक सत्य की पुष्टि कर रहा है। तंत्रिका-विज्ञान के दृष्टिकोण से रीढ़ की हड्डी मस्तिष्क का ही विस्तार है। उसके भीतर का स्पाइनल कॉर्ड लगभग पचास करोड़ तंत्रिका-कोशिकाओं का जाल है। यह मस्तिष्क से संदेश लेता है, शरीर को निर्देश देता है। यानी हर गति, हर अनुभव, हर भावना रीढ़ से होकर गुजरती है। वैज्ञानिक अनुसंधान इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि रीढ़ के निचले हिस्से में एक विशेष प्रकार की कोशिकाएं होती हैं, जो स्वतंत्र रूप से निर्णय लेती हैं। इन्हें ‘केंद्रीय पैटर्न जनरेटर’ कहा जाता हैं। दूसरे शब्दों में रीढ़ का एक अपना ‘मन’ है। इस बात को ही योग शास्त्र अलग ढंग से कहता है। उसके मुताबिक, रीढ़ में ब्रह्म का वास है। जर्नल ऑफ न्यूरोसाइंस में प्रकाशित शोधों से पता चला है कि ध्यान और योग के दौरान रीढ़ की सुरक्षात्मक ऊर्जा बढ़ जाती है। तनाव हार्मोन कोर्टिसोल घटता है और सेरोटोनिन बढ़ता है। यही वह रासायनिक परिवर्तन है, जिसे शास्त्रों में आनंद कहा गया है।
सवाल है कि शरीर के इतने महत्वपूर्ण मेरुदंड को स्वस्थ किस तरह रखा जाए कि शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उत्थान में बाधा न हो। इसके लिए यौगिक परंपरा और आधुनिक विज्ञान दोनों एक व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रदान करते हैं। योगियों का अनुभव है कि सूर्य नमस्कार, मार्जरी-आसन, भुजंगासन, शलभासन, सेतुबंधासन, अर्ध मत्स्येन्द्रासन, पश्चिमोत्तानासन, और ताड़ासन जैसे आसनों से रीढ़ को लचीला, मजबूत और संरेखित रखने में मदद मिलती है, कशेरुकाओं के बीच की डिस्क को पोषण मिलता है। रीढ़ के चारों ओर की मांसपेशियां मजबूत होती हैं, रक्त संचार में सुधार होता है और तंत्रिका तंत्र शांत होता है।
महर्षि पतंजलि भी जब “स्थिरसुखमासनम्” यानी आसन स्थिर और आरामदायक होना चाहिए, कहते हैं तो इसका अभिप्राय भी सीधी और संरेखित रीढ़ से है, जो ध्यान साधना में मददगार है। ताड़ासन रीढ़ को स्वस्थ रखने के लिए सबसे सरल भी है और महत्वपूर्ण भी। इसलिए इसे खड़े होकर किए जाने वाले सभी आसनों की जननी कहा गया है। इसमें बस सीधे खड़े होना होता है। लेकिन यह ‘बस’ नहीं है। रीढ़ को सीधा करके खड़े होना एक साधना है। आज ज्यादातर लोग घंटों मोबाइल देखते हैं, कुर्सी पर झुककर बैठते हैं, और रात को गलत मुद्रा में सोते हैं। ऐसा करके अनजाने में अपने मेरुदंड को विकृत करने का इंतजाम कर देते हैं।
पर, बात इतने से नहीं बनतीं। मेरुदंड को स्वस्थ रखने के लिए आसन व प्राणायाम के साथ ही पोषण, जलयोजन और तनाव प्रबंधन का एकीकृत दृष्टिकोण अपनाना भी आवश्यक होता है। इससे न केवल शारीरिक समस्याओं से मुक्ति मिलती है, बल्कि प्राणिक प्रवाह भी सुनिश्चित होता है और चक्रों का संतुलन होता है। तभी कुंडलिनी के उत्थान के लिए मार्ग प्रशस्त होता है। इन तथ्यों मानव शरीर में रीढ़ की महत्ता क्या है और उसे स्वस्थ रखना कितना जरूरी है, इसका सहज अंदाज लगता है। मेरुदंड का सीधा होना केवल शारीरिक मुद्रा नहीं, बल्कि जीवन के प्रति हमारे ‘दृष्टिकोण’ का सीधा होना है। स्वास्थ्य और आनंदमय जीवन के लिए हमें इन बातों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

