भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को शिक्षा देते हैं कि कर्मफल की आसक्ति से व्यक्ति दुखी होता है। इसलिए कि भौतिकता आत्मा की अमरता को भुला देती है और पुनर्जन्म के चक्र में फंसाए रखती है। आधुनिक युग के मानव के पास जन्म-चक्र की परवाह नहीं। उसके तो रातो-रात येन-केन-प्रकारेन तमाम तरह के भौतिक हित पूरे हो जाने चाहिए। यही भौतिक लालसा मानसिक समस्याओं से दो-चार होने को मजबूर करती है। आधुनिक युग की इस सबसे बड़ी समस्या के कारण जीवन संकट में है। ऐसे में परमहंस योगानंद की शिक्षाओं की आज भी बनी हुई है।
परमहंस योगानंद की शिक्षाओं में मानव चेतना के विस्तार, अंतर्ज्ञान के विकास और आत्म-साक्षात्कार पर जोर देकर एक समग्र जीवन दृष्टि का समावेश है। उन्होंने ‘क्रिया योग’ की जो तकनीक सिखाई थी, वह पूजा-पाठ नहीं, बल्कि एक मनो-शारीरिक विधि है। उन्होंने इस विधि के जरिए समझाया कि किस तरह श्वास और प्राण-शक्ति के नियंत्रण से मस्तिष्क की कोशिकाओं को रिचार्ज किया जा सकता है और तनाव को जड़ से खत्म किया जा सकता है। यह आज के ‘बर्नआउट’ कल्चर के लिए एक संजीवनी की तरह है। ऐसे में योग- धर्म को अंधविश्वास के दायरे से निकालकर आत्म-साक्षात्कार के विज्ञान के रूप में प्रस्तुत करने वाले उस योगी को आध्यात्मिक वैज्ञानिक कहना ज्यादा उपयुक्त होगा।
हालात ऐसे बने हैं कि परमहंस योगानंद को न केवल पश्चिमी देशों में, बल्कि पूरी दुनिया में याद किया जा रहा है। वे भारत के एक ऐसे संत थे, जिन्होंने अमेरिका की धरती से पूरी दुनिया में मानव जाति के आध्यात्मिक उत्थान के लिए उल्लेखनीय कार्य किए। उनकी यश की गाथाएं सबकी जुबान पर हैं। अमेरिका में उनके द्वारा स्थापित सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप के मौजूदा अध्यक्ष स्वामी चिदानंद अपने गुरू को याद करते हुए कहते हैं कि उन्होंने पश्चिम को क्रियायोग के रूप में भारत की ऐसी अमूल्य निधि दी, जो स्वयं को जानने का प्राचीन विज्ञान है। यह मानव जाति के लिए शायद सबसे महत्वपूर्ण उपहारों में से एक है।
सन् 1917 में झारखंड के रांची में योगदा सत्संग सोसाइटी की स्थापना करके अपने आध्यात्मिक आंदोलन को गति देने वाले परमहंस योगानंद पहली बार सन् 1920 में 19 सितंबर को एक धर्म सभा में भाग लेने बोस्टन पहुंचे थे। वहां उनकी अलौकिक ऊर्जा इस तरह प्रवाहित हुई कि क्रियायोग के रथ पर सवार आध्यात्मिक आंदोलन कम समय में ही जनांदोलन बन गया था। वे आध्यात्मिक चेतना के विकास के लिए किए गए इस ऐतिहासिक कार्य की वजह से वे अमर हो गए। वे वैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर धर्म और योग की शास्त्रसम्मत बातें करते थे। इसलिए ध्यान के योग विज्ञान, संतुलित जीवन की कला, सभी महान धर्मों में अंतर्निहित एकता जैसी उनकी बातें अकाट्य होती थीं। तभी श्रीमद्भगवतगीता में श्रीकृष्ण द्वारा बतलाए गए क्रियायोग की विराट शक्ति से अमेरिकी नागरिकों को परिचित कराने के मार्ग के अवरोध दूर होते चले गए थे। नतीजा हुआ कि क्राइस्ट को मानने वाले कृष्ण को भी मान बैठे और परमहंस योगानंद योग व अध्यात्म के पितामह के तौर पर स्वीकार कर लिए गए।
परमहंस योगानंद अपने गुरू युक्तेश्वर गिरि, परमगुरू लाहिड़ी महाशय और परमगुरू के गुरू महावतारी बाबाजी की प्रेरणा से अमेरिका गए थे। उन्हें क्रियायोग का प्रचार करने को इसलिए कहा गया था, क्योंकि यह अशांत मन को शांति प्रदान करके उसे आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करने में सक्षम था। इस योग को अति प्राचीन पाशुपत महायोग का अंश माना जाता है। ऋषि-मुनि पाशुपत महायोग को गुप्त रखते थे और अपनी अंतर्यात्रा के लिए उपयोग करते थे। बाद में तंत्र के आधार पर विकसित पाशुपत योग को कुंडलिनी योग और राजयोग के आधार पर विकसित योग को क्रियायोग कहा गया। श्रीमद्भगवतगीता में श्रीकृष्ण ने उसी क्रियायोग की दो बार चर्चा की है।
क्रियायोग के बारे में अपनी पुस्तक “योगी कथामृत” में पहमहंस योगानंद ने कहा है कि इस लुप्तप्राय: प्रचीन विज्ञान को महावतारी बाबाजी ने प्रकट किया और अपने शिष्य लाहिड़ी महाशय को उपलब्ध कराया था। तब बाबाजी ने लाहिड़ी महाशय से कहा था – “19वीं शताब्दी में जो क्रियायोग तुम्हारे माध्यम से विश्व को दे रहा हूं, उसे श्रीकृष्ण ने सहस्राब्दियों पहले अर्जुन को दिया था। बाद में महर्षि पतंजलि, ईसामसीह, सेंट जॉन, सेंट पॉल और ईसामसीह के अन्य शिष्यों को प्राप्त हुआ।“ युक्तेश्वर गिरि कहा करते थे कि क्रियायोग एक ऐसी साधना है, जिसके द्वारा मानवी क्रमविकास की गति बढ़ाई जा सकती है। बिहार योग के जनक स्वामी सत्यानंद सरस्वती कहते थे कि शरीर ऊर्जा का क्षेत्र है। यह क्रियायोग का मूल दर्शन है। चिंता और परेशानियों के इस युग में मनुष्य की आध्यत्मिक प्रतिभा को जागृत करने की सबसे शक्तिशाली विधि है।
आज यानी 5 जनवरी को परमहंस योगानंद की 133वीं जयंती के उपलक्ष्य में मेरी यही अपील है कि मानसिक समस्याओं से जूझ रहे युवा क्रियायोग की साधना का विचार भले ही बाद के लिए छोड़ दें। पर “योगी कथामृत” या अंग्रेजी में “ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ अ योगी” का अध्ययन जरुर करें। यह परमहंस जी की आत्मकथा है, जो दुनिया की सबसे प्रभावशाली आध्यात्मिक पुस्तकों में से एक है। एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स अपने आईपैड में केवल यही एक किताब रखते थे और हर साल इसे पढ़ते थे। उन्होंने किशोरावस्था में इसे पढ़ा और हर साल दोबारा पढ़ते थे। उनकी इच्छानुसार, उनकी मृत्यु के बाद, स्मृति समारोह में सभी अतिथियों को यही पुस्तक यादगार स्वरुप दी गई थी।
द बीटल्स बैंड के सदस्य जॉर्ज हैरिसन के नाम से तो हम सब परिचित हैं ही। बीसवीं सदी के महान संत महर्षि महेश योगी के शिष्य के रुप में वे भारत में चर्चा में आए थे। पर उनकी आध्यात्मिक पृष्ठभूमि तैयार करने में “ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ अ योगी” की बड़ी भूमिका थी। उन्होंने कहा भी था – “यह किताब मेरे जीवन को आध्यात्मिक अर्थ देती है, इसके बिना मैं वह व्यक्ति नहीं होता जो हूं।” “रॉक एंड रोल का बादशाह” के रुप में विख्यात एल्विस प्रेस्ली ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ अ योगी के इतने मुरीद हुए कि 1965 में परमहंस योगानंद की सेल्फ-रियलाइजेशन फेलोशिप से ऐसे जुड़े कि जुड़े ही रह गए थे। इन सबका सार यह कि परमहंस योगानंद की आध्यात्मिक शिक्षाएं जीवन को रुपांतरित करने में सक्षम है। 133वीं जयंती पर महान योगी को सादर नमन।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

