चेतना की गहराइयों में उतरना किसी चमत्कार से कम नहीं है, क्योंकि यह हमारे देखने का नजरिया पूरी तरह बदल देता है। बीसवीं सदी के महान योगी महर्षि महेश योगी द्वारा प्रतिपादित ट्रान्सेंडैंटल मेडिटेशन या “भावातीत ध्यान” वह कुंजी है, जो हमें जीवन के सबसे सूक्ष्म और आनंदमय स्तरों तक ले जाती है। जब हम ध्यान के माध्यम से मन की शांति का अनुभव करते हैं, तो हम केवल शांत नहीं होते बल्कि एक नई दृष्टि प्राप्त करते हैं। यह दृष्टि हमें सामान्य जगत के भीतर ही एक स्वर्णिम युग का आभास कराने लगती है। जीवन अपनी पूरी सुंदरता के साथ हमारे सामने प्रकट होने लगता है।
अक्सर ईश्वर या दैवीय जैसे शब्द लोगों को उलझन में डाल देते हैं। लेकिन इन्हें समझने के लिए किसी भारी-भरकम परिभाषा की आवश्यकता नहीं है। विज्ञान भी मानता है कि सृष्टि के कई स्तर हैं और हम जितना सूक्ष्म स्तर पर जाते हैं, उतनी ही ऊर्जा बढ़ती जाती है। ध्यान के माध्यम से जब हम इस सूक्ष्मतम धरातल को छूते हैं, तो वह अनुभव ही अपने आप में दिव्य है। यह अनुभव किसी तर्क का मोहताज नहीं है, क्योंकि यह सीधे हमारे बोध को गहराई प्रदान करता है।
इसे एक सुनहरे चश्मे के उदाहरण से बेहतर समझा जा सकता है। जैसे चश्मा पहनने पर पूरी दुनिया का रंग बदल जाता है, वैसे ही विकसित चेतना हमारे जीवन के रंगों को निखार देती है। दुनिया जैसी थी वैसी ही रहती है, लोग वैसे ही रहते हैं, पर हमारी दृष्टि बदल जाती है। अब हमें हर साधारण वस्तु में एक असाधारण सौंदर्य दिखने लगता है। यह ‘सूक्ष्म सापेक्ष चेतना’ की वह अवस्था है, जहाँ जागते हुए भी हमारा मन उसी परमानंद से जुड़ा रहता है जो हमने ध्यान में पाया था।
इस विद्या की सबसे बड़ी खूबी इसकी सरलता और सार्वभौमिकता है। इसके लिए किसी विशेष धार्मिक विश्वास की जरूरत नहीं है। यह केवल स्वयं को जानने और दृष्टि को परिष्कृत करने का एक वैज्ञानिक मार्ग है। जब हमारी चेतना साफ और सकारात्मक होती है, तो दैनिक जीवन के तनाव और चुनौतियां भी हमें विचलित नहीं कर पातीं। हम इस संसार में रहते हुए भी एक उच्चतर और आनंदमय जीवन का संचार करने लगते हैं। यही चेतना का वह वास्तविक स्वरूप है जो हमें पूर्णता की ओर ले जाता है।
यदि आधुनिक युग की युवाओं की बात करें तो महर्षि योगी की शिक्षाएं उनके लिए केवल आध्यात्मिक मार्ग नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य सुधारने का एक सशक्त वैज्ञानिक टूलकिट हैं। आज का युवा जिस तीव्र तनाव, प्रतिस्पर्धा और मानसिक बिखराव के दौर से गुजर रहा है, वहां ट्रान्सेंडैंटल मेडिटेशन या “भावातीत ध्यान” एक मानसिक औषधि की तरह काम करता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि यह तकनीक मस्तिष्क के ‘प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स’ को सक्रिय करती है, जिससे निर्णय लेने की क्षमता और एकाग्रता में अभूतपूर्व वृद्धि होती है। जब युवा इस ध्यान का अभ्यास करते हैं, तो उनके शरीर में कोर्टिसोल जैसे स्ट्रेस हार्मोन का स्तर तेजी से गिरता है और गहरी विश्रांति की स्थिति प्राप्त होती है, जो सामान्य नींद से भी अधिक प्रभावशाली मानी गई है।
वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर यह प्रमाणित हो चुका है कि महर्षि जी की तकनीकें हृदय गति को संतुलित करने और रक्तचाप को नियंत्रित करने में सहायक हैं, जो आज की जीवनशैली से उपजी बीमारियों के लिए एक ढाल का काम करती हैं। युवाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण ‘क्रिएटिव इंटेलिजेंस’ का विकास है। शोधों से स्पष्ट हुआ कि नियमित ध्यान से मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों के बीच तालमेल बढ़ता है। यह तालमेल न केवल रचनात्मकता बढ़ाता है, बल्कि भावनात्मक स्थिरता भी प्रदान करता है, जिससे युवा अवसाद और चिंता जैसी समस्याओं का सामना अधिक मजबूती से कर पाते हैं।
इस तरह, महर्षि जी की शिक्षाएं प्राचीन ज्ञान को आधुनिक आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर युवाओं को एक शांत, सफल और संतुलित जीवन जीने का ठोस आधार प्रदान करती हैं। महर्षि महेश योगी ने 91 वर्ष की उम्र में 5 फरवरी 2008 को नीदरलैंड के वलोड्रोप स्थित अपने निवास पर महाप्रयान किया था। उनकी स्मृतियों को नमन।

